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आओ हाथ मिलाएं, अपने शहर को मंदिर की तरह बनाएं

आओ हाथ मिलाएं, अपने शहर को मंदिर की तरह बनाएं

रोहित नागे (लेखक, स्वच्छ भारत मिशन के स्वच्छता ब्रांड एम्बेसडर हैं)
बदलाव की बयार है! क्यों न हम भी इसमें बह निकलें। उस नदी की तरह जो जब अपने पथ पर बहती है तो बहा ले जाती है, सारा कचरा। हमें भी कचरा साफ करना है। घर हमारा है, इसलिए हम इसे साफ रखते हैं। शहर हमारा है तो इससे परायापन का व्यवहार क्यों? सफाई जहां होगी, वहां भगवान का वास होगा। क्या हम नहीं चाहते कि हमारे शहर में भगवान का वास हो। यदि हां, तो फिर क्यों अपने ही शहर को गंदा करते हैं, क्यों इसके लिए अपने फजऱ् को भूल जाते हैं। अपना घर, अपनी दुकान को साफ करके सारा कचरा अपने ही शहर को गंदा करने के लिए फैक देते हैं। क्या यह हमारे सभ्य होने की निशानी है? निश्चित ही यह असभ्यता की निशानी है। किताबों में छपे अक्षरों को पढ़कर स्वयं के पढ़े लिखे होने का दंभ भर है। वास्तव में हमारा व्यवहार किसी अनपढ़ के सरीखा ही है।
जब बयार बदलाव की बह ही रही है तो क्यों न हम बड़े बदलाव के लिए छोटे प्रयासों से शुरुआत करें। जैसे मंदिरों को साफ रखते हैं, अपने घर को साफ रखते हैं, तो अपने शहर को भी साफ रखें। आपको इसके लिए झाड़ू भी हाथ में नहीं लेना है। कचरा भी साफ नहीं करना है। कितना अजीब है ना? न आप झाड़ू लगाएंगे, ना ही कचरा साफ करेंगे, फिर भी अपने शहर को साफ करने में अपना योगदान दे सकेंगे। सिर्फ इतना ही करना होगा, कि आपके घर से या दुकानों से निकला कचरा अपने घर और दुकान में डस्टबिन रखकर उसमें ही रखें और कचरा वाहन आने पर उसमें डालें या फिर बाजार में लगे डस्टबिन में अपने कर्मचारी के हाथ पहुंचाकर डलवा दें। सिर्फ इतना सा त्याग आपके शहर को सफाई में नंबर वन बना देगा और आपका यह कदम आपको महानता की ओर ले जाने में सहायक होगा।
आपके ही जेब से निकलने वाला पैसा टैक्स के माध्यम से सरकारी खजाने से होकर आता है, तो क्या यह आपका नहीं हुआ? जब घर आपका, पैसा आपका, शहर आपका तो फिर इसे साफ रखने का जिम्मा दूसरों का कैसे हुआ? अपना नागरिक धर्म निभाने के लिए मन बदलिए, चलिए अपने शहर को मंदिर बनाने के लिए आपकी ही सरकार के हमकदम बनिए। सरकार ने तो ठान ली है, बदलाव लाने के लिए आपको भी ठान लेना चाहिए। आपका शहर नंबर वन होगा तो आप भी अपने शहर पर गर्व कर सकेंगे। आपके मित्र, आपके रिश्तेदारों को कह सकेंगे कि हम सफाई में नंबर वन शहर के वाशिंदे हैं। यह निवेदन शहर के हर उस जिम्मेदार और सम्माननीय नागरिक से है, जो अपने शहर पर गर्व करने की मंशा रखता है, जो इस शहर की माटी में, शहर की आवोहवा में सांस ले रहा, यह शहर जिनकी जन्मभूमि, मातृभूमि, कर्मभूमि है। उस हर नागरिक को अपने योगदान के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। आपका साथ, अवश्य इस शहर को ऐतिहासिक ऊंचाईयों पर ले जाएगा।
हम सभी समझदार हैं, लेकिन समझदारी दिखाने का वक्त आ गया है। आईए हम स्वच्छ भारत अभियान में अपने शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने अपनी दुकान और घर में दो डस्टबिन का उपयोग शुरु करें। गीला और सूखा कचरा अलग-अलग डस्टबिन में रखें। गीला कचरा अर्थात फल, सब्जी और खाद्य पदार्थ, जूठन जैसे गीले कचरे को अलग और कागज, कांच, लकड़ी और ऐसी ही अन्य वस्तुएं, धूल-मिट्टी सूखे कचरे की श्रेणी में हैं। इनको अलग-अलग डस्टबिन में रखें और कचरा वाहन आने पर उसमें भी दो अलग-अलग भाग हैं, एक गीला कचरा और दूसरा सूखा कचरा के लिए। नीले हिस्से में सूखा और हरे हिस्से में गीला कचरा डालें। अपना नागरिक धर्म निभाएं और आपके घर या दुकान के सामने या सड़क पर न तो स्वयं कचरा फैकें और ना ही दूसरे को ऐसा करने दें। जो गंदगी करता है, उसे प्रेम से समझाएं, न क्रोध करें और ना झगड़ा। प्रेम से समझाएं, आज नहीं तो कल बदलाव अवश्य आएगा, ऐसी हमारी सोच है।
हमारा प्रयास, आपका साथ मिलेगा, तभी बनेगी बात।

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