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उपन्यास अंश : एक टुकड़ा आसमान

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कॉफी का कप लिए बालकनी में बैठे विराग के साथ आज कोई नहीं था । अतीत और अवसाद दोनों उसके दांयें बांयें बैठे थे। ऐसे में मौसम भी उनके साथ बराबरी से खड़ा था । उदासी का आलम था । कहीं से कोई फोन नहीं । न कोई मैसेज । विराग के लिये संवादहीनता की ये बेहद खतरनाक स्थिति थी । वह आज भी अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूला था । बचपन में ही पिता नहीं रहे । आजीविका का कोई रास्ता नहीं था । कभी – कभी भूले – भटके रिश्तेदार – नातेदार ही माँ को मदद कर देते । स्वाभिमानी होने के बावजूद माँ मजबूरी में उसे स्वीकार भी कर लेतीं । शायद ऐसा करते हुए विराग का चेहरा उनके सामने आ जाता होगा । इसके बाद भी वे कपड़े सिलतीं , मिट्टी के चूल्हे बनाकर बेचतीं । … और विराग । गर्मी में सुबह आईसक्रीम बनाने चला जाता । इस बहाने वह उसका स्वाद भी चख लेता । गर्मियों की छुट्टियों में ही दोपहर में विराग टेलरिंग का काम भी सीखता था । रात उसका एक दोस्त उसे अपने फोटो स्टूडियो में फोटो डेवलप करना बताता । बरसात में पड़ोस में राखी बनाने का काम विराग के हाथ लग जाता था । ठंड के मौसम में विराग रद्दी खरीदता और फिर बेचने के लिए उसके लिफाफे बनाता । इस तरह कोई भी मौसम उसका अपना नहीं होता था क्योंकि साथ-साथ उसकी पढ़ाई भी चलती रहती थी । पढ़ाई के लिए उसे कोई समझाने वाला भी नहीं था कि क्या पढ़ना सही है और क्या गलत । यही वजह थी कि विराग को जो सरल लगा वही विषय लेकर वह पढ़ता रहा । कॉलेज में पहुंचते ही एक नई दुनिया से उसका सामना हुआ । जहां चारों तरफ रंगीनियां थी मगर इससे कोसों दूर विराग के लिए पढ़ाई ही सब कुछ थी । इस बीच एकतरफा प्रेम से जरूर वह रूबरू हुआ । नित्या । सबसे पहले नित्या उसकी तरफ आकर्षित हुई । वह इस बात से अनजान था । जब उसे समझ आया तो विराग सम्हल गया क्योंकि विराग के लिए वह एक क्लासमेट से ज्यादा कुछ भी नहीं थी । बावजूद इसके वह उसकी भावनाओं का बेहद सम्मान करता था । इसलिये वह उसका दिल तोड़ना नहीं चाहता था । यही वजह थी कि विराग केवल नित्या का मन रखने के लिए उसे समय देने लगा । हालांकि उसने नित्या से एक मर्यादित दूरी बना कर रखी थी । दोनों जब कॉलेज की कैंटीन में कॉफी पीने के लिये साथ होते तो कभी-कभार विराग अपने सुख-दुख भी उसके साथ शेयर कर लेता । तब नित्या उसे बहुत ध्यान से सुनती और उसे तसल्ली भी देती । विराग की कहानियां अक्सर अखबारों में वह पढ़ती रहती थी । उसकी कहानी नायिका प्रधान ही होती थीं । विराग को शरतचन्द्र के स्त्री पात्र बेहद प्रभावित करते थे । इसलिए नित्या ये अच्छी तरह जान चुकी थी कि विराग अपनी नायिका में क्या चाहता है । जब वह कॉलेज में आती तो हमेशा नीले और गुलाबी रंग की साड़ी में ही विराग को दिखती । खुले बाल । माथे पर लाल रंग का चमकता हुआ बड़ा सा सूरज । ज्यादा मेकअप तो वैसे भी वह कभी नहीं करती थी । परफ्यूम लगाना उसने छोड़ ही दिया था क्योंकि उसे मालूम था कि विराग को परफ्यूम से एलर्जी है । इससे जुड़ी एक घटना तो नित्या की आंखों के सामने ही हुई थी जब कॉलेज में उसकी ही एक शरारती क्लासमेट सुमिता ने विराग की शर्ट में कोई फ्रेंच परफ्यूम स्प्रे कर दिया था । विराग उस पर बेहद नाराज भी हुआ था । वह रो पड़ी लेकिन विराग पर उसके आंसुओं का कोई असर नहीं हुआ । हालांकि वह बहुत संवेदनशील था । क्षमाशील भी । … परन्तु विराग ने अपनी क्लासमेट को इसके लिये कभी माफ नहीं किया ।

एक दिन वह कॉलेज नहीं आया तो दिन भर नित्या का मन भी कॉलेज में नहीं लगा । शाम को वह अपने को रोक नहीं पाई और खुद ही कार ड्राइव करते हुए विराग के घर जा पहुंची । उसका घर ढूंढना नित्या के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था । वह अपनी लूना से दिन भर में उसके घर का एक चक्कर तो लगा ही लेती थी । विराग के घर के अंदर जाते ही नित्या का सामना उसकी माँ से हुआ । उसने जैसा उनके बारे में सुना था वैसा ही उनको पाया भी । कुछ भगवा रंग लिए हुई उनकी साड़ी और चेहरे की आभा देखकर नित्या का सर विराग की माँ के सामने श्रद्धा से अपने आप झुक गया । नित्या ने सर पर पल्ला लिया और आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए । सहज , सरल , सौम्य विराग की माँ ने उसके सर पर दोनों हाथ रख दिये । उनके हाथों का वह स्पर्श नित्या ज़िंदगी भर नहीं भुला पाई । आज भी नित्या साड़ी ही पहने हुए थी । ब्राऊन कलर की साड़ी । वह जानती थी कि विराग को ये रंग भी बहुत पसंद था।

‘ सुखी रहो । नित्या हो न ? ‘
‘ अरे माँ जी आपको कैसे मालूम हुआ कि मैं नित्या हूं । ‘ नित्या को विराग की माँ के मुंह से अपना नाम सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ ।
‘ मुझे कौन बताएगा बेटी । विराग ही कॉलेज से लौटकर दिन भर के हालचाल सुनाता रहता है । आओ अंदर चलते हैं । विराग अपने कमरे में लेटा है । ‘
माँ ने नित्या का हाथ थाम लिया । माँ के हाथ के छूने मात्र से ही उसे सुख की अनुभूति हुई । उसने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि वे ऐसे ही उसका हाथ हमेशा थामे रहें । नित्या ये भी देख रही थी कि विराग के घर की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं थी मगर घर साफ -सुथरा और व्यवस्थित था । जैसे ही विराग ने नित्या को माँ के साथ अपने कमरे में देखा तो वह स्तब्ध रह गया ।
‘ अरे आप ? ‘
‘ क्यों ? क्या मैं आपके घर नहीं आ सकती ? देखिये न माँ जी । ‘ नित्या ने शिकायती लहजे में कहा ।
‘अब तुम दोनों जानो बेटा । तुम लोगों की बातें मुझे समझ में नहीं आयेंगीं । तुम बैठो जब तक मैं चाय बनाकर लाती हूं । ‘ कहकर माँ जाने लगीं ।
‘आप बैठिए न माँ जी । वैसे भी मैं ज्यादा चाय नहीं पीती।’ नित्या ने माँ का हाथ अभी तक नहीं छोड़ा था ।
‘ नहीं बेटा । विराग ने भी चाय नहीं पी है । आप लोग बात करो । मैं चाय बनाकर लाती हूं । ‘
‘ अरे मुझे ‘आप’ नहीं कहिए माँ जी । चलिए आज मैं आपको चाय बना कर पिलाती हूं । ‘ नित्या खड़े – खड़े ही मुड़ते हुए बोली ।
‘ नहीं नित्या । आप माँ को ही चाय बनाने दो। उनके हाथ की चाय का अपना अलग स्वाद है । आप हमेशा याद रखेंगीं । ‘ विराग बीच में बोल उठा ।
‘ … अरे आप भी मुझे बार-बार ‘ आप ‘ क्यों कह रहे हैं । क्या मुसीबत है । पता है आप लोगों से कितनी छोटी हूं मैं । चलिये छोड़िये । आज मैं माँ से चाय बनाना सीखूंगी । ‘ नित्या माँ के पीछे – पीछे किचन में जाने लगी ।
‘ बेटी आप यहीं बैठो । मैं अभी आती हूं । ‘ कहते हुए माँ कमरे से बाहर हो गईं ।

नित्या विराग के बिस्तर पर ही बैठ गई । विराग ने तुरंत उसे टोंका ।

‘ मेरे पास नहीं नित्या । मुझसे दूर बैठिए । वरना आप को भी ज़ुकाम हो जाएगा । ‘ विराग कुछ चिंतित दिखाई दिया ।
‘ वैसे भी आप मुझे कब आप अपने पास आने देते हैं । ‘ नित्या की आंखें डबडबा आईं ।

विराग खामोश रहा । उसने पास रखा शरतचंद्र का उपन्यास ‘ श्रीकांत ‘ उठा लिया और उसे पलटने लगा ।

‘ आप मेरी इतनी उपेक्षा क्यों करते हैं विराग ? इतना अपमान । इतना तिरस्कार । मैंने क्या बिगाड़ा है आपका ? आप जानते हैं न मैं आपसे कितना प्रेम करती हूं ? मैंने आपसे प्रेम करती हूं । क्या प्रेम करना कोई गुनाह है ? ऐसा कौन सा अपराध किया है मैंने जिसकी आप मुझे इतनी बड़ी सजा दे रहे हैं । मेरे वश में कुछ भी नहीं है विराग। दिल ने जो कहा मानना पड़ा । पहले तो आप ये पुस्तक अलग रखिए । मैं पागलों की तरह बोले जा रहीं हूं और जनाब पुस्तक पलट रहे हैं । अभी पुस्तक पढ़ना जरूरी है क्या । जब देखो तब पढ़ना … पढ़ना … पढ़ना । ‘ विराग के हाथ से पुस्तक छीनते हुए नित्या भड़क गई ।
‘ आप कोई और बात नहीं कर सकतीं नित्या । ‘
‘ दूसरी बात क्यों करूं । आप नहीं जानते । कुछ नहीं समझते । कैसे लेखक हैं आप ? एक लड़की के मन की बात नहीं समझ पाए । जबकि ये मेरे जीवन मरण का प्रश्न है । किसी दिन कुछ कर बैठूंगी न तब आपको सब समझ आ जाएगा । ‘ वह अपने आंसू पौंछ रही थी । विराग मौन रहकर इधर उधर देख रहा था ।
‘ मेरा घर देख रहीं हैं आप । किताबों के अलावा मेरे पास कुछ भी नहीं है । अभी तो मेरे पास नौकरी भी नहीं । बस कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रहा हूं । प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता हूं । फिलहाल मेरा लक्ष्य भी वही है । ‘

कहते – कहते विराग को खांसी चलने लगी । नित्या खड़ी हुई और टेबिल से गिलास उठाकर उसने विराग को अपने हाथ से पानी पिलाया । वह मना करता रह गया ।

‘ मैं क्या आपके लक्ष्य में बाधा बन रही हूं ? ‘
‘ नहीं । ऐसा कुछ नहीं है । आपने परफ्यूम लगाया है क्या ? ‘ विराग ने बात बदलते हुए नित्या से सवाल किया।
‘ पागल हो गए हो क्या । जीवन में कभी उस दुकान के सामने से भी नहीं निकलूंगी जहां परफ्यूम मिलता है । लगाना तो बहुत दूर की बात है । ‘ नित्या ने नाराजगी भरे स्वर में कहा ।
‘ मेरे लिए इतना बड़ा त्याग मत कीजिए । ‘ विराग ने दोनों हाथ जोड़ लिए ।

नित्या गुस्से में उठी और किचन में चली गई । विराग ने पढ़ने के लिए फिर से उपन्यास उठा लिया । इधर नित्या जब लौटी तो उसके हाथ में ट्रे और माँ साथ थीं । वह विराग के पास ही कुर्सी खींच कर बैठ गयी ।

‘ विराग चाय मैंने बनाई है और पोहा तुम्हारे लिए नित्या ने बनाया है । इसे कैसे मालूम कि तुम्हें पोहे में आलू और लहसुन अच्छा लगता है । ‘ माँ ने विराग के सर पर हाथ फेरते हुए पूछा ।
‘ ये प्रश्न तो आप इन्हीं से ही पूछिये माँ । ‘
‘ कुछ मत बोलिये माँ जी । नहीं तो ये पोहे में हाथ भी नहीं लगायेंगे । मैंने बनाया है न । बहुत बड़ी गलती हो गई मुझसे । ‘
‘ ऐसा क्यों बोल रही हो बेटा ? क्या दोनों में झगड़ा हुआ है ? ‘ माँ ने नित्या के सर पर हाथ फेरा ।

विराग ने सबसे पहले पोहे की ही प्लेट उठाई । नित्या की नजरें झुकी हुईं थीं । जैसे कोई परिणाम घोषित होने वाला हो ।

‘ पोहा तो बहुत अच्छा बना है माँ । ‘ विराग ने माँ की ओर देखते हुए कहा ।
‘ धन्यवा द् । कम से कम आपको मेरे हाथ का कुछ तो पसन्द आया । ‘ नित्या ने कटाक्ष किया ।
‘ अरे ये तुम दोनों किस तरह से बात कर रहे हो । नित्या
उसकी तबीयत ठीक नहीं है न बेटा । रात भर सो भी नहीं पाया । ‘ माँ ने नित्या को प्यार से देखते हुए कहा ।
‘ नहीं माँ जी । ये भी हमेशा मुझसे ऐसे ही बात करते हैं । जली – कटी । बहुत अपमानित करते हैं मुझे । तबियत खराब है तो आराम क्यों नहीं करते । इतना क्यों पढ़ते हैं । दिमाग पर स्ट्रेस नहीं पड़ता क्या । ‘
‘ बेटा उसको एक ही तो शौक है । पढ़ने का । अपने समय में मुझे भी रहा है । अब कम दिखता है । इसलिये सब छूट गया । ‘ माँ ने एक बार फिर नित्या को समझाने की कोशिश की ।
‘ चलिये आज आपका आई टेस्ट करवा देती हूं । ‘ नित्या बैग उठाकर खड़ी हो गई ।
‘ नहीं बेटा । फिर कभी देखेंगे । आज काम बहुत पड़ा है। ‘ माँ ने टालना चाहा लेकिन नित्या कहां मानने वाली थी ।
अंततः माँ को तैयार होने उठना ही पड़ा ।

नित्या ने माँ के अंदर जाते ही अपना बैग खोला और उसमें से दो सेव फल और एक कैडबरीज चॉकलेट निकाल कर टेबिल पर रख दी । साथ ही वायरल फीवर की टेबलेट भी । वैसे भी वह हमेशा अपने बैग में कुछ जरूरी दवाईयां लेकर चलती ही थी । नित्या ने धीरे से विराग के सर पर माँ की तरह हाथ फेरा । उसकी आंखें नम थीं ।

‘ मेरी बात का बुरा मत माना करिये । मैं हूं ही ऐसी । मुझे माफ़ कर दीजियेगा । ‘
‘ नहीं । बुरा मानने वाली ऐसी कोई बात ही नहीं कही आपने । ‘
‘ ज्यादा तबियत खराब लग रही हो तो डॉक्टर को भेजूं ? ‘
नित्या ने अचानक आगे बढ़कर विराग का सर अपने सीने में छिपा लिया । ये सब इतनी जल्दी हो गया कि विराग को सम्हलने का अवसर ही नहीं मिला ।

विराग को क्षण भर को ऐसा लगा जैसे माँ ने ही उसे अपने सीने से लगा लिया है । वही स्पर्श । वही गन्ध ।

‘ नहीं । ज़ुकाम ही तो है । कल तक ठीक हो जाएगा । तीन दिन से ज्यादा जुकाम रहता भी नहीं है । माँ को ले तो जा रही हो । डॉक्टर के यहां भीड़ होगी । वो इतनी देर बैठ नहीं पायेंगीं । ‘
‘ आते समय हॉस्पिटल में नम्बर लगाते हुए ही आई थी । फिर डॉक्टर अंकल पापा के दोस्त भी तो हैं । ‘ नित्या ने विराग से अलग होते हुए कहा ।
‘ क्या ये सब आप पहले से ही तय कर के आई थीं ? ‘
‘ … जी । कोई आपत्ति ? कोई एतराज ? ‘
‘ मुझे भला क्यों आपत्ति होगी लेकिन माँ से आपकी लूना पर बैठते कैसे बनेगा । ‘
‘ इतना तो मैं भी समझती हूं विराग जी । इसीलिए कार से आई हूं । दरवाजे के सामने ही खड़ी है । आप ज्यादा चिंता न करें । माँ का जिम्मा मेरे ऊपर छोड़ दें । ‘ नित्या ने विराग के टेबल पर रखी कंघी उठाई और अपने बाल सुलझाने लगी । बाल सुलझा कर उसने सारे बाल एक जगह इकट्ठे किए और बेग से क्लिप निकालकर बालों में क्लिप लगा ली ।

‘ ये आप किस जन्म का कर्ज अदा कर रही हैं नित्या ? ‘ विराग ने कातर दृष्टि से उसे देखा ।
‘ आप सही कह रहे हैं क्योंकि मैं पिछले जन्म में भी आपके साथ थी। इस जन्म में भी साथ हूं और अगले जन्म में भी मैं आपके साथ ही रहूंगी । हमारा साथ जन्म – जन्मान्तर का है । इधर आप हैं कि मानते ही नहीं । क्या सोच रहे हैं ? ‘ टेबल पर कंघी वापस रखते हुए नित्या ने विराग से प्रश्न किया ।

विराग चुप रह गया । उसने आंखें बंद कर लीं । यही सोचता रहा कि ‘ ये लड़कियां जन्म – जन्मान्तर की बातें क्यों करतीं हैं । साथ रहें तो एक जन्म भी नहीं निभा पायेंगीं । ‘ तभी अंदर से माँ ने नित्या को पुकारा ।

‘ मैं जा रही हूं । अपना ख्याल रखना । माँ का आई टेस्ट कराकर अभी थोड़ी ही देर में लौटती हूं । ‘ नित्या ने विराग के माथे को चूमा और तेजी से बाहर निकल गई ।
‘ नित्या … । ‘ विराग ने आवाज दी ।

नित्या ने तुरंत पलटकर विराग को देखा । उसने विराग की आंखों को पढ़ने की एक असफल कोशिश की ।
‘ कुछ कहना चाहते हैं ? ‘
‘ जल्दी लौटना । ‘
‘ ओ के । आपका आदेश सर आंखों पर । टेबलेट ले लीजियेगा । इस मामले में लापरवाही बर्दाश्त नहीं करूंगी । समझे । ‘ नित्या मुस्कुराई और बाहर निकल गई ।

विराग ने आंखें मूंद लीं । वैसे उसे कभी बुखार आता नहीं था । इसलिए ही उसे जब कभी साल दो साल में बुखार आता तो उसकी सहनशक्ति के बाहर रहता । वह दर्द से कराहता । उसके आंसू बह निकलते । वह बड़बड़ाने लगता । तब विराग चाहता कि कोई न कोई उसके पास रहे । ऐसे में नित्या के आने से उसे बहुत राहत मिली । हालांकि विराग ने उससे दूरी बनाए रखने का पूरा प्रयास किया मगर वह सफल नहीं हुआ क्योंकि वह जानता था कि नित्या उसको लेकर बेहद संवेदनशील है । नित्या की उपेक्षा करना उसके लिये आसान नहीं होगा । इसका क्या हल हो सकता है यही सोचते – सोचते विराग को नींद लग गई ।

– विनोद कुशवाहा  
96445 – 43026

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