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श्री, शोभा और सौभाग्य की देवी महालक्ष्मी: क्यों है दीवाली मात्र धन का नहीं, सत्कर्म का पर्व?

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  • पंकज पटेरिया, पत्रकार, साहित्यकार,
Jharokha: The story of the finger, the slap and the punch

दीपावली का महापर्व आद्य शक्ति महालक्ष्मी को समर्पित है, जो आदि, अनादि और अनंत हैं। पुराणों में माता रानी के प्राकट्योत्सव की अनेक कथाएं सुविदित हैं। महालक्ष्मी, त्रिदेवों की शक्ति स्वरूपा त्रिमूर्ति हैं, यथा श्री दुर्गा, श्री सरस्वती और श्री महालक्ष्मी। यह त्रयी श्री, शोभा, सुषमा और सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं।

महालक्ष्मी का निवास और संदेश

माता रानी का निवास सदैव वहाँ होता है, जहाँ लोक मंगल की चिंता और लोक कल्याण के कार्य होते हैं। वह उन स्थानों पर क्षण भर भी नहीं ठहरतीं, जहाँ भोग-विलास, अकर्मण्यता और अव्यवस्था रहती है। यह स्पष्ट संदेश है कि लक्ष्मी केवल धन नहीं, बल्कि सद्गुणों और सत्कर्मों की प्रतीक हैं।

दीप मालिका: आदि कालीन समृद्ध परंपरा

यह ज्योति महापर्व, दीप मालिका, पौराणिक काल से चली आ रही एक समृद्ध परंपरा है। माता लक्ष्मी की पूजा-उपासना का यह पर्व छोटे-बड़े, निर्धन-धनवान सभी लोग अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा-भक्ति से मनाते हैं। अब तो संसार भर के विभिन्न देशों में भी अपनी परंपरा के अनुसार दीवाली मनाई जाती है।

श्री सूक्त और लक्ष्मी का स्वरूप

श्री सूक्त से महालक्ष्मी जी का पूजन करने का विशेष महत्व है। माता जी को ‘श्री’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है शुभ, सुंदर और कांति (तेज)। मां लक्ष्मी सर्व सुख और वैभव प्रदान करती हैं। लक्ष्मी जी की सुप्रसिद्ध आरती में भी यह उल्लेख है, खान-पान का वैभव सब तुमसे आता, जय लक्ष्मी माता। इससे स्पष्ट है कि सर्व सुख-समृद्धि माँ लक्ष्मी की कृपा से ही प्राप्त होती है।

स्वागत और सज्जा की परंपरा

लक्ष्मी धन की अधिष्ठात्री हैं और दीप पर्व धन का पर्व है। रिद्धि-सिद्धि और समृद्धि की दाता महालक्ष्मी के शुभ आगमन से सभी लोग हर्षोल्लास से भरे रहते हैं। लक्ष्मी जी के स्वागत में घर-घर में विशेष तैयारियां की जाती हैं:

  • स्वच्छता और सज्जा: घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन कर आकर्षक तरीके से साज-सज्जा की जाती है।
  • उत्साह: निर्धन वर्ग भी अपने कच्चे मकानों को लिपाई-पुताई कर सुंदर रूप देते हैं, तो पक्के मकान भी पेंट आदि से नए रूप में मुस्कुरा उठते हैं।
  • रंगोली: आंगन में रंगोली और मांडवे रचना की भी गौरवमयी परंपरा है। इन सबके पीछे मूल भावना यही है कि लक्ष्मी का वास स्वच्छ और पवित्र स्थान पर ही होता है।

पौराणिक प्राकट्य कथा

लोक जीवन में भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी की कई रूपों में अर्चना की जाती है। माता लक्ष्मी के प्राकट्य की एक प्रमुख पौराणिक कथा यह है कि पुरातन काल में जब सुर और असुरों ने मिलकर सागर मंथन किया था, तब वह रत्न रूप में 14 रत्नों में से एक रूप में सागर से प्रकट हुई थीं। इसलिए समुद्र को श्री लक्ष्मी जी का पिता और पृथ्वी को उनका मायका कहा गया है। देवी लक्ष्मी के रूप-वैभव को देखकर असुर गण उन्हें प्राप्त करना चाहते थे, पर माता लक्ष्मी ने कौस्तुभ मणि धारी भगवान श्री विष्णु जी को अपना स्वामी मानकर उनका वरण किया।

सही मायने में लक्ष्मी प्राप्ति का आधार

यह कहना उचित है कि सत्कर्म और परमार्थ ही सुखी जीवन का आधार हैं। हमें सदाचरण और परमार्थ करते हुए ही लक्ष्मी को प्राप्त करना चाहिए, तभी वह अपनी कृपा-आशीष सदा बनाए रखती हैं और स्थाई रूप से वास करती हैं। हमें इसी पावन भाव और संकल्प के साथ माता लक्ष्मी जी की पूजन कर दीप मालिका का यह जगमग पर्व मनाना चाहिए। लोकमंगल की भावना से हमारा भी मंगल स्वतः ही होता है। दीप महापर्व पर सुधी पाठकों और सभी आत्मीय जनों को हार्दिक शुभकामनाएं।

देहरी-देहरी रोशनी के फूल खिले।

घर-घर से तिमिर ढले।

हर-हर चेहरा उजास नहाए,

दीपावली ऐसे मनाएं।

— नर्मदे हर।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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