- रोहित नागे, इटारसी
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आज विजयादशमी (दशहरा) का पावन पर्व है। यह वह दिन है जब हम बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव मनाते हैं। यह पर्व हमें भगवान श्री राम के आदर्शों को याद दिलाता है, लेकिन साथ ही यह हमें रावण जैसे महाज्ञानी के पतन के कारणों पर भी चिंतन करने का अवसर देता है।
रावण, जिसे दशानन के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय मिथकों के सबसे जटिल और विरोधाभासी पात्रों में से एक है। वह केवल एक खलनायक नहीं था, बल्कि अपार ज्ञान, पराक्रम और भक्ति का प्रतीक भी था। उसका जीवन हमें सिखाता है कि एक छोटी सी खामी भी महानतम व्यक्तित्वों के विनाश का कारण बन सकती है।
रावण : खूबियों और खामियों का विरोधाभास
रावण के चरित्र की दो धुरी थीं—दैवीय गुण और राक्षसी प्रवृत्ति। रावण वेदों का ज्ञाता, श्रेष्ठ शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता और ज्योतिष व राजनीति का मर्मज्ञ था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। उसकी तपस्या इतनी तीव्र थी कि उसने अतुलनीय शक्तियां और वरदान प्राप्त किए। वह एक महान योद्धा था जिसने कई देवताओं को पराजित किया, जिससे सिद्ध होता है कि वह शारीरिक बल और सैन्य कौशल में अद्वितीय था।
खामी : अहंकार और राक्षसी वृत्ति
रावण की सभी खूबियों पर भारी पड़ी उसकी एकमात्र खामी थी—अहंकार से जन्मी आसुरी प्रवृत्ति। यह सत्य है कि रावण अत्याचारी नहीं था, उसने माता सीता का हरण अवश्य किया, पर अशोक वाटिका में उन्हें सम्मान बराबर दिया और उनकी मर्यादा भंग नहीं होने दी। लेकिन, परस्त्री का बलपूर्वक हरण करना ही धर्म और मर्यादा का सबसे बड़ा उल्लंघन था। जब उसकी वासना और अहंकार उसकी बुद्धि पर हावी हुए, तब उसकी विद्वता अर्थहीन हो गई।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम : धर्म का साक्षात् संदेश
आज विजयादशमी पर जिस मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विजय का उत्सव मनाया जाता है, उनका चरित्र संतुलन, कर्तव्यपरायणता और आदर्शों का प्रतीक है। उनकी महानता उनकी शक्ति में नहीं, बल्कि उनके मर्यादित आचरण में निहित है।
- कर्तव्य और पितृभक्ति : राम ने पिता के एक वचन पर सहर्ष राजपाट त्याग दिया और वनवास स्वीकार किया।
- समानता का भाव : उन्होंने केवट, शबरी, वानर और भालुओं को भी सम्मान दिया। उनका संदेश है कि मर्यादा का अर्थ केवल राजसी व्यवहार नहीं, बल्कि मानव मात्र के प्रति प्रेम और समानता है।
- धर्म की स्थापना : राम का युद्ध व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था, बल्कि धर्म की पुनस्र्थापना के लिए किया गया था। उनका जीवन हमें सिखाता है कि शक्तिशाली होने के बावजूद विनम्र और धर्मनिष्ठ रहना ही सच्ची वीरता है।
आज के रावण और राम की आवश्यकता
आज लाखों-करोड़ों रावण हो गये हैं, उनका संहार करने इतने राम कहां से आएंगे? आज का रावण दस सिर वाला राक्षस नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति के भीतर छिपा हुआ वह अहंकार, लालच और नैतिक पतन है, जो सत्ता और ज्ञान का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अन्याय और अनैतिकता और महिलाओं के प्रति अनादर। आज विजयादशमी पर हमें यह समझना होगा कि इन लाखों रावणों का संहार बाहरी शस्त्रों से नहीं हो सकता। इसके लिए हमें समाज में लाखों ‘राम’ पैदा करने होंगे।
यह विजयादशमी हमें रावण की विद्वता से सीख लेने की प्रेरणा देती है कि ज्ञान को अहंकार पर हावी नहीं होने देना चाहिए। और हमें राम के चरित्र से यह प्रेरणा लेनी है कि हम व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागकर, अपने कर्तव्यों, मूल्यों और मर्यादा के प्रति समर्पित रहें। आज रावण का पुतला जलाने के साथ-साथ, हमें अपने भीतर के अहंकार रूपी रावण का दहन करने का संकल्प लेना चाहिए, तभी प्रभु राम के मर्यादित संदेश को वास्तविक अर्थों में जिया जा सकेगा।









