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माँ काली के आशीर्वाद से ही होता है रावण वध, 82 वर्षों से कायम है परंपरा

माँ काली के आशीर्वाद से ही होता है रावण वध, 82 वर्षों से कायम है परंपरा

भूपेंद्र विश्वकर्मा की विशेष रिपोर्ट

भूपेंद्र विश्वकर्मा की विशेष रिपोर्ट
भगवान श्री राम और लंकापति रावण का युद्ध जब अपने अंतिम दिनों में था तो सत्य की विजय के लिए श्री राम ने समुद्र किनारे शक्ति की आराधना की थी जिसके बाद ही उन्हें विजयश्री मिली थी। उसी परंपरा को भारत के अनेक स्थानों पर आज भी सामाजिक समुदायों एवं धार्मिक संस्थाओं ने जीवित रखे हुए है।
इसी कड़ी में नवरात्रि के प्रथम दिन आपको इटारसी की उस देवी प्रतिमा से रुबरू कराएंगे, जिनके आशीर्वाद के बिना इटारसी में कभी राम ने रावण का वध नहीं किया।

82 वर्षों का उतार चढाव
श्री महाकाली मंडल द्वारा गुरुद्वारा भवन में विराजने वाली माँ काली की भव्य प्रतिमा इस वर्ष 82 वर्षों के उतार- चढ़ाव की यात्रा पूर्ण कर लेगी। इस प्रतिमा का विदित इतिहास सन् 1935 तक का मिलता है, हालांकि समिति के सदस्य इस बात को भी स्वीकारते है कि इस काली प्रतिमा को इससे भी पूर्व कई वर्षों से स्थापित किया जा रहा है।
समिति के वरिष्ठ सदस्य गोविन्द नारायण चौरे से हुयी विस्तृत बातचीत में उन्होंने बताया कि इस समिति की विशेषता है कि इसके शुरुआत काल से ही समिति में कोई भी सदस्य किसी पद पर नहीं रहा है अर्थात समिति से जुड़े सभी समिति के अध्यक्ष भी है और सदस्य भी।
श्री चौरे ने बताया कि अंग्रेजो के शासनकाल में शहर के ही एक कृषक प्रेमदास महोबिया ने माँ काली की इस मूर्ति स्थापना को साकार रूप दिया था। उस समय मूर्ति स्थामपना का खर्च सिर्फ चंद रुपयों में आता था, बाकि अन्य कार्य जैसे भंडारा-प्रसादी तो सामाजिक सहयोग से संपन्न हो जाते थे।
सन् 1935 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध अन्दोलनों के चलते श्री महोबिया को जेल जाना पड़ा तो उन्हें नवरात्रि में मूर्ति स्थापना की परपंरा के टूटने का डर सताने लगा। उन्होंने अपने जिगरी दोस्त शंकरभगवान चौरे से जब इस विषय में चर्चा की तो श्री चौरे ने इस बागडोर को संभालने का वादा किया और वर्ष 1935 से माँ काली मूर्ति स्थापना का जिम्मा शंकरभगवान चौरे ने संभाला।

 परन्तु जैसा की सर्वविदित है एक अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता और जब बात उस कार्य की हो जिसकी शहर में ही नहीं जिले में अपनी एक अलग पहचान हो तो इस पुनीत कार्य में साथ देने श्री चौरे ने अपने मित्र वल्लभ कुमार मालवीय, हरिसिंह छाबड़ा, लक्ष्मी सिंह ठाकुर, शेरसिंह भोला को भी अपने साथ ले लिया और इस पूरी मित्र मण्डली ने अपने दम पर ही इस परंपरा को बरक़रार रखा।
परंतु समय एक जैसा नहीं रहता, जहां आजादी के पहले ये मित्र मण्डली माँ काली के प्रति प्रेम और भक्ति में अपना तन-मन-धन से सहयोग करते थे वहीं आजादी मिलने के उपरांत भारतवर्ष में समय का चक्र भी बदलने लगा और बदलती मुद्राओं, बाजार के विस्तार व अन्य व्यक्तिगत कारणों से मूर्ति स्थापना में धन संबंधी बाधाएं भी आने लगी।
सन् 1993 में जब शंकरभगवान चौरे स्वर्गवासी हुए तो उनके पुत्र गोविंदनारायण चौरे ने अपने सह मित्रों के साथ समिति की बागडोर संभाली। इस समय भारत का स्वरुप बदल चुका था और सुविधाओं में भी विस्तार हो चुका था। जिस समिति को एक समय मूर्ति स्थापना के लिए कुछ रुपयों और सहयोग की आवश्यकता होती थी आज उसे हजारों रुपयों की जरुरत थी, परन्तु ये खर्च कहां से आये ये भारी चिंता का विषय था। तब समिति के ही एक सदस्य ने मूर्तिस्थापना के लिए ब्याज पर दस हजार रुपए लिए और अन्य सदस्यों की मदद से उस वर्ष मूर्ति स्थापना की ताकि किसी भी स्थिति में वर्षो से चली आ रही है परम्परा न टूटें।
माता की भक्ति का ऐसा अनोखा उदाहरण शायद ही अपने कभी सुना होगी कि किसी ने ब्याज पर पैसे लेकर भक्ति में लगायें हो। परंतु हमारा इटारसी अपने नाम को सार्थक कैसे न करेगा, अर्थात् जब इटारसी का संधि विच्छेद करके देखा जाये तो होगा ईंट और रस्सी होगा और दोनों ही किसी और तोड़ने नहीं अपितु जोड़ने के ही काम आते है। इस वर्ष के बाद से समिति के वह सदस्य जिन्होंने ब्याज पर पैसे लेकर मूर्ति स्थापना की थी उन्होंने उस समय नवागत सहारा इंडिया कंपनी में प्रतिदिन माँ काली के नाम से पचास रुपए जमा करने की सोचा ताकि आगामी किसी भी वर्ष में उन्हें पैसों से सम्बंधित किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
गोविंदनारायण चौरे के साथ उनके पिताजी के मित्र हरिसिंह छाबड़ा के पुत्र अमरदीप सिंह छाबड़ा, विजय बड़कुर, चंद्रदीप सिंह ठाकुर और राजू दमदम वाले ने तन, मन और धन से सहयोग करके समिति को लगभग 17-18 वर्षो तक अपने दम पर निरंतर गतिमान रखा। पिछले कुछ वर्षों में समिति में नए युवाओं ने जोश के साथ प्रवेश किया और मूर्ति स्थापना को आधुनिकताओं से भर दिया। आज समिति में लगभग 30 से 40 सदस्य है जो परिवार सहित माँ काली की पूरी नवरात्री में सेवा करते है।

रोचक और सत्य बातें जो जानना जरूरी है

इस प्रतिमा से जुडी सबसे रोचक बात यह है कि इसके प्रथम वर्ष स्थापना में इस प्रतिमा का निर्माण पुरानी इटारसी के जिस मूर्तिकार गोप द्वारा किया किया गया था और आज लगभग आठ दश‍क बाद भी इस प्रतिमा का निर्माण उन्ही के वंशज  द्वारा ही किया जाता है।
•शहर में आज कम युवा ये बात जानते होंगे कि पहले जब माँ काली रावण वध और श्री राम को आशीर्वाद देने गांधी मैदान जाती थी तो दो दिन उन्हें वहीं रखा जाता है ताकि सभी शहरवासी उनके दर्शन वहां आकर कर सके और शहर की लगभग सभी मूर्तियां वहीं जाकर दो दिन रू‍कती थी और उसके बाद तालाब में उनका विसर्जन किया जाता था, परंतु अब पिछले कई वर्षों से ज्यादातर प्रतिमाएं होशंगाबाद में नर्मदा नदी में विसर्जित की जाती है।
वर्षो से ही श्री महाकाली मंडल समिति के सदस्य स्वयं एक बड़ी धन राशि देकर माँ काली की मूर्ति स्थापना में विशेष योगदान करते है जबकि उनके कुल व्यय के अनुपात में प्राप्त चंदा सिर्फ पंद्रह से बीस फीसदी होता है।
•अंग्रेजों के शासनकाल से विराजित होने वाली प्रतिमाएं शहर में इक्का दुक्का ही है जिनमें महाकाली मण्डल की ये काली प्रतिमा अपनी एक विशेष पहचान बनाये हुए है।
मण्डल समिति द्वारा अभी तक के कार्यकाल में नवरात्रि में होने वाले कार्यक्रमो में शहर व जिले के वरिष्ठ शिक्षाविदों एवं बहुमुखी प्रतिभाशाली लोगो को ही आमंत्रित किया है और सादगी व सोहाद्रता से आयोजन को सफल बनाया है अर्थात् राजनीतिक एवं अधिकारी वर्ग को समिति ने बहुत कम आयोजनों में आमंत्रित किया है। साथ ही हर वर्ष का कार्यक्रम समिति बहुत ही सादगी और भव्य रूप से करती है।
•समिति में शामिल ज्यादातर सदस्य उन परिवारों के वंशज है जिनके मुख्य मार्गदर्शन एवं सहयोग से ही समिति का निर्माण हुआ और इतने भव्य स्वरुप में माँ काली की स्थापना व पूजा-अर्चना की जाती है।•सन् 1935 के समय जब मूर्ति स्थापना शुरू हुई तब प्रारंभिक वर्षो में मूर्ति भोला दीवान ज्वेलर्स की जयस्तंभ स्थित पूर्व दुकान में जहां अब कांच की दुकान है, विराजित की जाती थी उस समय गुरूद्वारे की सिर्फ नींव रखी गयी थी और जब गुरुद्वारा बनकर तैयार हुआ तो उसकी एक दुकान में मूर्ति स्थापना शुरू हुई। पिछले लगभग साठ वर्षो से ही माँ काली गुरूद्वारे में विराजित की जाती है।
•शुरुआत से ही माँ काली के गांधी ग्राउंड पहुंचे बिना न ही कभी रामलीला समाप्त हुई और न ही कभी रावण जला, परन्तु उस समय गांधी ग्राउंड वैसा नहीं था। जैसा आज है बल्कि फर्श लगा हुआ खुला मैदान था जिसे सभी गांधी मैदान के नाम से जानते थे।

गोविंदनारायण चौरे ने हमें एक रोचक बात बताई जो उन्हें उनके पिताजी ने बताई थी, कि यहा माँ काली शुरुआत से ही बड़ी साजसज्जा और ढोलबाजों के साथ विराजित और विसर्जित की जाती है, उस समय जब टेंट हाउस की आधुनिक लाइट नहीं थी तब भी उस समय का लाइट डेकोरेशन बल्बों से किया जाता था। साथ ही पंडाल में सिर्फ एक 500 वॉट का बड़ा बल्ब लगाकर रोशनी की जाती थी। मूर्तिस्थापना में भी बिना जनरेटर के दुकान दर दुकान ट्रेक्टर-ट्राली के साथ साथ बिजली लेकर विसर्जन में रोशनी की जाती थी, और ट्राली के आगे बढ़ने पर अगली दुकान के बिजली बोर्ड में केबल लगाकर रोशनी करते थे।

इस वर्ष का विशेष आकर्षण
इस वर्ष श्री महाकाली मण्डल ने मुलताई से विशेष रूप से विसर्जन वाले दिन के लिए बेंजो पार्टी और शहनाई बुलाई है और साथ ही समिति पिछले चार वर्षों से ड्रोन भी बुलाती है। जो गांधी मैदान में दशहरे के दिन सभी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र होता है। इस नवरात्रि नवमी के दिन यज्ञ और महाभंडारे का आयोजन किया गया है।

VRIDANVAN GARDEN, ITARSI

इटारसी का सर्वसुविधायुक्त मैरिज गार्डन

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