इटारसी। नर्मदापुरम वन मंडल की कार्यशैली पर आज उस वक्त बड़े सवालिया निशान लग गए, जब इटारसी की सोनतलाई बीट में एक मादा बाघ का शव मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि वन विभाग खुद स्वीकार कर रहा है कि वे पिछले दो दिनों से इस बाघ की ‘निगरानी’ कर रहे थे।
सवाल यह उठता है कि क्या विभाग का मैदानी अमला दो दिनों तक एक ‘शव’ की निगरानी कर रहा था? आखिर वह कैसी मॉनिटरिंग थी जिसे बाघ की मौत और उसके शरीर में हलचल न होने का पता 48 घंटे बाद चला?
‘निगरानी’ के दावे पर उठते गंभीर सवाल
वन विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि बाघ कल वाले स्थान पर ही पाया गया और हलचल न होने पर पास जाकर देखा गया। यह बयान विभाग की सक्रियता पर खुद ही सवाल खड़े करता है।
क्या गश्त सिर्फ कागजों पर थी?
यदि ट्रैकिंग दल पास होता, तो बाघ की शारीरिक स्थिति का पता पहले ही लग जाता।
तकनीकी फेलियर: करोड़ों रुपये के बजट और हाईटेक सर्विलांस के बावजूद, एक बाघिन संक्रमण से दम तोड़ देती है और विभाग को भनक तक नहीं लगती।
संक्रमण का ‘सुरक्षित’ तर्क: क्या यह बड़ी लापरवाही को छिपाने की कोशिश है?पोस्टमार्टम के बाद विभाग ने प्रारंभिक तौर पर मौत की वजह ‘पेट में संक्रमण’ बताया है। यह तर्क विभाग के लिए सबसे ‘सुरक्षित’ रास्ता माना जाता है क्योंकि इससे ‘शिकार’ के आरोप हट जाते हैं और जिम्मेदारी से बचा जा सकता है।
जवाबदेही किसकी?
अगर बाघिन बीमार थी, तो समय रहते उसे ‘ट्रेंकुलाइज’ कर इलाज क्यों नहीं दिया गया? क्या विभाग केवल उसके मरने का इंतजार कर रहा था?
पिछली नाकामियां: अगस्त 2025 में हुए बाघ के शिकार पंजा काटने की घटना के आरोपी आज तक नहीं पकड़े गए। ऐसे में ‘प्राकृतिक मौत’ की थ्योरी पर संदेह गहराना लाजिमी है।
जनवरी का ‘डेथ कैलेंडर’ और विभाग की चुप्पी
प्रदेश में बाघों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। जनवरी 2026 में यह 5वीं मौत है। हाईकोर्ट द्वारा सरकार को जारी किए गए नोटिस के ठीक बाद हुई यह घटना बताती है कि धरातल पर कुछ नहीं बदला है। रेंजर से लेकर डीएफओ तक का अमला ‘सब ठीक है’ का दावा कर रहा है, जबकि जंगल के राजा का एक-एक कर खत्म होना कुछ और ही हकीकत बयां कर रहा है।
शवदाह के साथ दफन हुए सवाल
अधिकारियों की भारी मौजूदगी में आनन-फानन में बाघिन का अंतिम संस्कार कर दिया गया। विसरा जांच के लिए लैब भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट आने में महीनों लगेंगे। तब तक यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा। लेकिन आम जनता और वन्यजीव प्रेमियों के मन में यह सवाल बरकरार है— क्या नर्मदापुरम का जंगल अब बाघों के लिए ‘सेफ जोन’ नहीं रहा?









