इटारसी। सरस्वती विद्यालय मार्ग पर मधुर मिलन सेवा समिति द्वारा चल रही श्रीमद्भागवत सत्संग के तीसरे दिन संदलपुर खातेगांव केे संत भक्त पं.भगवती तिवारी ने कथा प्रसंग में बताया कि सतगुरु श्री शुकदेव मुनि ने सम्राट परीक्षित को समझाया कि भगवान की भक्ति, भगवान के लिए ही होना चाहिए, नाशवान वस्तुओं के लिए नहीं।
श्री तिवारी ने कहा कि भक्ति भव से पार होने के लिए हो, व्यापार के लिए नहीं हो। संसार के भोग पदार्थ के लिए भक्ति साधना करना घाटे का सौदा है। संसार के सुख भोगने पर भी दु:ख का अंत नहीं होता है। संसार में प्रत्येक मनुष्य को एक समय अवस्था आने पर घर, परिवार, नश्वर वस्तुओं से जो आसक्ति, लगाव है, उसे सद्ज्ञान आधार से छोडऩे का प्रयास अवश्य करना चाहिए।
श्रीमद्भागवत में कथा प्रसंग में ध्रुव वंश में राजा अंग के पुत्र वेण एवं राज पृथु के चरित्र, पुरंजन, प्रियव्रत, ऋषभदेव, जड़भरत, अजामिल, भक्त प्रहलाद, नरसिंह अवतार कथा प्रसंग आध्यात्मिक रूप से सुनाया।
उन्होंने कहा कि सन्यासी कभी गृहस्थी नहीं बन सकता है, परंतु गृहस्थ कुछ समय के लिए सन्यासी, त्यागी, साधु, संत बन सकता है। इसलिए गृहस्थ धर्म सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। समय, संपत्ति का सदुपयोग करना चाहिए। जनता की संपत्ति लेने वाले लोग बहुत हैं पर संताप लेने वाले कम हैं। श्री तिवारी ने कहा कि समय और जीवन अनमोल है, इसे बर्बाद न करें। मर्यादा छोड़कर जो अति सुख भोगता है, भगवान को उस पर दया नहीं आती है।
ईश्वर हमें कितना भी अच्छा बड़ा सब सुख संपत्ति प्रदान करे, हमें ज्यादा सुख नहीं भोगना चाहिए। हमें इतना ही सुख लेना चाहिए, जिससे भगवान जी का स्मरण बना रहे। जीव का स्वभाव है आवश्यकता से ज्यादा सुख में भगवान को धर्म को, मर्यादा को, शिष्टाचार को भूल जाता है। जरूरत से ज्यादा सुख धन, संपत्ति, मान बड़ाई जीव की दुश्मन बन जाती है। आवश्यकता से अधिक परमात्मा ने जो कुछ धन संपत्ति दे रखी है, उसका सदुपयोग करें, घर, परिवार के साथ समाज, गरीब, गौमाता, दीन दुखी की सेवा में लगाते रहना चाहिए।









