- अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

“जब हम जवाँ होंगे, जाने कहाँ होंगे…”
ये गाना आपने सुना होगा। ये आवाज़ आपको याद होगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आवाज़ का सफर कितना संघर्ष भरा रहा? क्या आप जानते हैं कि जिस गायक ने 6000 से ज्यादा बॉलीवुड गाने गाए, उसे एक दिन ऑर्केस्ट्रा के ऑडिशन में रिजेक्ट कर दिया गया था? और हैरानी की बात ये कि उसी ऑर्केस्ट्रा ने बाद में उसे अपना लीड वोकलिस्ट बना लिया!
दीवार पर कान लगाकर सीखी गायकी
26 अक्टूबर 1954, गुजरात का बड़ौदा शहर। एक मामूली परिवार में जन्मे शब्बीर शेख (बाद में शब्बीर कुमार) का बचपन बेहद गरीबी में गुजरा। उनके पिता रेवेन्यू डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे। परिवार ऐसे इलाके में रहता था, जहां सिर्फ नौ घर थे और बिजली भी नहीं आती थी।
शब्बीर की मां उन्हें और उनके भाई-बहनों को नात कलाम (धार्मिक गीत) सुनाया करती थीं। ये वो पल थे, जब संगीत का पहला बीज शब्बीर के मन में पड़ा। धीरे-धीरे वे मां के साथ गाने लगे।
लेकिन संगीत सीखने का कोई साधन नहीं था। पास में एक डॉक्टर का परिवार रहता था, जिनके घर रेडियो था। शब्बीर अक्सर उनकी दीवार पर कान लगाकर गाने सुना करते थे। यहीं से उन्होंने गाने सीखे। मोहल्ले में जब भी कोई समारोह होता, लोग शब्बीर को बुलाते। वे मोहम्मद रफी के गाने गाते और इनाम में आम-पापड़ पाते।
14 साल की उम्र में पिता ने उन्हें बोर्डिंग स्कूल भेज दिया। शहर की चकाचौंध और गायकी से उनका ध्यान भटक रहा था, पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था। बोर्डिंग बेहद पिछड़े इलाके में थी, स्कूल की हालत खस्ता थी। लेकिन ये 6-7 महीने शब्बीर के लिए वरदान साबित हुए। उन्होंने खाना बनाना, कपड़े धोना, अपना काम खुद करना सीखा। सबसे बड़ी बात, इंडिपेंडेंट रहना सीखा। जिंदगी की असली पाठशाला यहीं मिली।
ऑडिशन में रिजेक्शन और फिर वही ऑर्केस्ट्रा ले आया वापस
घर वापस आने के बाद शब्बीर ने दोस्तों के कहने पर ओपेरा म्यूजिक सर्कल ऑर्केस्ट्रा में ऑडिशन दिया। उस वक्त ये भारत के सबसे प्रतिष्ठित ऑर्केस्ट्रा ग्रुप्स में से एक था। शब्बीर रिजेक्ट हो गए।
लेकिन हार मानने वाले थोड़े से शब्बीर थे। उन्होंने एक लोकल सिंगिंग कॉम्पिटीशन में हिस्सा लिया। उस वक्त भारत-चीन युद्ध का दौर था। शब्बीर ने देशभक्ति गीत गाया- “वतन पे जो फिदा होगा, अमर वो नौजवान होगा।” सब मंत्रमुग्ध हो गए। शब्बीर कॉम्पिटीशन के विनर बने।
इस जीत ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया। अब उन पर ओपेरा म्यूजिक सर्कल की नजर पड़ी। उसी ऑर्केस्ट्रा ने, जिसने उन्हें रिजेक्ट किया था, अब उन्हें अपना लीड वोकलिस्ट बना लिया। यहीं से शब्बीर को बॉलीवुड की दिग्गज हस्तियों से मिलने और काम करने का मौका मिला।
रफी साहब के जनाजे में बदल गई किस्मत
1980 में जब मोहम्मद रफी साहब का निधन हुआ, तो श्रोताओं के बीच एक खालीपन आ गया। उनकी जैसी आवाज़ वाले गायक की तलाश शुरू हुई। शब्बीर के पास शो के ऑफर आने लगे। उन्होंने एक समूह से हाथ मिलाया, जिसने “एक शाम रफी के नाम” कार्यक्रम शुरू किया। ये ग्रुप 30 दिनों में 50 शो करता था, जो एक रिकॉर्ड था।
एक दिन शो में भारत की पहली महिला म्यूजिक डायरेक्टर उषा खन्ना ने शब्बीर को सुना। उन्होंने तुरंत बुलाया और ऑडिशन लिया। शब्बीर ने रफी साहब के गाने सुनाए। उषा जी भावुक हो गईं। 10 दिन बाद शब्बीर को फोन आया- आप सेलेक्ट हो गए हैं।
उषा खन्ना ने उन्हें फिल्म “तजुर्बा” में गाने का मौका दिया। ये एक ग्रुप सॉन्ग था, लेकिन शब्बीर के लिए ये बड़ा ब्रेक था। सुरेश वाडकर, अमित कुमार, हेमलता जैसे दिग्गजों के साथ गाना आसान नहीं था। शब्बीर नर्वस थे, लेकिन उन्होंने शानदार परफॉर्म किया।
1981 में फिल्म “सरदार” में उनका पहला सोलो सॉन्ग आया- “एक अकेला मन का पंछी, टूटी आस लिए…”।
जब किशोर दा की जगह शब्बीर बने अमिताभ की आवाज़
सबसे बड़ा मोड़ आया जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का फोन आया। वे फिल्म “कुली” के लिए म्यूजिक दे रहे थे। अमिताभ बच्चन के लिए उनकी पहली पसंद किशोर कुमार थे। किशोर दा ने गाने का वादा तो किया, लेकिन उन दिनों इतनी व्यस्तता थी कि समय नहीं निकाल पा रहे थे।
आखिरकार शब्बीर कुमार को बुलाया गया। मुंबई पहुंचे शब्बीर ने ऑडिशन दिया। शाम को महमूद स्टूडियो में उन्हें बुलाया गया। वहां लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ आनंद बक्षी और मनमोहन देसाई भी मौजूद थे। शब्बीर थोड़े घबराए, लेकिन गाना शुरू किया- “मुबारक हो तुम सबको, हज का महीना…”
160 पीस ऑर्केस्ट्रा और 25 सिंगर्स की कोरस के साथ ये गाना रिकॉर्ड हुआ। जब “कुली” की टीम ने इसे 70 MM स्क्रीन पर अमिताभ बच्चन की प्रोफाइल पर सुना, तो उन्हें लगा- ये आवाज़ उन पर बिल्कुल फिट बैठती है। फिर क्या था, मनमोहन देसाई और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने शब्बीर से ही फिल्म के सारे गाने गवाए।
टाइटल ट्रैक “सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं…” पहले किशोर दा से गवाया गया था, लेकिन उनकी आवाज़ में थकान महसूस हो रही थी। दोबारा रिकॉर्ड करने की बात चली, लेकिन किशोर दा समय नहीं दे पाए। आखिर में ये गाना भी शब्बीर ने ही गाया।
जबरदस्त सफलता का दौर
1983 में “बेताब” के गानों ने धूम मचा दी। “जब हम जवाँ होंगे…” से लेकर “तुमसे मिलकर…” तक हर गाना हिट था। उसी साल “वो सात दिन” के गीतों ने तहलका मचाया- “किया नहीं जाता…”। 1984 में “सोहनी महिवाल”, 1985 में “प्यार झुकता नहीं” के गाने हर तरफ बजते थे।
“तेरी मेहरबानियां”, “तुम्हें अपना बनाने से पहले”, “सुनाई देती है जिसकी धड़कन”, “जिंदगी हर कदम एक नई जंग है”- एक से बढ़कर एक हिट गाने। 1988 में “तेजाब”, 1990 में “आज का अर्जुन” का गीत गोरी है कलाई…” और “घायल” के गाने- हर गाने में शब्बीर की आवाज़ का जादू था।
अचानक गायब क्यों हो गए शब्बीर कुमार?
1992 में “राधा का संगम” और “शोला और शबनम” के गाने आखिरी बड़े हिट रहे। उसके बाद शब्बीर इंडस्ट्री से लगभग गायब हो गए। क्या हुआ?
फिल्मी गलियारों में चर्चा है कि 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट के बाद बॉलीवुड ने एक खास धर्म के कलाकारों को अनदेखा करना शुरू कर दिया। शब्बीर कुमार (तब शब्बीर शेख) के साथ भी शायद यही हुआ। गौरतलब है कि शब्बीर कुमार हमेशा सेक्युलर सोच वाले कलाकार रहे। उन्होंने 1967 में शिवाजी जयंती पर पहली बार स्टेज पर गाया था। अपने नाम के साथ ‘कुमार’ जोड़कर उन्होंने संदेश दिया कि कलाकार के लिए जाति-धर्म बाधा नहीं बन सकता।
रफी साहब के जनाजे वाला वाकया जिसने बदल दी जिंदगी
शब्बीर कुमार ने एक इंटरव्यू में बेहद दिलचस्प किस्सा शेयर किया था। रफी साहब के जनाजे में वे भी शामिल हुए। उनके मुताबिक, जब रफी साहब को दफनाया जा रहा था, उनकी घड़ी कब्र में गिर गई। शब्बीर ने इसे प्रकृति का संकेत माना कि रफी साहब की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। चाहे इसे अंधविश्वास कहें या संयोग, लेकिन उसके बाद शब्बीर ने न सिर्फ सबसे ज्यादा हिट गाने गाए, बल्कि रफी साहब के बाद सबसे करीबी आवाज़ माने जाने लगे।
सम्मान और विवाद
शब्बीर को 34 गोल्ड डिस्क, 16 प्लैटिनम डिस्क और एक कोडोर डिस्क मिली। पहला मोहम्मद रफी अवार्ड, कला रतन अवार्ड (राष्ट्रपति से), दुबई और UAE में प्लेबैक सिंगर अवार्ड- उनके नाम रहे।
6000 से ज्यादा गाने, 1500 से ज्यादा फिल्मों में योगदान। UAE, यूरोप, साउथ अफ्रीका, US में लाइव कंसर्ट।
2012 में जब लता मंगेशकर ने मोहम्मद रफी के माफी पत्र का दावा किया, तो शब्बीर ने इस पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इससे रफी साहब के प्रशंसकों की भावनाएं आहत हुई हैं।
वापसी और आज का दौर
शब्बीर ने 2000 में कुछ प्राइवेट एल्बम और फिल्मों में गाने गाए। 2010 में “हाउसफुल” के गाने से वापसी की। 2021 में “इंडियन आइडल 12” में पहुंचे, जहां उन्होंने बताया कि ये उनकी दिवंगत पत्नी को श्रद्धांजलि थी, जिन्हें ये शो बहुत पसंद था।
जनवरी 2023 में वे कपिल शर्मा शो में नजर आए। 70 बसंत देख चुके शब्बीर आज भी देश-विदेश में कंसर्ट कर रहे हैं।
निष्कर्ष
शब्बीर कुमार की कहानी सिर्फ एक गायक की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर के बॉलीवुड की राजनीति, उतार-चढ़ाव और सामाजिक ताने-बाने की कहानी है। वो गायक, जो दीवार पर कान लगाकर संगीत सीखा, ऑडिशन में रिजेक्ट हुआ, फिर वहीं से चमका, रफी साहब के जनाजे में घड़ी गिरने से दिशा बदली, किशोर दा को रिप्लेस कर अमिताभ की आवाज़ बना, लेकिन अचानक इंडस्ट्री से गायब हो गया।
सवाल ये है- क्या शब्बीर कुमार को एक बार फिर वही पहचान मिलनी चाहिए? क्या उनकी आवाज़ आज भी उतनी ही जादुई है? जवाब शायद हमारे दिलों में बसे उनके गानों में छिपा है।









