
“गोरी का साजन, साजन की गोरी” – यह मशहूर गाना सुनते ही 80 के दशक की यादें ताजा हो जाती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी फिल्म में श्रीदेवी की आवाज़ असल में रेखा की थी? 1986 में रिलीज़ हुई ‘आखिरी रास्ता’ ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया, बल्कि इसके पीछे छिपे राज़ आज भी कम लोग जानते हैं।
1986 का वह दौर जब अमिताभ बच्चन की फिल्में सिनेमाघरों में तूफान ला देती थीं। ‘आखिरी रास्ता’ उन्हीं में से एक खास फिल्म थी जिसमें बिग बी ने डबल रोल किया – एक तरफ बदला लेने वाला पिता डेविड डी’कोस्टा, तो दूसरी तरफ ईमानदार पुलिस अफसर विजय।
यह फिल्म तमिल फिल्म ‘ऒरु कैदियिन डायरी’ (1985) का रीमेक थी, जिसमें कमल हासन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अमिताभ ने इस रोल को निभाने के लिए कमल हासन की ओरिजिनल फिल्म को कई बार देखा और उनके अभिनय से प्रेरणा ली?
फिल्म की रोचक पृष्ठभूमि
‘आखिरी रास्ता’ एक ऐसी फिल्म थी जिसने कई मायनों में परंपराओं को तोड़ा। के. भाग्यराज के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक बदले की कहानी थी, जो दर्शकों को भावनात्मक रोलरकोस्टर पर ले गई।
अमिताभ का निर्देशक पर शक: दिलचस्प बात यह है कि अमिताभ बच्चन को शुरू में निर्देशक के. भाग्यराज की एक्शन फिल्म बनाने की क्षमता पर शक था, क्योंकि भाग्यराज उस समय मुख्य रूप से रोमांटिक और ड्रामा फिल्मों के लिए जाने जाते थे।
तमिल रीमेक से प्रेरणा: यह फिल्म तमिल फिल्म ‘ऒरु कैदियिन डायरी’ का हिंदी रूपांतरण थी, जिसे भाग्यराज ने ही लिखा था लेकिन उसका निर्देशन भरथिराजा ने किया था।
कहानी का सफर: अमिताभ को चेन्नई बुलाकर कहानी सुनाई गई, और उनकी हामी के बाद ही फिल्म की शूटिंग शुरू हुई।
फिल्म निर्माण का समयरेखा
1985: तमिल फिल्म ‘ऒरु कैदियिन डायरी’ रिलीज़ होती है, जिसमें कमल हासन मुख्य भूमिका में हैं।
1986 की शुरुआत: अमिताभ बच्चन को चेन्नई बुलाकर कहानी सुनाई जाती है और वे इसके लिए हामी भरते हैं।
6 जून 1986: ‘आखिरी रास्ता’ सिनेमाघरों में रिलीज़ होती है।
1986 के अंत तक: फिल्म बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन करते हुए लगभग 3.5 करोड़ रुपये की कमाई करती है।
फिल्म से जुड़े वो अनसुने तथ्य जो आपको चौंका देंगे
1. श्रीदेवी की आवाज़ में छिपा था रेखा का जादू
फिल्म की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि श्रीदेवी, जो उस समय हिंदी में पूरी तरह सहज नहीं थीं, उनकी आवाज को रेखा ने डब किया था। यह एक अनोखा तथ्य है, क्योंकि श्रीदेवी की हिंदी डबिंग के लिए रेखा का नाम कम ही लोग जानते हैं। रेखा ने श्रीदेवी के किरदार को अपनी आवाज से और जीवंत बनाया।
2. श्रीदेवी को पहले मिला था छोटा रोल
श्रीदेवी को शुरू में इस फिल्म में छोटा रोल ऑफर हुआ था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। बाद में भाग्यराज ने कहानी में बदलाव कर उनके किरदार को और मजबूत किया। इस तरह ‘आखिरी रास्ता’ में जयाप्रदा और श्रीदेवी की जोड़ी पहली बार एक साथ दिखी, दोनों अभिनेत्रियों ने अमिताभ के साथ अलग-अलग किरदारों में अपनी छाप छोड़ी।
3. अमिताभ बच्चन – डबल रोल के बादशाह
‘आखिरी रास्ता’ अमिताभ बच्चन की करियर की 14वीं डबल रोल वाली फिल्म थी। इससे पहले वे ‘अदालत’ (1976), ‘डॉन’ (1978), ‘सत्ते पे सत्ता’ (1982) और ‘महान’ (1983 – ट्रिपल रोल) जैसी फिल्मों में डबल रोल कर चुके थे। ‘आखिरी रास्ता’ में उन्होंने पिता डेविड डी’कोस्टा और बेटे विजय शांडिल्य के रोल निभाए।
4. सदाशिव अमरापुरकर का किरदार जो बना लीजेंड
सादाशिव अमरापुरकर ने फिल्म में मंत्री बलवंत चतुर्वेदी का किरदार निभाया, जो एक क्रूर और शक्तिशाली विलेन था। यह किरदार इतना प्रभावी था कि इसने सदाशिव को बॉलीवुड में विलेन के तौर पर स्थापित कर दिया। कम लोग जानते हैं कि सदाशिव ने इस रोल के लिए खास तौर पर अपनी बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी पर काम किया था, ताकि वह अमिताभ के सामने कमजोर न दिखें।
5. गायब हो गए वो गाने जो कभी रिलीज़ नहीं हुए
फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत था, और “गोरी का साजन, साजन की गोरी” जैसे गाने हिट हुए। लेकिन कम लोग जानते हैं कि फिल्म के लिए कुछ और गाने रिकॉर्ड किए गए थे, जो अंतिम संस्करण में शामिल नहीं किए गए। ये गाने बाद में रिलीज नहीं हुए और आज भी अनसुने हैं।
6. बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता
‘आखिरी रास्ता’ उस समय के हिसाब से मध्यम बजट की फिल्म थी, लेकिन इसने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। फिल्म ने करीब 3.5 करोड़ रुपये की कमाई की, जो 1986 में एक बड़ी उपलब्धि थी। यह फिल्म छोटे शहरों और सिंगल-स्क्रीन थिएटर्स में खास तौर पर हिट रही।
अमिताभ की अदाकारी में छिपी मेहनत
अमिताभ ने डबल रोल के लिए न केवल अभिनय बल्कि शारीरिक रूप से भी खास तैयारी की थी। पिता के किरदार के लिए उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वेज को उम्रदराज दिखाने के लिए खास मेकअप और हाव-भाव अपनाए, जबकि बेटे के किरदार में वह युवा और जोशीले दिखे। यह उनके करियर का एक और बेहतरीन डबल रोल था जो आज भी याद किया जाता है।
फिल्म का स्थायी प्रभाव
‘आखिरी रास्ता’ ने न सिर्फ 1986 में सफलता प्राप्त की, बल्कि इसका प्रभाव आज तक देखा जा सकता है।
फिल्म की कहानी, जहाँ एक पिता को गलत तरीके से जेल हो जाती है और वह बदला लेने निकलता है, लेकिन उसका बेटा एक पुलिस अफसर बन जाता है, ने दर्शकों के दिलों को छू लिया। अमिताभ के दोनों किरदारों के बीच का संघर्ष और अंत में बेटे द्वारा पिता की तालियाँ बजाना, फिल्म का सबसे यादगार दृश्य बन गया।
निष्कर्ष:
‘आखिरी रास्ता’ न केवल एक व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म थी, बल्कि इसके पीछे कई अनसुने तथ्य इसे और खास बनाते हैं। रेखा द्वारा श्रीदेवी की डबिंग, अमिताभ का भाग्यराज पर शुरूआती शक, और तमिल रीमेक से प्रेरणा जैसे तथ्य इस फिल्म को एक अनोखा स्थान देते हैं।
अमिताभ बच्चन की दमदार परफॉर्मेंस, सदाशिव अमरापुरकर का खतरनाक विलेन, और श्रीदेवी-जयाप्रदा की जोड़ी ने इस फिल्म को 80 के दशक की यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया। आज भी जब यह फिल्म टीवी पर आती है, दर्शक उसे देखने से खुद को रोक नहीं पाते।
फिल्म की सबसे बड़ी सीख यही है कि इंसाफ के लिए हर रास्ता आखिरी रास्ता होता है। डेविड डी’कोस्टा का बदला और उनके बेटे विजय का न्याय के प्रति समर्पण – दोनों ही किरदारों ने दर्शकों को एक गहरा संदेश दिया।
1986 में रिलीज़ हुई यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि इसकी कहानी में न्याय, बदला, पारिवारिक मूल्य और सामाजिक व्यवस्था के प्रश्न शामिल हैं। शायद यही वजह है कि ‘आखिरी रास्ता’ आज भी हमारे दिलों में जिंदा है।
क्या आपने ‘आखिरी रास्ता’ देखी है? आपको इस फिल्म का कौन सा पल सबसे ज्यादा यादगार लगा? कमेंट में जरूर बताएं!










