इटारसी। तीन बंगला स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में आयोजित श्री शिव महापुराण कथा के छठवें दिन सुप्रसिद्ध कथावाचक देवी रत्नमणि द्विवेदी ने भगवान शिव के स्वरूप और उनके आभूषणों के गूढ़ रहस्यों का वर्णन किया।
राहु के सिर और मुण्डमाला की कथा
कथा के दौरान देवी जी ने बताया कि जब भगवान ने राहु के शरीर को दो भागों में बांटा, तब राहु शिव जी के मस्तक पर चंद्रमा के समीप स्थित हो गया। राहु के भय से चंद्रमा से जो अमृत कण निकले, उनके स्पर्श से राहु के अनेक सिर हो गए। भगवान शिव ने उन्हीं सिरों को लेकर मुण्डमाला बना ली, जो उनके कंठ का आभूषण बनी।
आभूषणों के पीछे का गूढ़ संदेश
- चंद्रकला और गंगा : भगवान के तीसरे नेत्र की ऊष्मा त्रिलोकी को भस्म करने में सक्षम है। उस ताप को नियंत्रित करने के लिए शिव जी ने मस्तक पर शीतल चंद्रमा और गंगा को धारण किया है।
- मुण्डमाला का अर्थ : शिव की मुण्डमाला मनुष्य को सदैव मृत्यु का स्मरण कराती है, ताकि वह संसार में दुष्कर्मों से दूर रहे।
- अमृत बनाम विष : देवी जी ने कहा कि यह आश्चर्य है कि विष पान कर शिव अविनाशी हो गए, जबकि अमृत पीकर भी देवता पूर्णत: अजर-अमर नहीं हुए।
महाशिवरात्रि पर कथा विश्राम
संयोजक मेहरबान सिंह चौहान ने बताया कि कल कथा का विश्राम होगा। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर में भगवान पशुपतिनाथ का भव्य रुद्राभिषेक और फलाहारी प्रसाद वितरण किया जाएगा। उन्होंने क्षेत्र के समस्त श्रद्धालुओं से इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने की अपील की है।









