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शमशाद बेगम: वह मंदिर की घंटी जिसने बॉलीवुड को दिया सुरों का खजाना

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  • अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर
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अखिलेश शुक्ला

बॉलीवुड संगीत के इतिहास में कुछ आवाज़ें ऐसी हैं जो समय के साथ और भी निखरती गई हैं। उन्हीं में से एक हैं शमशाद बेगम। “मेरे पिया गए रंगून”, “कभी आर कभी पार”, “लेके पहला पहला प्यार” जैसे गीत सुनते ही मन में एक ताजगी और ऊर्जा का संचार होने लगता है। यह उनकी आवाज़ का जादू था, जिसे संगीतकार ओ.पी. नैय्यर “टेंपल बेल” यानी मंदिर की घंटी कहकर बुलाते थे। उनकी आवाज़ में एक ऐसा स्पष्ट, ऊंचा और मधुर स्वर था जो सीधे हृदय में उतर जाता था।

लता मंगेशकर, आशा भोंसले और गीता दत्त जैसी महान गायिकाओं के दौर में भी शमशाद बेगम ने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई। वह 1940 से 1970 के दशक तक संगीतकारों की सबसे पसंदीदा आवाज़ों में से एक रहीं। आइए, डालते हैं एक नज़र इस महान कलाकार के जीवन और उनके अद्भुत संगीत सफर पर।

एक सुरीली शुरुआत: परिवार के विरोध के बीच जन्मा सपना

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, 1919 को लाहौर में एक  मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता मियां हुसैन बख्श एक मैकेनिक थे और मां गुलाम फातिमा एक धार्मिक महिला थीं। संगीत के प्रति शमशाद का झुकाव बचपन से ही था। स्कूल में प्रार्थना का गायन उन्हीं के नेतृत्व में होता था। महज 10-12 साल की उम्र से ही उन्होंने शादियों और सामाजिक कार्यक्रमों में गाना शुरू कर दिया था। हालांकि, उस जमाने में लड़कियों का गाने-बजाने में शामिल होना आसान नहीं था। उनके परिवार ने शुरू में इसका विरोध किया। उनके एक परिचित चाचा के समर्थन के बाद पिता ने गाने की अनुमति तो दी, लेकिन दो शर्तों के साथ: वह हमेशा बुर्का पहनकर रिकॉर्डिंग करेंगी और अपनी तस्वीर कभी नहीं खिंचवाएंगी। इस वादे का पालन शमशाद बेगम ने कई दशकों तक किया, यही कारण है कि उनके लंबे करियर के दौरान भी उनकी बहुत कम तस्वीरें मिलती हैं।

रेडियो से रातोंरात स्टारडम तक का सफर

शमशाद बेगम की किस्मत तब बदली जब उनके चाचाजी 1931 में उन्हें लाहौर की जेनोफोन (Xenophone) म्यूजिक कंपनी में प्रसिद्ध संगीतकार गुलाम हैदर के पास ऑडिशन के लिए ले गए। गुलाम हैदर उनकी आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें तुरंत 12 गानों का अनुबंध दे दिया। यहीं से उनके पेशेवर सफर की शुरुआत हुई।

उनकी लोकप्रियता तब और बढ़ी जब वह 1937 से ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के लाहौर और पेशावर केंद्रों से गाने लगीं। रेडियो पर उनके गीतों की धूम मच गई। यही वह जरिया था जिसके कारण संगीतकार ओ.पी. नैय्यर उनकी आवाज़ से प्रभावित हुए और बाद में उन्हें फिल्मों में गाने का मौका दिया।

बॉलीवुड की पहली सुपरस्टार प्लेबैक सिंगर

शमशाद बेगम को हिंदी फिल्म उद्योग की प्रथम प्लेबैक गायिकाओं में से एक माना जाता है। उनकी पहली बड़ी हिट 1941 की फिल्म ‘खजांची’ थी। इस फिल्म के सभी 9 गीत उन्होंने ही गाए थे, जो जबरदस्त हिट रहे। यह फिल्म उनके करियर में एक मील का पत्थर साबित हुई। 1940 से 1955 तक का दशक उनका स्वर्णिम काल था। इस दौरान उन्होंने सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया और कई युगल गीत भी गाए। उनकी आवाज़ की खासियत थी कि वह पुरुष गायकों के सुरों के साथ भी पूरी तरह मेल खाती थी और कई बार तो उन पर भारी पड़ जाती थी।

संगीतकारों की पहली पसंद

शमशाद बेगम अपने समय के लगभग हर महान संगीतकार की पसंदीदा गायिका रहीं। उन्होंने नौशाद, एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र और ओ.पी. नैय्यर जैसे दिग्गजों के साथ खूब काम किया। दिलचस्प बात यह है कि नौशाद ने एक साक्षात्कार में माना था कि उन्हें शीर्ष पर पहुंचाने में शमशाद बेगम का बड़ा योगदान था। 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक की शुरुआत में शमशाद बेगम के गाए उनके गीतों की लोकप्रियता से ही नौशाद की प्रतिभा को पहचान मिली। इतना ही नहीं, महान फिल्म ‘मदर इंडिया’ के बारह गानों में से चार गाने गाने का मौका भी नौशाद ने शमशाद बेगम को ही दिया।

सुरों का खजाना: वो गीत जो आज भी जिंदा हैं

शमशाद बेगम का गाया हर गीत एक मिसाल है। उन्होंने अपनी आवाज़ से हर तरह के गीतों को जीवंत किया, चाहे वह प्यार भरा गीत हो, दर्द भरा गीत हो या फिर कोई भक्ति गीत। उनके कुछ अमर गीतों में शामिल हैं, ‘मेरे पिया गए रंगून’ (पतंगा, 1949): यह गीत आज भी हर उम्र के लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। ‘कजरा मोहब्बत वाला’ (किस्मत, 1955): हैरानी की बात यह है कि यह गीत उन्होंने हीरोइन बबिता के लिए नहीं, बल्कि हीरो विश्वजीत के लिए गाया था। ‘लेके पहला पहला प्यार’ और ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ (सी.आई.डी., 1956): ये गीत आज भी रेडियो और विविध भारती पर खूब सुनाई देते हैं। ‘सैंया दिल में आना रे’ (बहार, 1951): एक ऐसा गीत जो प्यार की अभिव्यक्ति का पर्याय बन गया। ‘छोड़ बाबुल का घर’ (बाबुल, 1950): शादी के बाद विदा होती दुल्हन का दर्द इस गीत में इस तरह उभरा है कि आज भी शादियों में यह गीत बजता है। इसके अलावा फिल्म ‘शबनम’ में उन्होंने एक ही गाने में छह अलग-अलग भाषाओं में गाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था।

व्यक्तिगत जीवन: प्यार, नुकसान और एकांत

शमशाद बेगम का निजी जीवन भी उनके संगीत की तरह ही गहरा और दर्दनाक रहा। महज 15 साल की उम्र में, 1934 में, उन्होंने गणपत लाल बट्टो नाम के एक वकील से शादी कर ली। उस जमाने में धार्मिक अंतर के बावजूद यह शादी दोनों के लिए प्रेम का एक बेहतरीन उदाहरण बन गई। गणपत लाल न केवल उनके जीवनसाथी थे, बल्कि उनके करियर के मैनेजर और सबसे बड़े सहारा भी थे। लेकिन 1955 में एक सड़क दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो गई। यह झटका शमशाद बेगम के लिए बहुत बड़ा था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह सबसे पहले एक पत्नी और मां थीं। पति के जाने के बाद वह टूट सी गईं और धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया से दूर होने लगीं। उन्होंने अपना जीवन अपनी बेटी उषा रातड़ा और दामाद कर्नल योगेश रातड़ा के साथ मुंबई में बिताना शुरू कर दिया। समय के साथ वह पूरी तरह से एकांतवास में चली गईं और अपने पोते-पोतियों की परवरिश में लग गईं। वह इतनी शांतिपूर्ण जीवन जीने लगीं कि 2004 में कुछ मीडिया रिपोर्टों ने गलती से उनकी मृत्यु की खबर भी प्रकाशित कर दी, जिसके बाद परिवार को स्पष्टीकरण देना पड़ा।

सम्मान और विरासत

शमशाद बेगम को उनके अद्वितीय योगदान के लिए 2009 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उसी साल उन्हें ओ.पी. नैय्यर अवार्ड भी दिया गया। यह सम्मान इसलिए भी खास है क्योंकि ओ.पी. नैय्यर ने ही उनकी आवाज़ को ‘टेंपल बेल’ की संज्ञा दी थी। 23 अप्रैल, 2013 को 94 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया। वह चली गईं, लेकिन अपने पीछे छोड़ गईं हजारों गानों की एक अमूल्य विरासत। उन्होंने न केवल हिंदी, बल्कि पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती और तमिल जैसी भाषाओं में भी गाया।

निष्कर्ष

शमशाद बेगम न सिर्फ एक महान गायिका थीं, बल्कि वह एक ऐसी शख्सियत थीं जिन्होंने अपनी शर्तों पर जीवन जिया। एक रूढ़िवादी परिवार से आने के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को पहचाना और उसे साधा। प्रेम के लिए धार्मिक बंधनों को तोड़ा, और जब दिल चाहा तो चमकदार करियर को पीछे छोड़कर शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन को चुना।

उनकी आवाज़ में एक ऐसी ताकत और मिठास थी जो श्रोता को तुरंत अपना बना लेती थी। लता मंगेशकर और आशा भोंसले के उदय के बाद भी उन्होंने अपनी अलग पहचान कायम रखी। आज भी, जब भी रेडियो पर “मेरे पिया गए रंगून” बजता है, लोग झूम उठते हैं। यही किसी भी कलाकार की सच्ची अमरता होती है। शमशाद बेगम सचमुच बॉलीवुड संगीत की वह सुनहरी घंटी हैं, जिसकी गूंज कभी खत्म नहीं होगी।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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