13 अक्टूबर 1985 से 6 अप्रैल 1986 तक, भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा गया जिसने इस माध्यम की छवि ही बदल दी। डीडी नेशनल पर प्रसारित होने वाला सीरियल ‘विक्रम बेताल’ सिर्फ एक धारावाहिक नहीं था, बल्कि एक क्रांति थी, जिसने टेलीविजन इंडस्ट्री को नया जीवन दिया।
इस सीरियल की कहानी महाकवि सोमदेव द्वारा रचित ‘बेताल पच्चीसी‘ पर आधारित थी, जिसे मूल रूप से संस्कृत में लिखा गया था। इस ऐतिहासिक धारावाहिक का निर्माण रामानंद सागर के नेतृत्व में हुआ, जिन्होंने भारतीय टीवी में एक मजबूत नींव रखी।
एक मुश्किल शुरुआत
अस्सी के दशक में, जब भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री अपने शुरुआती दौर में थी, सिनेमा का बोलबाला था। टेलीविजन को ‘इडियट बॉक्स’ कहा जाता था और इसमें काम करने वालों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। ऐसे माहौल में जब रामानंद सागर जी ने टेलीविजन को अपना कार्यक्षेत्र चुना, तो उनका मजाक उड़ाया गया। लोगों ने कहा कि ‘मूंछों और मुकुटों वाले लंबे धारावाहिकों’ को कोई नहीं देखेगा। लेकिन सच्चे विजेता वही होते हैं जो अपने सपनों पर विश्वास रखते हैं।
विक्रम बेताल के निर्माण की कहानी
रामानंद सागर जी को इस नए माध्यम पर काम करने का डर था, इसलिए उन्होंने एक छोटे सीरियल से शुरुआत करने का निश्चय किया। विक्रम बेताल की कहानियों को चुनकर उन्होंने एक साहसी कदम उठाया। पर फंडिंग एक बड़ी समस्या थी। कई प्रयासों के बाद, इमामी कंपनी के मालिक आरएस अग्रवाल ने प्रत्येक एपिसोड के लिए एक लाख रुपए देने का वादा किया। यह रकम सीमित थी, लेकिन सागर परिवार के लिए यह उनके सपनों को उड़ान देने के लिए काफी थी। सागर विला, सागर जी का घर, विक्रम बेताल की शूटिंग का केंद्र बना। कैमरा, स्पेशल इफेक्ट्स, डायरेक्शन का काम प्रेम सागर जी ने संभाला और सीमित संसाधनों के बावजूद हर एपिसोड को एक दिन में पूरा किया गया।
विक्रम बेताल का संगीत और तकनीक
सागर प्रोडक्शन के हर प्रोजेक्ट में संगीत की खास भूमिका रही है। जहां अन्य धारावाहिकों में प्रसिद्ध संगीतकार रवींद्र जैन ने संगीत दिया था, वहीं विक्रम बेताल में टीम ने खुद संगीत तैयार किया। हारमोनियम जैसे सस्ते वाद्य यंत्रों का उपयोग कर, खुले आसमान के नीचे रिकॉर्डिंग की गई। टाइटल ट्रैक रिकॉर्डिंग के दौरान एक हवाई जहाज ऊपर से गुजरा, जिसकी आवाज भी रिकॉर्ड हो गई। निर्माता ने इस आवाज को एक राक्षस के दृश्य से जोड़ दिया, जो आज भी दर्शकों को याद है।
रचनात्मकता और संघर्ष
सीरियल के दौरान कई अनूठी समस्याओं का सामना करना पड़ा। हिरण के किराए के लिए लाखों रुपये मांगने पर, एक बकरी को रंग कर हिरण की तरह प्रस्तुत किया गया। एक विशालकाय पक्षी के दृश्य के लिए डेढ़ फुट का बाज लाया गया। बाज को नशा देकर, और उसके सामने अंडे फोड़कर सही भाव लाने का जुगाड़ किया गया। इस तरह की रचनात्मकता और जिद ने विक्रम बेताल को वास्तविकता में बदल दिया।
विक्रम बेताल के अद्भुत कलाकार
अरुण गोविल ने राजा विक्रमादित्य की भूमिका निभाई, जो आगे चलकर रामायण में भगवान राम के अवतार में नजर आए। अरविंद त्रिवेदी, जिन्होंने योगिराज की भूमिका निभाई थी, बाद में रामायण में रावण का प्रतिष्ठित किरदार निभाया। दीपिका चिखलिया, विजय अरोड़ा, और सुनील लहरी ने भी विभिन्न महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
दर्शकों का प्रेम और सफलता
शुरुआत में, दूरदर्शन ने विक्रम बेताल को रविवार शाम चार बजे का समय दिया, जो बच्चों के खेलने का समय था। निर्माता इस फैसले से निराश थे। लेकिन कुछ ही एपिसोड में ‘तू बोला मैं चला’ जैसे संवाद और इसका टाइटल ट्रैक लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
विक्रम बेताल की विरासत
विक्रम बेताल ने न केवल रामानंद सागर के टेलीविजन करियर को मजबूत किया, बल्कि पूरी टेलीविजन इंडस्ट्री को एक नई पहचान दी। इसी विश्वास के साथ रामानंद सागर जी ने आगे चलकर रामायण, श्रीकृष्णा, और दादा-दादी की कहानियां जैसे ऐतिहासिक सीरियल बनाए, जो आज भी भारतीय टेलीविजन का अभिन्न हिस्सा हैं।
निष्कर्ष
विक्रम बेताल सिर्फ एक धारावाहिक नहीं, बल्कि भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए प्रेरणा का स्रोत था। सीमित संसाधनों, मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद, इसने वह मुकाम हासिल किया जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी। आज भी अगर भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम अध्यायों की बात होती है, तो विक्रम बेताल का नाम गर्व से लिया जाता है। एक बार विक्रम और बेताल फिर से देखें। आपको यह कहानियां रोमांचित करेंगी।
https://youtu.be/C6wzTIc2N7c?si=G6soYsrHU-FqZKI2
साभार : लिंक you tube के चैनल तिलक कथाएं से।

अखिलेश शुक्ल
सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर









