इटारसी। नगर पालिका परिषद इटारसी की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये की सरकारी निधि के दुरुपयोग और नियमों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के संगीन आरोपों की गूंज अब भोपाल तक पहुंच गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट अमोल उपाध्याय ने स्थानीय प्रशासन पर अविश्वास जताते हुए सीधे प्रमुख सचिव और आयुक्त नगरीय प्रशासन विभाग को साक्ष्यों के साथ शिकायत सौंपी है।
पुलिस की जमीन पर ‘अवैध’ स्टेडियम?
शिकायत में सबसे चौंकाने वाला खुलासा पुरानी इटारसी स्थित दशहरा मैदान सूखा सरोवर में बने वीर सावरकर स्टेडियम को लेकर हुआ है।
- नियमों की धज्जियां: तकनीकी स्वीकृति की शर्तों के मुताबिक निर्माण केवल नगर पालिका की भूमि पर होना चाहिए था।
- राजस्व रिकॉर्ड की पोल: राजस्व रिकॉर्ड खसरा नंबर 262/3 के अनुसार, यह जमीन पुलिस विभाग के नाम दर्ज है।
- वित्तीय अपराध: आरोप है कि सीएमओ ऋतु मेहरा और तकनीकी टीम ने बिना स्वामित्व जांचे पुलिस हाउसिंग की जमीन पर 1.46 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, जो सीधे तौर पर सरकारी धन का दुरुपयोग और आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है।
लोकसभा चुनाव में टेंट के नाम पर ‘खर्च का खेल’
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान हुई टेंडर प्रक्रिया पर भी धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं।
- एकतरफा टेंडर: आरोप है कि जानबूझकर गलत टेंडर पोर्टल आईडी प्रसारित की गई ताकि प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाए और ‘सांई कंस्ट्रक्शन’ को काम मिल सके।
- अजीबोगरीब भुगतान: हैरानी की बात यह है कि जहां नर्मदापुरम और सिवनी मालवा जैसी नगर पालिकाओं ने चुनाव व्यवस्थाओं पर 3 लाख रुपये से कम खर्च किए, वहीं इटारसी नपा ने 22 लाख रुपये का भारी-भरकम भुगतान कर दिया।
स्थानीय प्रशासन से भरोसा उठा
शिकायतकर्ता अमोल उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कलेक्टर या जिला स्तर पर शिकायत क्यों नहीं की। उनका कहना है कि पिछली कई शिकायतों पर स्थानीय स्तर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे भ्रष्टाचार को ‘मौन संरक्षण’ मिलने की आशंका होती है। अब शासन से मांग की गई है कि नगर पालिका अधिनियम 1961 के तहत दोषी अधिकारियों से वसूली की जाए। सीएमओ ऋतु मेहरा की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच हो। इस मामले में सीएमओ ऋतु मेहरा से संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।
नगर पालिका प्रशासन बिना तथ्यों की जांच किए जमीनों पर कब्जा कर निर्माण कर रहा है। पुलिस की जमीन पर करोड़ों का फंड डंप करना गंभीर मामला है।”
— अमोल उपाध्याय, आरटीआई एक्टिविस्ट









