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कहानी : बड़ा दिन

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  • विनोद कुशवाहा :

रेस्टोरेंट की सीढ़ियां चढ़ते हुए जैसे ही नीचे की तरफ नजर गई तो पाया कि कोई देख रहा था । वही खुले बाल , वही रूप , वही रंग , वैसा ही सूट , वैसा ही ड्रेस सेंस । अंतर था तो केवल धूप के चश्मे का क्योंकि तुम तो कभी धूप का चश्मा लगाती नहीं थीं । उधर वह उस एक पल में ही मेरी बेचैनी समझ गई । उसने अगले ही पल चश्मा उतार लिया । चश्मा क्या उतारा मुझे असमंजस की स्थिति से उबार लिया । मैं हतप्रभ रह गया । तो ये कोई और था । काश् कि वह ऐसा न करती । रहने देती कुछ समय । … क्योंकि उस एक पल ने ही कितनी ही विस्मृत यादों को ताजा कर दिया । वह तारीख भी मैं कभी नहीं भूलता । 24 दिसम्बर । यानि बड़े दिन के एक दिन पहले । … पर मेरे लिये तो आज का ही दिन बड़ा दिन था । किसी को याद करने का दिन । किसी को याद रखने का दिन ।

ओह । तो ये हैं वो मोहतरमा । क्या याद दिला दिया । कभी सोचा भी न था कि ये चेहरा मेरे दिन का चैन और रातों की नींद हराम कर देगा । कभी सोचा न था कि इस कदर इस चेहरे की गिरफ्त में आ जाऊंगा । अब आलम ये है कि न तो दिल को कोई सुकून है न ही दिल को कोई करार है । काश् कोई हकीम होता जो इस दर्द का इलाज कर देता पर नहीं क्योंकि दर्द भी आप हैं और दवा भी आप ही हैं । अब अफसोस होता है कि कुदरत ने कितनी बार मुझे मौका दिया और मैंने उसे यूं ही गंवा दिया । वरना आज ये चेहरा मेरे इतने करीब होता कि मैं न केवल उसे देख पाता बल्कि महसूस भी कर रहा होता । उस दिन आपको देखने के बाद जब मैं आपके पीछे रेस्टोरेंट की सीढ़ियां चढ़ रहा था तो ऐसा लग रहा था कि सारी खूबसूरती , सारी कशिश , सारी कायनात आप में सिमट गई है । गजब का आकर्षण है । उस एक लम्हे को याद करता हूं तो लगता है कि सिर्फ इस एक लम्हे पर ही सारी ज़िंदगी कुर्बान की जा सकती है । क्यों कर रही हो मेरे साथ ऐसा । क्यों मुझे ऐसी डोर से बांध लिया है कि अब छूटना मुश्किल होगा । क्यूं अपनी तरफ खींच रही हैं । क्यूं हर पल आपकी उपस्थिति का अहसास बना रहता है । क्यूं मेरे आसपास बनी रहती हैं । क्यूं आपको पाने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं । क्यूं इस मृगतृष्णा के पीछे दौड़ रहा हूं । जबकि आपको सामने बिठाकर न जी भर के देख सकता हूं । न बातें कर सकता हूं । दिन का उजाला तो छोड़िये अंधेरा भी मुझे नसीब नहीं । मगर ये क्या मांग रहा हूं मैं । जबकि अब तो मैंने मिलने की भी उम्मीद छोड़ दी है । नहीं मिल पाऊंगा । अब कभी नहीं मिल पाऊंगा । … लेकिन मैं आपसे मिला भी । … और अंततः वह दिन भी आ गया जब वेदना ने मेरे जीवन में प्रवेश किया ।

आज वेदना ठान कर बैठी थी कि किसी तरह मेरे दिल का गुबार बाहर निकाल कर रहेगी ।

इधर मैं भी बोलने का मन बना चुका था । मैंने बोलना शुरू किया – ‘ बहुत सी इच्छाएं अतृप्त रह गईं वेदना । कितना कुछ सीखने की इच्छा मन में थी । ‘

‘ अरे मैं सब आपको सिखा सकती हूं । उसके लिए इतना टेंशन लेने की जरूरत क्या है । ‘ वेदना बोल पड़ी ।

मुझे एकबारगी विश्वास नहीं हुआ मगर मुझको वेदना पर अपने से ज्यादा विश्वास था । इसलिये मानना पड़ा ।

‘…लेकिन वेदना जितना समय आपने मुझे अपने से दूर रखा मेरा वह समय तो आप लौटा नहीं पायेंगीं और इसके लिये मैं कभी आपको माफ नहीं करूंगा । ‘ मैं पुरानी बातें याद कर के अब उखड़ रहा था ।

‘ ओफ्फो । आपके मूड का भी भरोसा नहीं । कभी भी कुछ भी सोच लेते हैं और वैसा ही रिएक्ट करने लगते हैं । ‘

‘ नहीं वेदना । मैं अंदर कुछ नहीं रखता । आपसे भी पहले मेरे जीवन में कोई आया था । ‘ मैंने डरते – डरते कहा ।

‘ … तो ? तो क्या हुआ । अब तो नहीं है न । ‘

‘ नहीं । अब नहीं है । जानती हो वो जो बोलती थी अक्सर सच हो जाता था । जब भी बोलती थी , बुरा ही बोलती थी । ‘

‘ ओह । थैंक गॉड । उससे आपका पीछा तो छूटा । सच बताना विकल । मुझसे तो कोई शिकायत नहीं न । ‘ वेदना के स्वर में चिंता थी ।

‘ है न ? आपने अब तक शादी क्यों नहीं की ? ‘

‘ अरे बाबा । अब ये कैसा सवाल है । ‘ वेदना ने सर थाम लिया ।

‘ नहीं । मुझे इस सवाल का जवाब चाहिए । अभी । इसी वक्त । ‘

‘ विकल ये बिल्कुल निजी प्रश्न है पर मेरे और आपके बीच में कुछ भी तो निजी नहीं रह गया है । हालांकि मैं इसका उत्तर देना जरूरी नहीं समझती । फिर भी आप सुनना चाहते हैं तो सुनिए । शादी नहीं करो तो सिर्फ एक ही दुख रहता है और अगर कर लो तो सौ दुख साथ में जुड़ जाते हैं । ‘ वेदना गंभीर थी ।

‘ तो क्या मुझसे शादी करने के बाद आपको दुख मिलने की उम्मीद है ? ‘

‘ नहीं । आप हर बात अपने ऊपर क्यों ले लेते हैं ? ऐसा होता तो मैं आपसे जुड़ती ही क्यों ? फिर अभी मेरा इस तरह का कोई इरादा नहीं है । सच बताना विकल आपको कहीं ये तो नहीं लगता कि आप गलत जगह आ गए हैं । ‘ वेदना का चेहरा सुर्ख हो गया था ।

‘ नहीं वेदना। माँ के बाद सबसे ज्यादा परवाह आप ही ने तो की है । कितनी चिंता करती हैं आप मेरी । कितनी फिक्रमंद रहती हैं आप मेरे प्रति । ‘ कहते हुए मैंने लाड़ से वेदना की गोद में अपना सर छिपा लिया ।

दूर सूरज ढल रहा था । छत पर फिर भी हल्की तेज धूप थी । वेदना ने अपनी गुलाबी साड़ी के आँचल से मेरा सर ढक लिया । मुझे माँ याद आ गई ।

हम दोनों नीचे उतर रहे थे । सीढ़ियों से । कमरे में जाने के लिये । घर में जाने के लिये ।

‘ ऐसा तो कभी नहीं हुआ पर अब हो रहा है । ज़िंदगी से निराश नहीं । अवसाद भी नहीं । फिर भी रोज की दिनचर्या क्यों बोझ लगने लगी है ? क्यों पहले जैसा सब कुछ नहीं रहा ? नौकरी से छुटकारा पाने की इतनी बड़ी सजा ? कोई भी मौसम क्यों न हो मैं तड़के ही उठ जाता था । उठ कर तैयार होना । फिर वही स्टेशन , वही प्लेटफार्म , वही ट्रेन , रोज साथ आने – जाने वाले वही हंसते – खिलखिलाते चेहरे , वही छोटा सा कस्बा , वही नापसंद नौकरी । कैसी भी नौकरी थी लेकिन मन तो लगा रहता था । काश् कि वे दिन लौट आते । अब हाथ आये हैं तो सिर्फ सूने दिन । लंबी रातें । आज आईने में बहुत दिनों बाद अपना चेहरा देखा तो नफरत सी होने लगी है इस चेहरे से क्योंकि यह वही चेहरा तो है जो कुछ लोगों को पसन्द नहीं था । क्या मेरा चेहरा सचमुच इतना बुरा है वेदना ? क्या मैं सच में इतना बुरा हूं ? अंदर से आवाज भी आती है -” हां हूं तो “। स्वभावगत् बुराईयां चेहरे पर कहां छिपती हैं । जितनी भी खामियां हैं , कमियां हैं , कमजोरियां हैं सब चेहरे पर आ ही जाती हैं । आंखें भी नहीं छिपा पातीं उन्हें । सामान्य सी मुस्कुराहट भी कुटिल बन जाती है । तो ऐसे में मैं क्या करुं ? बताओ न वेदना । है कोई रास्ता ? नहीं न ? अब तो शेष रह गई है प्रतीक्षा । अनन्त यात्रा पर जाने की । हो सके तो मुझे माफ कर देना । ‘ कहते – कहते मेरी आंखें भर आईं ।

इधर वेदना मौन थी । अंततः मेरे पीछे खड़ी वेदना सामने आ कर उसके पैरों के पास बैठ गई । उसने मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए । कभी न छोड़ने के लिए । दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था । … परन्तु कहीं न कहीं भावनाओं का एक सेतू तो था ही जिसने दोनों को जोड़ रखा था । कमरे में गहरा सन्नाटा व्याप्त था । बाहर तेज बारिश हो रही थी । एक तूफान बाहर था तो एक तूफान मेरे अंदर चल रहा था । अचानक जोर से बिजली कड़की । मैं सिहर उठा । वेदना ने मेरा सर अपने सीने में छिपा लिया । तूफान थम गया । बारिश की रफ्तार भी कम हो गई । मैं वेदना के दिल की धड़कन स्पष्ट सुन पा रहा था । मेरी आँखों में थमी नदी बह निकली ।

वह इतना बुरा तो नहीं था ।

” वेदना … ” मेरी सांसों से एक आह निकली ।

‘ … हूं । बोलिये । ‘ वेदना ने भी एक लंबी सांस लेते हुए मेरी नम आंखों में झांकने का प्रयास किया ।

‘ क्या आप पुनर्जन्म में विश्वास करती हैं ? ‘ दुख से पार पाने की कोशिश करते हुए मैंने प्रश्न किया ।

‘ … हां । जितना भी जानती हूं उतना पुनर्जन्म पर विश्वास करने के लिए काफी है और आप ये फालतू की बातों की तरफ ध्यान मत दिया करिये । ‘ वेदना ने मेरे बालों को सहलाते हुए जवाब दिया ।

‘ …मैं सच कह रहा हूं वेदना । मैं पुनर्जन्म चाहूंगा । कोई मिले न मिले इस प्रकृति से फिर मिलना चाहता हूं । बार-बार मिलना चाहूंगा । ‘ मेरे स्वर में भावुकता थी ।

‘ … अच्छा । तो अब की बार कहां जन्म लेंगे साहब । बनारस ? ‘ वेदना मुस्कुराई ।

‘ नहीं । ‘ मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया ।

‘ तो फिर कहां ? ‘ वेदना ने मुझसे आंखों ही आंखों में प्रश्न किया ।

“… कोलकाता …” मैंने वेदना की गोद से आजाद होते हुए जवाब दिया ।

‘ … सुनो । ‘ वेदना ने मेरे हाथ इस तरह फिर थाम लिए कि कहीं कुछ छूट न जाए ।

‘… बोलिये । ‘ मैंने अपने दोनों हाथों से वेदना के चेहरे को थाम रखा था ।

‘बोलिए न ।’ मैंने अपना कथन दोहराया ।

‘… फिर तो मैं भी पुनर्जन्म चाहूंगी । साथ ही ये भी चाहूंगी कि मेरा भी अगला जन्म ” कोलकाता ” में ही हो । यूं आपको अकेला नहीं छोड़ने वाली । ‘ वेदना ने मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा ।

मैंने वेदना को सहारा देकर उठाया और अपने पास ही बिठा लिया । दोनों चुप थे । दोनों खामोश थे ।

‘ मतलब आप किसी भी जन्म में पीछा नहीं छोड़ने वालीं । ‘ मैं मुस्कुराया ।

‘ नहीं । बिल्कुल नहीं । ‘ वेदना हर्षातिरेक से भर उठी । मुझको सामान्य होते हुए देखना उसके लिए एक सपने का पूरा हो जाने जैसा था ।

‘ … ओह । ‘ मैं गहन संतोष का अनुभव कर रहा था ।

‘ आप बैठिए । मैं आपके लिए कॉफी बना कर लाती हूं । … और हां अपने मोबाईल को साइलेंट मत रखा करिये । मुझे चिंता हो जाती है । आपको क्या । आप तो कभी कॉल बैक करते नहीं । नंबर तो वही है न आपका ? ‘ वेदना उठते हुए बोली ।

‘ … जी । वही है । मेरे दुख के अलावा जीवन में कुछ भी तो नहीं बदला । सब वैसा ही है । मैं ऐसे ही दुख के योग्य हूं वेदना क्योंकि मैंने जाने – अनजाने सभी को तो दुख पहुंचाया है । इसीलिए वही दुख तो लौटकर बार-बार मेरे पास आता है । आखिर क्यों उससे बचने का प्रयास कर रहा हूं लेकिन सच कहूं तो अब हिम्मत टूट रही है यार । ‘ हालांकि मैं अवसाद से उबरने की पूरी कोशिश कर रहा था ।

इधर मौसम भी साफ हो गया था । मैं जब घर आया था तब चारों तरफ तूफान से घिरा हुआ था । मन भी अशांत था । … पर अब सब कुछ सामान्य था । यह था वेदना की उपस्थिति का असर । उसकी उपस्थिति मात्र मेरे दुखों पर भारी पड़ती थी । ऐसे में मुझे सामान्य होने में भी देर नहीं लगती । आज भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था ।

जीवन से मन उचाट हो गया है । दिनचर्या बोझ लगने लगी है । न कुछ कहने का मन होता है न कुछ सुनने का ।

वैसे एक तरह से जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हूं । लिखने – पढ़ने से भी मुक्त हुआ जा रहा हूं । बस कुछ ऋण ऐसे हैं जिनसे मैं मुक्त नहीं हो सकता ।

जिनका कभी दिल दुखाया वे मुझे माफ करें । जो कारण-अकारण नाराज हैं वे भी मुझे क्षमा करें । क्षमा इसलिये करें क्योंकि उन्हें मनाने , उनके पास तक पहुंचने का मेरे पास अब समय नहीं रह गया है । ” कहते हुए मैं वेदना के सामने एक अपराधी की तरह बैठ गया ।

दुख तो मैंने वेदना को भी पहुंचाया था । अपराधी तो मैं उसका भी था । बावजूद इसके वेदना हमेशा यही कहती रही – ‘हर बार माफ़ ही तो करती आई हूं । इस बार भी माफ़ कर दूंगी ।’

… पर उसके रुख को देखते हुए लगता नहीं था कि वह अब की बार मुझे माफ़ कर देगी ।

वेदना मौन थी । मैं भी खामोश था । अंदर तूफान उठ रहा था । बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था ।

vinod kushwah

विनोद कुशवाहा
एल आई जी / 85
प्रियदर्शिनी कॉलोनी
इटारसी ( म. प्र.) .
96445 43026

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2 thoughts on “कहानी : बड़ा दिन”

  1. बेहद सुंदर भावपूर्ण कहानी है और सबसे खास बात यह है कि बड़े दिन की पूर्व संध्या पर इसे प्रस्तुत कर नर्मदांचल की संपादक ने पाठकों पर उपकार किया है कहानीकार भाई विनोद कुशवाहजी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इतनी सुंदर कहानी से पाठकों को अवगत कराया। सबसे सुंदर कहानी वह होती है जिससे पाठक अपने आपको विजुलाइज कर लें। विपिन पवार मुंबई

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  2. सबसे पहले पहले मैं विपिन पवार जी को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मुझे इतनी सुंदर भावपूर्ण कहानी पढने का अवसर दिया। विनोद कुशवाहा जी के नाम से भी उन्हींके जरिए परिचित हुआ परंतु कुशवाहा जी की कहानी आज पढने को मिली, बहुत ही सुंदर और बहुत कुछ कहती याद कराती कहानी। कुशवाहा जी को बहुत बहुत बधाई। एक शिकायत संपादक महोदया से है कि उन्होंने मुझे नर्मदांचल से जोड़ा पर सिर्फ समाचार तक सीमित रखा, साहित्य से नहीं जोड़ा और इस तरह मैं इतने अच्छे साहित्य से वंचित रहा। वह तो विपिन जी का आभार है। हालांकि नर्मदांचल से भी उन्होंने ही जोड़ा था। कुशवाहा जी बहुत बहुत बधाई।

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