प्रसंग वश: चंद्रकांत अग्रवाल/ “सत्य में सिर्फ उसे अपमान दिखता जिसे असत्य के लाभ का होता है मोह” यह वाक्य श्रीकृष्ण हस्तिनापुर की राजसभा में अपनी साफगोई से रूष्ट दुर्याेधन, धृतराष्ट्र, शकुनि आदि से कहते हैं। कोरोना के इस महाभारत में सरकारी व पेड प्राइवेट चिकित्सा सेवाओं या बिज़नेस पर उठ रहे नैतिकता व मानवता से जुड़े गंभीर सवालों के साथ कोविड गाइड लाइन का पालन न करवा पाने की सरकारी व प्रशासनिक विफलताओं व आम जनता की भी शर्मनाक कुम्भकर्णी नींद व अनैतिक, तटस्थता, सुविधाभोगिता का सत्य भी उसे ही अपमान पूर्ण व अरूचिकर लगेगा जो दोहरा चरित्र रखते हेैं। भीड़ कभी भी अनुशासन का संवाहन नहीं कर सकती। अब जब फिर देश, प्रदेश, जिला व हमारा शहर लॉकडाउन की मजबूरी की ओर बढ़ रहा है, तो इस बार अब तक हम सबके लिए चुनोती विगत वर्ष की तरह रोजी रोटी से बहुत अधिक सभी संक्रमितों को उनकी आर्थिक हैसियत के अनुसार समय पर कारगर सार्थक इलाज की सुविधाएं मुहैया कराने, उनकी जान बचाने की हैं। जिस पर न तो सरकारें कोई बड़े गंभीर कदम उठा रहीं हैं, न ही प्रशासनिक ढांचा। डिग्री लेते वक्क्त पीड़ित मानवता की हर सम्भव सेवा करने का संकल्प लेने वाले देश, प्रदेश, जिले व शहर के कई चिकित्सक भी कोरोना के महाभारत से स्वयं को दूर रखें हुए हैं, उनको अपनी नैतिक या मानवीय जिम्मेदारी वाली कोई भूमिका नहीं दिख रही।
जो चिकिसक अपने निजी अस्पतालों के माध्यम से इसमें शरीक हुए हैं, वे भी इस आपदा को धन कमाने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में देख रहे हैं। मध्यप्रदेश के हालात की तुलना यदि हम कोरोना ज्वालामुखी के ठीक शीर्ष पर बैठे महाराष्ट्र से करें तो वहां सर्वाधिक संक्रमण होने पर भी, सरकारी व खासकर प्राइवेट हेल्थ सेक्टर बहुत ही कम मप्र के भोपाल व इंदौर के नामचीन अस्पतालों से लगभग एक तिहाई खर्च में अनुकरणीय सेवाएं दे रहा है। शेगांव जैसे कस्बे में जहां मेरे परिवार को कोविड संक्रमण के लिए शरण लेनी पड़ी, 100 -100 बेड के दो प्राइवेट कोविड सेंटर, दो अलग अलग लक्झरी होटल्स में, जिला प्रशासन की अनुमति व निगरानी में 99 प्रतिशत सफलता के साथ कार्यरत हैं। क्या ऐसे प्राइवेट कोविड सेंटर इटारसी व होशंगाबाद में नहीं चलाये जा सकते? चलाये जा सकते हैं, कई आर्थिक रूप से थोड़े से भी सक्षम संक्रमित इस हेतु तत्पर भी हैं। पर उसके लिए चिकिसकों में वैसा जज्बा तो हो।

मैंने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व क्षेत्रीय विधायक व sdm इटारसी को इस हेतु जिले व शहर के निजी चिकिसकों को मोटिवेट करने, मार्गदर्शन व सरंक्षण देने व्हाट्सएप पर पृथक पृथक पत्र भी लिखे हैं। उनके जबाब की प्रतीक्षा है मुझे। अपने साल भर पूर्व के एक कॉलम में हमारे कर्तव्यों व दूसरों के अधिकारों अथवा हमारे अधिकारों व दूसरों के कर्तव्यों के मध्य संतुलन वाले मेरे द्वारा अभिव्यक्त हमारे धर्म, हमारी राष्ट्रभक्ति, राष्ट्र प्रेम हमारी संवेदनशीलता, हमारे अनुशासन,हमारी उदारता व हमारे त्याग की परीक्षाएं ही मानों…फिर प्रारंभ हो रही हैं। ये परीक्षाएं ही तय करेंगी, हमारे स्वयं के परिवार के, गली मोहल्ले के, शहर, जिले, प्रदेश व देश के कोरोना मुक्ति के भविष्य के कितनी बड़ी कीमत चुका कर उत्तीर्ण होने के नेपथ्य का सत्य। टी वी सीरियल महाभारत तो कभी का बिदा लेकर चला गया हमारे घरों से , पर कोरोना का महाभारत एक बार फिर हमारे देश में उग्र होता जा रहा हैं। फिर भी हर कोई बिंदास अपने घरों से निकलकर मनचाहे ढंग से घूम फिर रहे हैं, बिना मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग व सेनिटाइजर के सुरक्षा कवच के बिना। सच कोरोना ने सबका असली चरित्र सहज ही बेनकाब कर दिया है।
हमारी नैतिक बेशर्मी को उजागर कर दिया है। महाभारत में शर-शय्या पर लेटे भीष्म श्रीकृष्ण के निवेदन पर धर्मराज युद्धिष्ठिर को राज धर्म की शिक्षा देते हुए कहते हैं कि देश से, मातृभूमि से बड़ा कभी कोई नहीं होता। कोरोना के इस महाभारत में अपने देश , प्रदेश , जिले व शहर की चिंता कितने लोग कर रहे हैं। देश की छोड़ों अपनी स्वयं की चिंता तक नहीं कर रहे व लॉकडाउन मेें भी सोशल डिस्टेंसिंग का रोज मजाक बना रहें हैं। भीष्म धर्म की भी बड़ी अद्भुत परिभाषा अर्जुन को बताते हैं। वे कहते हैं कि अपने कर्तव्यों व दूसरों के अधिकारों के मध्य संतुलन बनाना ही वास्तव में धर्म हैं। आज ऐसा धर्म कितनों को स्वीकार्य हैं। हर व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए मुखर है, पर अपने कर्तव्यों व दूसरों के अधिकारों की उसे कोई परवाह नहीं हैं। तब यह धर्म तो नहीं हैं। फिर तो यह अधर्म ही हुआ। फिर भी यह देश सुरक्षित है तो सिर्फ उन सेवाभावी, समर्पित, राष्ट्रप्रेमियों की नैतिक ताकत के कारण जो हर संक्रमण काल में सिर्फ अपने कर्तव्यों व दूसरो के अधिकारों को याद ही नहीं रखते तदनुसार कर्म भी करते हैं। श्रीकृष्ण ,द्रोपदी से कहते हैं कि विधाता ने सबको किसी न किसी हेतु से पृथ्वी पर भेजा हैं, जन्म दिया हैं। पर जब कोई भी विधाता के उसके निमित्त किये गये हेतु के विश्वास को ठेस पहुंचाया हैं तो फिर वह स्वयं भले ही कुछ समय का सुख व वैभव प्राप्त कर ले पर विधाता की परीक्षा में तो फेल हो जाता हैं।
इस तरह उसका संपूर्ण जीवन भी निरर्थक हो जाता हैं। समय की धूल उसे इस तरह मिट्टी में मिला देती हैं कि इतिहास, देश व समाज तो दूर की बात है उसके अपने सगे संबंधी भी उसको कभी याद नहीं करते । श्रीकृष्ण कहते हैं कि शूरवीर तो कुरूक्षेत्र में वीर गति को प्राप्त करके भी मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं पर सुविधाभोगी का अपराध कभी भी न तो विधाता माफ करता हैं, न प्रकृति एवं न ही इतिहास। कोराना के इस महाभारत में हमें इस कड़वे यथार्थ को नहीं भूलना चाहिए। कर्ण द्वारा अधर्म के पक्ष में युद्ध करने पर भी उसकी दानवीरता ने उसे अमर कर दिया। इतिहास आज भी यदि अधर्म के पक्ष में युद्ध करने वाले भीष्म,एवं कर्ण को सम्मान देते हैं तो सिर्फ इसीलिए कि उनके जीवन में त्याग ही उनका परम धर्म था। आज भी कोरोना के महाभारत में देश को, मातृभूमि को अपना तन, मन, धन सभी देने की हमारी दानवीरता की परीक्षा की घड़ी हैं। कोई अधर्मी होकर भी अपनी दानवीरता से अपना जीवन सार्थक कर सकता हैं। यह समय स्वार्थी व सुविधाभोगी बने रहने का तो कतई नहीं हैं।
कोरोना योद्धाओं पर पुष्प वर्षा करके, उनके पद प्रक्षालन करके ही हम अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं मानें। स्वयं भी उनकी तरह तन से , मन से या फिर धन से पीड़ित मानवता की सेवा में यथाशक्ति अपना योगदान देवें। तभी हमारी भावशुद्धि रेखांकित होगी, तभी हमारी सक्रियता सार्थक होगी। यदि कुछ नहीं भी करना चाहते तो कम से कम अपने घर में रहकर कोरोना योद्धाओं की जिजीविषा व उनके अदम्य साहस को सम्मान तो देवें , उनको इस तरह प्रणाम तो कर ही सकते हेै। देशों की सीमाओं पर लड़े जाने वाले युद्धों में तो शत्रु सामने होता हेै पर कोरोना के महाभारत में तो किसी को पता नहीं कि कब कोरोना का हमला, किस तरह हमें अपना शिकार बना लेगा। अत: आत्म अनुशासन, जन जागरण ही इस महाभारत के कारगर ढाल है बचाव के लिए। कम लोग ही जानते होंगें कि श्रीकृष्ण द्रोपदी को युद्ध का परिणाम युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व ही बता देते हैं। पर वे द्रोपदी को कहते हैं कि हर मानव को भविष्य में नहीं वर्तमान में ही जीना चाहिए, वर्तमान में ही रहना व सोचना चाहिए। भविष्य को विधाता के ऊपर छोड़ देना चाहिए क्योंकि भविष्य को तय करने का अधिकार सिर्फ विधाता के पास होता हैं।
श्री कृष्ण ने द्रोपदी को स्पष्ट बता दिया था कि उसके पति 5 पांडवों को छोड़कर संपूर्ण कुरू वंश का विनाश हो जायेगा। अपरोक्ष रूप से इसका अर्थ यह था कि अभिमन्यु व उसके पांचों पुत्र भी मारे जायेंगें। द्रोपदी यह सुन विचलित हो गयी। उसने युद्ध न होने देने व अपने अपमान को भूल जाने की बात कही। तब श्री कृष्ण ने बहुत खूबसूरत व्याख्या की जिंदगी की। उन्होंनें कहा कि तुम्हारे पिता ध्रुपद द्वारा किये गये यज्ञ के अग्नि कुंड से तुम्हारा जन्म विधाता ने क्यों किया , यदि तुम उसका मर्म न समझकर धर्म के आदर्श मूल्यों व सत्य की स्थापना में अपनी भूमिका नहीं निभाओगी तो तुम अपने पुत्रों के साथ आनंद से जी तो लोगी पर यह समाज मातृभूमि व देश के साथ छल ही होगा। दूसरे दिन द्रोपदी बहुत चिंतन करने के बाद श्री कृष्ण से सहमत हो जाती हैं। महाभारत के लिए द्रोपदी को जिम्मेदार मानने वाले सब कुछ जानते हुए भी देश व प्रजा के लिए भावी पीढ़ी के लिए उसकी इतनी बड़ी कुर्बानी को याद रखें व अपने गिरहबान में झांकर देखें कि वे स्वयं कोरोना के इस महाभारत में कहां खड़े हैं।
श्रीकृष्ण कर्ण से कहते हेैं कि अधिकार भले ही जन्म से मिलता हो पर सम्मान तो योग्यता से ही मिलता हैं। चूंकि हम सभी भारत जैसे लोकतांत्रिक व धर्म निरपेक्ष देश में जन्म लेने से कई तरह की स्वतंत्रता हमें अधिकार स्वरूप स्वत: ही मिल गयी है पर सम्मान अब तभी मिल पायेगा जब कोरोना के महाभारत में हम अपनी योग्यता साबित कर पायेंगें और हमारी योग्यता तय होगी सोशल डिस्टेंस व मास्क लगाने के हमारे अनुशासन से, अपने शरीर के अंगों, वस्त्रों, घरों व आसपास के परिवेश को सेनेटाइज कर वायरस रहित बनाए रखने की हमारी सजगता से, हमारे लोक व्यवहार में इमोशनल डिस्टेंस बढ़ाने की हमारी संवेदनशीलता व जरूरतमंदों को मदद देने के हमारे त्याग से। निश्चय ही स्वतंत्रता आंदोलन के बाद, तीन युद्धों की विभीषिका झेलने के बाद यह चौथी लड़ाई देश की खुशहाली की हैं, जो हमें अस्त्र शस्त्रों से नहीं लडऩी हैं वरन पुरातन भारतीय सभ्यता व संस्कृति के आदर्शों व मूल्यों की ताकत से लडऩी हैं। असली समाजवाद को पुन: रचने की हमारी क्रिएटिविटी से व देश को आत्मनिर्भर बनाने के प्रधानमंत्री के आहवान को अपनी योग्यता, इच्छाशक्ति, व जिजीविषा से साकार करने की हमारी रणनीति से। सोलह कलाओं के पूर्णावतार श्रीकृष्ण के द्वापरकाल को मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के सतयुग काल की तुलना में आदर्श व मूल्य विहीन बताने वाले इस घोर कलिकाल में भी कई ज्ञानी हैं जो इतना भी नहीं जानते कि द्वापर ने तो सतयुग के भी कर्ज उतारे हैं।
श्रीराम के राज्यभिषेक के एक दिन पूर्व कैकयी द्वारा उनको 12 साल का वनवास दे देने की त्रासदी तो द्वापर में भी हैं जहां धर्मराज संग पांडव 12 साल का वनवास पूरी ईमानदारी से स्वीकारते हैं। पर द्वापर में, सतयुग के भरत की जगह दुर्याेधन जैसा भाई हैे जो उनको वनवास काल में भी मार डालने के कई षड्यंत्र रचता हैं। स्वयं श्रीकृष्ण को जन्म लेते ही 10 वर्ष तक के बाल्यकाल में अपने ही मामा द्वारा किये गये कई बड़े राक्षसी हमले झेलने पड़ते हैं, यहां तक कि एक बार तो देवताओं के राजा इंद्र भी उनसे नाराज हो जाते हें व गोकुल को जलसमाधि देने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। तब यदि श्रीकृष्ण अपने नाना नानी तक को सलाखों के पीछे धकेलने वाले व अपने माता पिता को घोर यातनाएं देने वाले अपने आततायी मामा कंस का वध कर देते हैं तो इसे कैसे कोई अमर्यादित कह सकता हैं। 12 साल वनवास व 1 साल के अज्ञातवास से लौटने पर भी दुर्याेधन जब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों को मात्र 5 गांव देने के प्रस्ताव पर सुई की नोक बराबर जमीन भी नहीं देने की घोषणा करता हैं तो महाभारत तो होना ही था, चाहे किसी भी नीति, सभ्यता, जीवन मूल्यों की तराजू में तौलकर देख लीजिए। कदाचित कम लोग ही जानते हैं कि द्वापर में श्रीकृष्ण का महाप्रयाण भी सतयुग का अपने ऊपर चढ़ा एक कर्ज उतारने के अनुक्रम में जरा नामक एक बालक के तीर के लगने से होता है जो पूर्व जन्म में सतयुग का बाली था व जिसे श्रीराम को छुपकर मारना पड़ा था क्योंकि बाली के गले में ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त रत्न माला के प्रभाव से बाली अपने शत्रु का सामना करते ही उसका आधा बल चमत्कारिक रूप से स्वयं प्राप्त कर लेता था। पर श्रीकृष्ण स्वयं को अनजाने में तीर मारने वाले उस जरा नामक बालक को वन का राजा बना देते हेैं। कोरोना का महाभारत भी प्रकृति के साथ किये गये हमारे असीम अत्याचारों का परिणाम ही हेैं।

मांसाहार की परंपरा तो सतयुग व द्वापर में भी क्षत्रियों द्वारा शिकार करने के रूप में थी। पर वह तब इतनी विकृत नहीं थी, जितनी कि आज है। हमने तो मांसाहारी जानवरों को भी शर्मसार कर दिया। हम उन जीवों का मांस भी खा रहें जिनका मांस खाना जानवर भी पसंद नहीं करते। हमारे देश में गौ मांस को लेकर राजनीति होती हैं। चीन आदि देशों ने तो मांसाहार की अनैतिकता व अमानवीयता का चरमोत्कर्ष रच कर जंगलों के कानून को भी शर्मसार कर दिया। कोरोना महाभारत का कारक वायरस हमारी इसी कुत्सित प्रवृत्ति का परिणाम माना जा रहा हैं। चिंतक/बुद्धिजीवी मान रहें हैं कि प्रकृति मानव जाति द्वारा नष्ट किये गये अपने वैभव, अपनी अस्मिता को संवार रही हैं। वहीं मानव जाति इस शर्मनाक दौर में अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही हैं। इसे कुछ बुद्धिजीवी यदि प्राकृतिक न्याय कह रहें हैं तो इसमें गलत क्या हैं? मानव समाज में जब जब भी अन्याय के खिलाफ सत्य दम तोडऩे लगता हैं, नैतिकता , यातनाओं का चरमोत्कर्ष भोगने लगती हैं तो प्राकृतिक न्याय की अलौकिक ताकत ही इस पृथ्वी की अस्मिता की रक्षा करती हैं। जिस तरह आज द्वापर के महाभारत जैसे कोरोना के वायरस महाभारत के साथ हम सब जीवन के कुरूक्षेत्र में हैं।
सवाल यही हैं कि जीत किसकी होगी? धर्म की, सत्य की जीत तय हैं। पर हमें पहले पात्र बनना होगा, धर्म की आध्यात्मिकता का, सत्य की अखंड सत्ता का व पुरातन गौरवशाली भारतीय संस्कृति व सभ्यता का। हमें धर्म व सत्य की वास्तविक परिभाषा व सार्थकता आत्मसात करनी होगी। जैसा मैंनें पूर्व कॉलम में कहा था कि अपने कर्तव्यों व दूसरों के अधिकारों के बीच संतुलन का नाम ही धर्म हैं को साकार करना होगा । हमें लॉकडाउन से मिली आजादी में भी। संक्रमणकाल में राजा की भी बड़ी भूमिका रही हैं हर काल में, प्रजा व राजा दोनों को एक दूसरे का पूरक बनना होता हैं तभी सफलता मिलती हेैं। जब जब भी प्रजा सुविधाभोगी हुई हैं या राजा सुविधाभोगी हुआ तब तब किसी न किसी, आक्रमण या संक्रमण का सामना पूरे देश को करना पड़ा, इतिहास गवाह हैं। कोरोना महाभारत ने प्रजा से उसकी सुविधाभोगिता छीन ली हैं तो प्रजा को भी अब अपनी यह प्रवृत्ति त्याग ही देनी चाहिए मेरे विचार से तो। हालांकि इससे उसे कष्ट होगा पर विगत वर्ष लाकडाउन के 2 माह के कारावास ने उसे इसका अभ्यस्थ बना दिया हैं। अत: उसका यह कष्ट धीरे धीरे स्वत: ही उसका शरीर भी व उसकी विचारधारा भी आत्मसात कर ही लेगी। वैसे भी अध्यात्म तो एकांत व शांत को ही वास्तविक आनंद से साक्षात्कार का संवाहक मानता हैं। करोड़ों मजदूरों का अपनी कर्म भूमि से हजारों किमी दूर अपनी जन्म भूमि की और फिर पलायन करना , ट्रेनों में हाउसफुल से भी बदतर हालात, जितनी बड़ी चुनौती सरकार के लिए है, उनती ही बड़ी स्वयं मजदूरों के लिए व उन उद्योगों के लिए भी होगी जिन्होंनें अपने स्वार्थ व अपनी सुविधाभोगिता के लालच में इन मजदूरों को पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया।
श्रीकृष्ण पांडवों से कहते हैं कि इंद्रप्रस्थ तुम्हारी कर्मभूमि थी जो तुमसे छीन ली गयी पर तुम्हारी, जन्म भूमि तुम से कोई नहीं छींन सकता। जन्म भूमि हस्तिनापुर ही अंतत: महाभारत का कारण बनी। महामंत्री विदुर, श्रीकृष्ण से कहते हैं कि कौरवों की दुष्टता का परिणाम हस्तिनापुर की प्रजा क्यों भोगे। श्रीकृष्ण जबाव देते हैं कि हस्तिनापुर की प्रजा भी दोषी हैं क्योंकि वह आंखें कान जुबान होकर भी अपने राजा धृतराष्ट्र की सत्ता लोलुपता व पुत्रमोह की अनैतिकता व अपने तथकथित युवराज दुर्याेधन की अन्याय पूर्ण सत्ता वासना व उसके अत्याचार देखकर भी सुविधाभोगी बनी रही, मूक दर्शक बनी रही। अच्छा हुआ कि करोड़ों मजदूरों से उनकी जन्मभूमि नहीं छीनी गयी व सरकार प्राथमिकता से उन्हें इस बार अब तक ट्रेनों से उनकी जन्म भूमि तक पहुंचा रही हैं। अब रही कर्मभूमि की बात तो मजदूर अपने पुरूषार्थ से अपनी कोई न कोई नई कर्मभूमि रच ही लेंगें जैसे पांडवों ने खांडव वन को इंद्रप्रस्थ बनाकर रची थी या पुरानी कर्मभूमि में ही कोरोना महाभारत समाप्त होने पर लोैट जायेंगें। राजा अर्थात सरकारों की योग्यता भी इस बार विगत वर्ष से बहुत अधिक चुनोती पूर्ण होकर फिर दांव पर है। जय श्री कृष्ण।

चंद्रकांत अग्रवाल(Chandrkant Agrawal)
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