नर्मदापुरम। कहते हैं कि पश्चाताप की अग्नि जब सेवा के जल से मिलती है, तो वह पुण्य बन जाती है। कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों केंद्रीय जेल नर्मदापुरम में दिख रहा है, जहां की चारदीवारी के भीतर बंद हाथ आज अपनी पुरानी खताओं को धोने के लिए नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मां नर्मदा की मर्यादा बचाने के लिए मिट्टी की जगह ममता और संकल्प के दीपक गढ़ रहे हैं।
मछलियों का निवाला और मां का श्रृंगार
कलेक्टर सुश्री सोनिया मीना के मार्गदर्शन में शुरू हुई यह पहल केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं, बल्कि एक दार्शनिक संदेश है। कैदी आटे और पत्तों स 50 हजार ऐसे दीपक तैयार कर रहे हैं, जो पानी में डूबते ही खत्म नहीं होंगे, बल्कि जलीय जीवों, मछलियों का आहार बनकर जीवन के चक्र को आगे बढ़ाएंगे। प्लास्टिक और सिंथेटिक दीपकों के इस दौर में, ये प्रकृति-अनुकूल दीपक सिखा रहे हैं कि विसर्जन का अर्थ प्रदूषण नहीं, बल्कि समर्पण होना चाहिए।
दीपक केवल मिट्टी का नहीं, मन का भी
जेल प्रबंधन की इस अनूठी कोशिश से कैदियों के भीतर एक सकारात्मक बदलाव की लौ जली है। मां नर्मदा के प्रति उनकी यह आस्था यह सिद्ध करती है कि सुधार की कोई सीमा नहीं होती। जब ये 50 हजार दीपक नर्मदा की लहरों पर एक साथ उतरेंगे, तो वे केवल अंधकार नहीं मिटाएंगे, बल्कि समाज को यह संदेश भी देंगे कि नदी को बचाना, खुद को बचाने जैसा है।
दर्शन की एक झलक
- प्रदूषण मुक्त संकल्प : मां की गोद को प्लास्टिक से नहीं, बल्कि प्रकृति से सजाने की जिद।
- निशुल्क सेवा : बिना किसी स्वार्थ के, जल संरक्षण की अलख जगाते बंदियों के हाथ।
- अहिंसक विसर्जन : वे दीपक जो जलकर बुझेंगे नहीं, बल्कि मछलियों का पेट भरकर दुआएं बटोरेंगे।
नर्मदा जयंती के अवसर पर जब आप इन दीपकों की लौ को जल पर तैरते देखें, तो याद रखिएगा कि इनमें से हर एक दीपक किसी के प्रायश्चित और समाज के प्रति उसके प्रेम का प्रतीक है।









