इटारसी। दीवाली के छह दिन बाद, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से शुरू होने वाला चार दिवसीय छठ महापर्व लोक आस्था, पवित्रता और कठोर तपस्या का अद्भुत संगम है। यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देव (सूर्य षष्ठी) और उनकी बहन छठी मैया (संतान की रक्षा करने वाली देवी) को समर्पित है, जो अब केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि अपनी सादगी और महत्व के कारण विश्वभर में रहने वाले भारतीय समुदायों द्वारा बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है।
छठ पर्व क्या है और कौन मनाते हैं?
छठ पर्व सूर्योपासना का एक अनूठा और अत्यंत कठिन व्रत है। इसे डाल छठ, सूर्य षष्ठी, और प्रकृति पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
- कौन मनाते हैं : यह पर्व मुख्य रूप से संतान के कल्याण, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के लिए स्त्री और पुरुष दोनों द्वारा समान रूप से मनाया जाता है। व्रती को परवैतिन कहा जाता है।
- देवता : इस पर्व में उगते और डूबते सूर्य (अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य) तथा छठी मैया की पूजा की जाती है। यह मान्यता है कि छठी मैया संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं।
छठ पर्व कब और कहां मनाया जाता है?
- कब होता है : यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है, पहला चैत्र शुक्ल षष्ठी को और दूसरा, जो अधिक प्रचलित है, कार्तिक शुक्ल षष्ठी को। यह दीपावली के ठीक छह दिन बाद आता है। इस वर्ष यह आज 25 अक्टूबर से शुरू हो गया है)।
- कहाँ मनाया जाता है: यह मूल रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों का सबसे बड़ा पर्व है। अब इसकी ख्याति और आस्था के कारण यह पर्व देश के हर कोने और विदेशों में भी भारतीय समुदाय द्वारा नदी, तालाबों या कृत्रिम घाटों पर मनाया जाता है।
व्रत की विशेषता (चार दिवसीय अनुष्ठान)
यह पर्व चार दिनों तक चलता है और हर दिन पवित्रता एवं नियम-संयम का पालन आवश्यक होता है।
- पहला दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय-खाय – व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर खुद को शुद्ध करते हैं। घर की साफ-सफाई होती है। इस दिन सात्विक भोजन (जैसे कद्दू-भात) ग्रहण किया जाता है, जो व्रत की शुरुआत का प्रतीक है।
- दूसरा दिन : कार्तिक शुक्ल पंचमी खरना/लोहंडा- व्रती दिन भर निर्जला (बिना जल) उपवास रखते हैं। शाम को गुड़ की खीर (रसियाव), पूड़ी और फल का भोग लगाकर व्रत खोला जाता है। इस भोजन के बाद, व्रती का 36 घंटे का कठोर निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
- तीसरा दिन : कार्तिक शुक्ल षष्ठी संध्या अघ्र्य – यह छठ पूजा का मुख्य दिन है। व्रती और परिजन नदी या तालाब के घाटों पर जाते हैं। बांस के सूप और टोकरी में ठेकुआ, फल, गन्ना और अन्य पारंपरिक प्रसाद रखकर डूबते हुए सूर्य को कमर तक पानी में खड़ होकर अघ्र्य दिया जाता है।
- चौथा दिन : कार्तिक शुक्ल सप्तमी उषा अघ्र्य एवं पारण – भोर में, यानी सूर्योदय से पहले, व्रती उसी घाट पर एकत्र होते हैं और उगते हुए सूर्य को अंतिम अघ्र्य देते हैं। अघ्र्य देने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे के अपने कठोर व्रत का पारण (समापन) करते हैं।
छठ पर्व का महत्व
छठ पर्व का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और पौराणिक भी है।
- सूर्य की ऊर्जा और आरोग्य : सूर्य को जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। डूबते और उगते सूर्य को अघ्र्य देने का विधान सूर्य की हर अवस्था के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिससे आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
- प्रकृति पूजा : यह पर्व पूरी तरह से प्रकृति की पूजा पर केंद्रित है, जिसमें सूर्य, जल और छठी मैया (प्रकृति का छठा अंश) की पूजा होती है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
- कठोर आत्मसंयम और शुद्धि : 36 घंटे का निर्जला व्रत और शुद्धता के कड़े नियम व्रती को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध करते हैं तथा आत्मसंयम और समर्पण की भावना को बढ़ाते हैं।
- संतान और पारिवारिक कल्याण : पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत को भगवान राम-सीता और महाभारत काल में द्रौपदी ने भी रखा था। यह विशेष रूप से संतान की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए फलदायी माना जाता है।
- सामुदायिक एकता : छठ घाटों पर सभी धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, जो सामाजिक सद्भाव और सामुदायिक एकजुटता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
छठ महापर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह अनुशासन, कृतज्ञता, शुद्धि और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का एक महान लोकपर्व है, जिसने अपनी पवित्रता और सादगी के कारण आज वैश्विक पहचान बना ली है।




