इटारसी। छठ का चार दिवसीय महापर्व सोमवार को नहाय खाय से शुरू हुआ था। बुधवार को इसका तीसरा दिन यानि डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर मनाया गया। यह पर्व नेशनल हाईवे पर स्थित पथरोटा नहर के घाट पर उमड़े सैंकड़ों श्रद्घालुओं ने अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर नमन कर छठ पर्व (Chhath festival 2021) मनाया। उत्तर भारतीय समाज हर वर्ष यहां सूर्यषष्टी पर्व मनाता है। आज छठ पूजा का शुभारंभ शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर किया। पथरोटा नहर स्थित छठ पूजा घाट पर शाम को आस्था और उमंग का अनूठा संगम देखने को नजर आया। मंगलवार को खरना पूजा में शाम में गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हुआ। बुधवार शाम छठी मैया की पूजा कर अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य दिया और गुरुवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
हर मन्नत होती है पूरी
पथरोटा निवासी मुन्नी चौरसिया ने बताया कि बिहारियों का यह सबसे बड़ा पर्व माना गया है। यह चार दिनों तक चलता है। सभी सुहागन महिलाएं अपने पति व परिवार की सलामती के लिए यह व्रत करती हैं। साथ ही छठी मैया से जो मांगती है व पूरा होता है। इसमें सबसे ज्यादा महत्व डूबते सूर्य को अर्घ्य देना है। कार्तिक महीनें में मांस, मदिरा का सेवन भी नहीं करते हैं। उन्होंने बताया कि यहां 60 साल हो गए रहते हुए इसके पहले बिहार में रहती थी, वहां यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाते है वहां हर समाज के लोग यह व्रत करतें है। लेकिन यहां सिर्फ बिहारी ही इस व्रत को करते हैं।
तीसरे दिन शाम को देते हैं डूबते सूर्य को अघ्र्य
तीसरे दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन सुबह से व्रत करने वाला निराहार और निर्जल रहता है। अघ्र्य के समय सूप में फल, केले की कदली और ठेकुआ भोग के रूप में रखकर सूर्य भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद व्रत करने वाला पूरी रात निर्जल रहता है।
चौथे दिन सुबह दिया जाता है अघ्र्य
चौथे दिन यानी सप्तमी तिथि की सुबह सूर्योदय के समय सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण करता है। इस अघ्र्य के साथ व्रत पूरा होता है। यह व्रत बहुत ही कठिन होता है, इसके नियम भी काफी सख्त हैं। निष्ठा से और नियम से जो इस व्रत का पालन करता है, उसे छठ माता की कृपा मिलती है और उसके जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है।

ये है छठ पर्व की मान्यता
छठ पूजा की परंपरा पर अनेक पौराणिक और लोक कथाएं हैं। मान्यता है कि पहला छठ सूर्यपुत्र कर्ण ने किया था। माता सीता तथा द्रोपदी के भी करने की बात कही जाती है। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ पर्व के अवसर पर सूर्य की आराधना की जाती है। कहा जाता है कि नि:संतान राजा प्रियवंद से महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया तथा राजा की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति तो हुई, लेकिन वह मरा हुआ पैदा हुआ। राजा प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान चले गए और उसके वियोग में प्राण त्यागने लगे। कहते हैं कि श्मशान में भगवान की मानस पुत्री देवसेना ने प्रकट होकर राजा से कहा कि वे सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण षष्ठी कही जाती हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करते हुए ऐसा करने वाले को मनोवांछित फल की प्राप्ति का वरदान दिया। इसके बाद राजा ने पुत्र की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया। उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं कि राजा ने ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को की थी। तभी से छठ पूजा इसी दिन की जाती है।









