- अखिलेश शुक्ला

बॉलीवुड की दुनिया जितनी चकाचौंध से भरी होती है, उससे कहीं अधिक दिलचस्प कहानियाँ उसके पर्दे के पीछे छुपी होती हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म है “लावारिस”, जो न सिर्फ अपने समय की बड़ी हिट साबित हुई, बल्कि इससे जुड़ी कई घटनाएं आज भी सिनेप्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
आज हम आपको लेकर चलते हैं 1978 के उस दौर में, जब सुपरहिट फिल्म “मुक़द्दर का सिकंदर” की सफलता के बाद निर्देशक प्रकाश मेहरा एक बार फिर अमिताभ बच्चन के साथ कुछ नया करना चाहते थे। लेकिन जो हुआ, वो सिर्फ एक फ़िल्म की कहानी नहीं, बल्कि बॉलीवुड के संघर्ष, रिश्तों और चुनौतियों का आईना भी बन गया।
जब परवीन बाबी को बदलना पड़ा
“लावारिस” का मुहूर्त 8 अगस्त 1978 को हुआ था। अमिताभ के अपोज़िट उस समय परवीन बाबी को कास्ट किया गया था। एक शेड्यूल की शूटिंग भी पूरी हो चुकी थी, लेकिन फिर परवीन बाबी की तबीयत अचानक बेहद खराब हो गई। उन्हें हटाना पड़ा और उनकी जगह ली ज़ीनत अमान ने। यह बदलाव फिल्म के लिए बड़ा रिस्क था। मगर जैसा कि कहते हैं, “शो मस्ट गो ऑन,” उसी तरह लावारिस की शूटिंग भी आगे बढ़ी।
राखी का असामान्य किरदार और तनाव
राखी ने इस फ़िल्म में अमिताभ की माँ का रोल निभाया था। गौर करने वाली बात यह है कि इससे पहले वो अमिताभ के अपोज़िट कई फिल्मों में काम कर चुकी थीं। हालांकि, “लावारिस” में दोनों का कोई सीन साथ में नहीं था। फिर भी शूटिंग के दौरान कई विवाद हुए।
एक बार रिपब्लिक डे के दिन भारी भीड़ के बीच एक अहम सीन शूट किया जाना था, जिसमें राखी और अमजद खान साथ थे। लेकिन राखी शूटिंग पर नहीं आईं। प्रकाश मेहरा नाराज़ हुए। उनकी जगह बॉडी डबल से सीन शूट करना पड़ा। जब उन्होंने राखी से बात करनी चाही तो जवाब मिला कि वो बात नहीं कर सकतीं।
ये बात प्रकाश मेहरा को इतनी बुरी लगी कि उन्होंने राखी को फिल्म से निकालने का विचार तक कर लिया, लेकिन उस वक्त कोई भी प्रमुख अभिनेत्री मां का रोल करने को तैयार नहीं थी। अंततः, राखी को ही फिल्म में बनाए रखा गया।
पद्मिनी कपिला और उनका अधूरा अवसर
“लावारिस” में पद्मिनी कपिला ने रंजीत की गर्लफ्रेंड का रोल निभाया। मगर पहले उन्हें सुरेश ओबेरॉय की बहन का किरदार भी ऑफर किया गया था। पद्मिनी ने जिस रोल को चुना, वह बाद में उतना प्रभावशाली नहीं रहा, जबकि बहन का किरदार कहीं अधिक अहम साबित हुआ।
सुरेश ओबेरॉय का संघर्ष
सुरेश ओबेरॉय का बॉलीवुड में सफर संघर्षों से भरा था। एफटीआईआई से पढ़ाई के बाद उन्होंने खुद की शॉर्ट फिल्म बनाई और उसे इंडस्ट्री के दिग्गजों को दिखाया। वहीं से उनकी आवाज़ ने प्रकाश मेहरा को प्रभावित किया और उन्हें “मुक़द्दर का सिकंदर” के एलपी रिकॉर्ड में कमेंट्री का मौका मिला।
इसके बाद उन्होंने खुद “लावारिस” में किसी रोल की गुज़ारिश की। प्रकाश मेहरा ने उन्हें एक अच्छा किरदार दिया। इस किरदार को फिल्म से काटने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन मेहरा ने कोई सीन नहीं हटाया। इससे सुरेश का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ।
राम सेठी – परदे के पीछे का नायक
जब फिल्म की शूटिंग कश्मीर में हो रही थी, प्रकाश मेहरा की तबीयत बिगड़ गई। ऐसे में उनकी ज़िम्मेदारी उनके असिस्टेंट राम सेठी ने संभाली। राम सेठी ने “लावारिस” के कई अहम हिस्सों की शूटिंग पूरी की। बाद में उन्हें फिल्म “घुंघरू” डायरेक्ट करने का मौका भी मिला।
“मेरे अंगने में” और उस पर हुआ विवाद
“लावारिस” का सबसे चर्चित गाना “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” था, जिसे अमिताभ बच्चन ने खुद गाया था। गाना सुपरहिट हुआ, लेकिन इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा छुपा है।
पहले इस गीत को हरिवंश राय बच्चन (अमिताभ के पिता) की रचना बताया गया था। मगर बाद में पता चला कि यह तो उत्तर प्रदेश का लोकगीत है। इस जानकारी के बाद क्रेडिट हटा दिया गया।
गाने को फिल्म में क्यों जोड़ा गया
प्रकाश मेहरा को फिल्म का दूसरा हिस्सा बहुत गंभीर लग रहा था। उन्होंने दर्शकों को हल्का-फुल्का मनोरंजन देने के लिए अमिताभ को महिला पोशाक में इस गाने पर नचाया। यह प्रयोग बेहद सफल रहा, हालांकि इस प्रयोग की आलोचना भी हुई।
निष्कर्ष:
“लावारिस” की सफलता के पीछे सिर्फ अमिताभ बच्चन की दमदार एक्टिंग या हिट गाने ही नहीं थे, बल्कि उससे जुड़ी ये सारी जानी-अनजानी कहानियाँ भी थीं। यह फिल्म बॉलीवुड के उन अनकहे पलों को दर्शाती है जहाँ दोस्ती, तनाव, राजनीति और रिश्तों की परतें बारीकी से जुड़ी होती हैं।
आपको यह लेख कैसा लगा? फ़िल्म लावारिस के संबंध में आपके क्या विचार हैं? कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएँ। यदि आपने यह फ़िल्म नहीं देखी है तो एक बार जरूर देखें।
अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर










