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सियासत का संक्रांति काल : अपनी-अपनी पतंगें और सूतते मांझे

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लेखक : पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक

Pankaj Pateriya

मध्य प्रदेश की सियासी फिजाओं में इन दिनों ‘चाय’ का उफान अपनी चरम सीमा पर है। राजनीति के इस आसमान में हर खिलाड़ी अपनी पतंग को सबसे ऊंचा उड़ाने की फिराक में है, लेकिन इस खेल में पेंच और काट-छांट का दौर भी उतनी ही तेजी से चल रहा है। वर्तमान परिदृश्य को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि सब अपना-अपना मांझा सूतने में व्यस्त हैं।

सियासत के कयास और पतंगबाजी

मकर संक्रांति बीत चुकी है, सूर्य देव उत्तरायण हो चुके हैं और मलमास की समाप्ति के साथ ही शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगी है। किंतु राजनीति का अपना एक अलग ‘मलमास’ और अपना ही ‘ज्योतिष’ होता है। यहां ग्रहों की चाल कब वक्री से मार्गी हो जाए और कब किसी की ‘साढ़े साती’ शुरू हो जाए, यह बताना बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए भी कठिन है।
फिलहाल, कयासों के कबूतर ऊंचे कंगूरों पर बैठकर गुटर-गूं कर रहे हैं। आसमान सफेद, केसरिया, नीली और पीली पतंगों से पटा पड़ा है। विडंबना यह है कि इस पतंगबाजी में मांझा बनाने वाले तो सुरक्षित हैं, पर ‘जनता’ का गला कट रहा है।

नए समीकरणों का उदय

सियासत में तब खलबली मची जब एक माननीय ने राज्यसभा न जाने की घोषणा की। इस एक बयान ने संभावनाओं का एक नया आकाश खोल दिया। मनोरंजन तो तब हुआ जब एक पक्ष के माननीय ने दूसरे पक्ष के नेता को राज्यसभा भेजने की वकालत कर दी। वहीं दूसरी ओर, सोशल मीडिया के मंच पर एक माननीय ‘घोड़े’ पर सवार होकर अवतरित हुए, जिसके निहितार्थों की गूंज सत्ता के गलियारों में अलग ही ढंग से सुनाई दे रही है।

गठबंधन और शह-मात का खेल

राजनीति के इस खेल में एक ‘भैया जी’ अपनी पतंग उड़ाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। वे अपना मांझा तो पहले से सूत ही रहे थे, अब दूसरे ‘भैया जी’ ने भी खुले दिल से उनके मांझे को सहयोग देने का ऐलान कर दिया है। यह गठबंधन कितना मजबूत होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

दूसरी ओर, एक ‘सो-कॉल्ड प्रिंस’ ने प्रदूषित पानी में छप-छप कर अपना फर्ज अदा किया, लेकिन इस बार ‘बागड़’ (घेराबंदी) इतनी मजबूत थी कि कोई नई धमाचौकड़ी नहीं हो सकी। इंदौर की व्यवस्था, जो इन दिनों अव्यवस्था के ‘अस्थमा’ से जूझ रही है, अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।

सत्ता के सारथी और महाकाल के खिलाड़ी

दिल्ली की ‘माई’ (मुख्यमंत्री) ने भी दतिया की पीताम्बरा पीठ के दर्शन कर पुण्य अर्जन किया और फिर ‘भैया’ के घर भोजन प्रसादी ग्रहण कर सियासी संदेश दे दिया। इधर, ‘बड़े माननीय’ ने विदेश जाने से पूर्व अपने रथ में कुछ नए और चुस्त-दुरुस्त ‘अश्वों’ को जोड़ा है, जिनकी चाल भविष्य की राजनीति तय करेगी।

इन सबके बीच, ‘बड़े भाई साहब’ जो महाकाल अखाड़े के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, शांत भाव से अपनी चालें चल रहे हैं। उनका मालवी अंदाज और मजबूती से सूता हुआ मांझा पिछले दो वर्षों से उनकी पतंग को ऊंचाइयों पर रखे हुए है। वे जानते हैं कि कौन से झोंके को फूंक मारकर उड़ाना है और कब ढील देनी है।

निष्कर्ष

फिलहाल ‘पुलिस-चोर’ का यह सियासी खेल दिलचस्प मोड़ पर है। हर कोई अपनी पतंग बचाने और दूसरे की काटने में लगा है। जनता मूकदर्शक बनी देख रही है कि इस बार किसका मांझा ज्यादा तेज निकलेगा और किसकी पतंग इस सियासी समर में कटी हुई पाई जाएगी।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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