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52 वर्षों से सिर्फ मां के शांत स्वरूप की आराधना

52 वर्षों से सिर्फ मां के शांत स्वरूप की आराधना

भूपेंद्र विश्‍वकर्मा की विशेष रिपोर्ट

भूपेंद्र विश्‍वकर्मा की विशेष रिपोर्टनवरात्र के तीसरे दिन हमारी विशेष नवरात्रि कवरेज में शहर की उस प्रतिमा से रूबरू कराएंगे जिसके भक्त लगातार 52 वर्षों से मां को सिर्फ उनके शांत स्वरूप में ही पसंद करते हैं।
आज जिस समिति से परिचित होंगे उसका नाम श्री तरुण दुर्गा उत्सव समिति है, परंतु नाम के विपरीत समिति में सिर्फ तरूण ही नहीं बल्कि शामिल ज्यादातर सदस्य वरिष्ठजन हैं जो अत्यधिक सादगीपूर्ण माहौल में मूर्तिस्थापना करते हैं।

प्रारंभिक यात्रा
सन् 1966 से विराजित मां दुर्गा की प्रतिमा के प्रारंभिक वर्षों में मालवीयगंज क्षेत्र के प्रत्येक वर्ग के व्यक्तियों ने सहयोग दिया। जिसमें मुख्य रूप से नन्हे होटल के मालिक स्व.श्री नन्हेसिंह ठाकुर, किराना व्यापारी स्व.श्री भैयालाल गुप्ता, स्व. अरविन्द अवस्थी,

अमरीक सिंह सलूजा, मालक सिंह सलूजा, भगवान शंकर अखाड़े के संचालक एवं संरक्षक स्व. भगवानदास उस्ताद, स्व. सीताराम चौरे, स्व. रमेश मालवीय जो कि कारपेंटर थे और प्रत्येक वर्ष मां के पंडाल को सजाते संवारते थे। उस समय मूर्ति स्थापना का खर्च मात्र हजार रुपए के लगभग होता था, जिसमें समिति का चंदा मात्र सौ रुपए तक ही होता था बाकि राशि की व्यवस्था समिति के सभी सदस्य अपने आपस के सहयोग करके जुटाते थे।
तरुण दुर्गा उत्सव समिति की शुरुआती बागडोर इन सभी ने लगभग सन् 1985-86 तक बखूबी पूरे उत्साह एवं भक्ति से निभायी। उसके बाद समिति में कुछ नए चेहरों का आगमन हुआ जो अभी तक इस परंपरा को लगातार अपने पूर्ण सहयोग व नवीन जोश से संभाले हुए हैं। जिनमें मुख्य रूप से पूर्व नपाध्यक्ष अनिल अवस्थी, रमेश मालवीय, महेश मालवीय, जोगिन्दर सिंह सलूजा, हेमंत चौरे, आरडी रघुवंशी, महेश गुप्ता, प्रभुदयाल सोनी, मनोज तिवारी, बड़ेलाल भैया, कृष्णकुमार चौरे, कन्हैया राठौर, अनुराग गुप्ता, कपिल भाई, विजय सराठे आदि एक लंबे अरसे से मां की इस अनुपम भक्ति के समिति के सदस्य के रूप में साक्षी हैं। इनमें से ज्यादातर सदस्यों ने लगभग अपनी आधी उम्र मां की भक्ति में सहयोग देकर व्यतीत की

है। इस वर्ष ये देवी प्रतिमा अपने सादगी और सदभाव से भरे 52 वर्ष पूर्ण कर लेगी। परंतु प्रारंभ से ही इनके सौंदर्य और सादगीपूर्ण स्थापना का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिल सका है। कुछ ऐसा विशेष है यहां, जिससे आज भी इनके जैसी शहर की कोई दूसरी प्रतिमा शांति की परिचायक नहीं होती। समिति के सभी सदस्य सदैव मां से विनती करते हैं कि वे सदा इस पावन पर्व नवरात्र में उनकी सेवा कर सके।

वो सत्य और रोचक बातें जो आपको जानना जरूरी है 
• यहां विराजमान होने वाली मां की लगभग 8 फिट ऊंची और भव्य प्रतिमा अपने प्रथम वर्ष में सिर्फ 51 रुपए में हीरालाल मूर्तिकार ने बनाई थी, वही आज इसी ऊंचाई और भव्यता की प्रतिमा लगभग बीस हजार रुपयों में तैयार की जाती है।

• यहां विराजमान होने वाली मां की लगभग 8 फिट ऊंची और भव्य प्रतिमा अपने प्रथम वर्ष में सिर्फ 51 रुपए में हीरालाल मूर्तिकार ने बनाई थी, वही आज इसी ऊंचाई और भव्यता की प्रतिमा लगभग बीस हजार रुपयों में तैयार की जाती है।

• प्रथम वर्ष मूर्ति स्थापना करते समय समिति के किसी भी सदस्य को समिति के लिए उचित नाम नहीं मिल रहा था जिसे समिति सदस्यों के मित्र एवं शिक्षक श्री चौहान सर ने श्री तरुण दुर्गा उत्सव समिति रखा था।

• इस समिति की मूर्तिस्थापना में एक मुख्य बात यह भी है कि ये चंदे की राशि के लिए स्थाइपना स्थिल के आसपास की दो लाइनों में सिर्फ और सिर्फ एक बार ही भ्रमण करते हैं और लोगों के श्रद्धा अनुसार दी गयी राशि से ही व्यय करते हैं। ये समिति कभी किसी के घर चंदे की राशि के लिए दोबारा नहीं जाती। जिस किसी परिवार या व्यक्ति को राशि दान देना होता है वे स्वयं समिति के सदस्यों के पास जाकर देते हैं। साथ ही समिति के सदस्य पूर्णाहुति के बाद बंटने वाले महाभंडारे के प्रसाद को सभी दान दाताओं और मोहल्लेवासियों तक स्वयं घर घर जाकर पंहुचाते हैं।

• प्रतिमा स्थापना के प्रारंभिक वर्षो में भगवान शंकर अखाड़े का बड़ा नाम रहा है। शहरवासी नवरात्री के समय यहा मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ ही अखाड़े के बालकों द्वारा की जाने वाली विभिन्न कलाबाजियां भी देखने आते थे और आज शहर के बहुत कम ही युवा ये बात जानते होंगे की नवरात्रि में नगरपालिका एक समय में चल समारोह भी आयोजित करती थी और उस चल समारोह में इस देवी प्रतिमा समिति को व अखाड़े को कई वर्षों तक प्रथम पुरस्कार भी मिला था।

• समिति में शामिल एक सदस्य कपिल भाई ऐसे भी हैं जो बचपन से धर्म या जाति से नहीं अपितु कर्म और संस्कार से माँ के भक्त है। देश दुनिया में जहां धर्म और जाति से लोगो की भक्ति का निर्धारण होता है, वहीं समिति के अन्य सदस्य इनकी मां के प्रति निश्छल भक्ति से प्रभावित है। ये बचपन से ही मां की मूर्तिस्थापना में तन-मन-धन से पूर्णत: सहयोगी हैं और आज भी पूरे जोश और नौजवानों की तरह ही मूर्तिस्थापना में कार्य करते है। इसके लिए इन्हें  दशहरा मैदान में सम्मानित भी किया जा चुका है। कपिल भाई धर्म के उन सभी ठेकेदारों और कॉपीराइटर्स के मुंह पर तमाचा है जो भगवान की भक्ति को भी जाति वर्ग में बांटते हैं, साथ ही उन लोगो के लिए एक प्रेरणा है जो विश्व में अच्छे कार्य संपादित करने से सिर्फ किसी अन्य धर्म के होने की वजह से पीछे हट जाते हैं।

• पिछले लगभग 15 वर्षों से मूर्ति स्थापना में देवी मां की प्रतिमा बनवाने की पूर्ण राशि मनजीत सिंह सलूजा व उनके परिवार द्वारा दी जाती है। सलूजा परिवार प्रारंभिक वर्षों से ही मां की भक्ति में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहा है।

• नौ दिनों तक यज्ञाचार्य श्री रामगोपाल शास्त्री आज भी लगातार 35 वर्षों से इस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कराते हैं और हवनपूजन संबंधी सभी कर्म करते हैं।

• लगातार 52 वर्षो से समिति के सदस्य अन्य सभी समितियों से अलग पूरे नौ दिन सादगी पूर्ण तरीके से पूरी बिना किसी दिखावे के कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। जो आज वर्तमान के युग में सभी मूर्तिस्थापना करने वाली समितियों के लिए एक सीख है।

• लगातार इतने वर्षों तक माँ के अनेक रूपों में से सिर्फ एक ही शांतिस्वरूप को स्थापित करने के लिए प्रारंभिक वर्षो में समिति संभाग एवं जिले स्तर पर एवं वर्तमान में नगर स्तर पर लोकप्रिय है।

• माँ दुर्गा की इस समिति के प्रत्येक सदस्य पर ऐसी अनूठी कृपा है जिससे आज सभी सदस्यों के पुत्र-पुत्री हर क्षेत्र में अपना विशेष नाम बनाये हुए हैं।

इस वर्ष का आकर्षण  
इस वर्ष भी हर वर्ष की तरह ही समिति द्वारा विशाल भंडारे-प्रसादी का आयोजन दशहरे के दिन किया जा रहा है।

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