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कल है वर्ष का बड़ा मंगलवार, जानिये क्या करें इस दिन

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– पवित्र नदी में स्नान, दान, सत्य नारायण की कथा विशेष फल देगी
इटारसी। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष स्नान दान व्रत पूर्णिमा मंगलवार 14 जून को संत कबीर दास जयंती एवं दक्षिण भारत में वट सावित्री की पूजा की जावेगी। मां चामुण्डा दरबार के पुजारी गुरू पं. रामजीवन दुबे ने बताया कि वर्ष का बड़ा मंगलवार होने के कारण हनुमान मंदिरों में चोला चढ़ाकर श्री हनुमान चालीसा सुंदर कांड का पाठ-पूजा होगी। पवित्र नदियों में स्नान दान का विशेष महत्व बताया। भगवान जगन्नाथ जी स्नान के बाद 14 जून से अज्ञात वास में रहेंगे। जुलाई 2 को दर्शन देंगे।
संत कबीरदास जयंती धूम-धाम से मनाई जाएगी। भक्तों द्वारा घरों में भी गंगा जल मिलाकर व्रत, स्नानदान, सत्यनारायण की कथा होगी। हनुमान चालीसा सुंदरकांड का पाठ घरों एवं मंदिरों में होंगे। कबीर दास जी के जन्म के विषय में कुछ भी सटीकता से नहीं कहा जाता है। कुछ साक्ष्यों के अनुसार, कबीर दास जी का जन्म काशी में 1398 ईं में हुआ था। संत कबीर दास हिंदी साहित्य के ऐसे कवि थे, जिन्होंने समाज में फैले आडंबरों को अपनी लेखनी के जरिए उस पर कुठाराघात किया था। संत कबीरदास जी ने आजीवन समाज में फैली बुराइयों और अंधविश्वास की निंदा करते रहे। कबीरदास जी न सिर्फ एक संत थे बल्कि वे एक विचारक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जीवन जीने की कई सीख दी हैं। इनके दोहे अत्यंत सरल भाषा में थे, जिसके कारण उन दोहों को कोई भी आसानी से समझ सकता है। आज भी लोग इनके दोहे गुनगुनाते हैं। कबीर दास जी के जन्म के विषय में कई मतभेद मिलते हैं। कुछ तथ्यों के आधार पर माना जाता है कि इनका जन्म रामानंद गुरु के आशीर्वाद से एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और लोक-लाज के भय से उसने कबीरदास को काशी के समक्ष लहरतारा नामक तालाब के पास छोड़ दिया था, जिसके बाद उस राह से गुजर रहे लेई और लोइमा नामक जुलाहे ने इनका पालन-पोषण किया। वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि कबीरदास जन्म से ही मुस्लिम थे और इन्हें गुरु रामानंद से राम नाम का ज्ञान प्राप्त हुआ था।
कबीरदास जी ने अपने दोहों से लोगों के मन में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया और धर्म के कट्टरपंथ पर तीखा प्रहार किया था। इन्होंने समाज को सुधारने के लिए कई दोहे कहे। इसी वजह से ये समाज सुधारक कहलाए। उस समय समाज में कई तरह के अंधविश्वास फैले हुए थे। एक अंधविश्वास ये भी कायम था कि काशी में मृत्यु होने वाले के स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो वहीं मगहर में मृत्यु होने पर नरक भोगना पड़ता है। लोगों में फैले इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कबीर जी पूरे जीवन काशी में रहे लेकिन अंत समय मगहर चले गए और मगहर में ही उनकी मृत्यु हुई।
कहा जाता है कि कबीर जी को मानने वाले लोग हर धर्म से थे, इसलिए जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम दोनों में विवाद होने लगा। कहा जाता है कि इसी विवाद के बीच जब शव से चादर हटाई गई तो वहां पर केवल फूल थे। इन फूलों को लोगों ने आपस में बांट लिया और अपने धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया। स्नान,दान व्रत सत्य नारायण की कथा के साथ ज्येष्ठ माह का समापन होगा। संत कबीर दास महान कवी होने के बाद कलम, दवात, कागज का प्रयोग नहीं देखा गया था।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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