: राजधानी से पंकज पटेरिया –
बेइंतहा पड़ रही गर्मी के झुलसाने वाले दिनों में प्रदेश की धमनियों में त्रि-स्तरीय चुनाव की गर्माहट बहने लगी है। हालांकि अभी वक्त है, लेकिन रंग-बिरंगे बर्फ के गपशप गोलों की, चुस्कियां लेने लगे हैं भाई लोग, और इनकी फुरसती बिग्रेड। कई सलाहकार भी स्वयं प्रकट हो चुके हैं। यह हमारी आदि परम्परा है, लिहाजा लोग इस गौरव कार्य में लग गए। टाइमपास मूंगफली शैली में लफ्फाजी की लस्सी घोंट ने लग गए है। चुनाव चर्चा की गरमाहट सूबे की फिजा में घुलने की इस बेला में चाय ठेले, दफ्तर के गलियारे, हाट, बाट, घाट, बाग गोया, जहां मिले चार यार लग जाता चुनाव चर्चा बाजार। लोग उड़ाने लगते अपने-अपने पर बे पर के परिंदे, भले उनके अभी पंख भी खुले नहीं, फुदकना भी नहीं जानते। भाई लोगों ने अपने-अपने अंदाजी अरबी घोड़े रेस कोर्स में दौड़ा दिए, और उड़ाना शुरू कर दिए कयास के कबूतर, शुरू कर दी गुटूर गूं।
हालांकि उनके पंख भी पूरे नहीं खुले, और न उनके अपने गुंबद, कंगूरे का ठौर ठिकाना पता, नहीं। लेकिन चर्चा का चाट-ठेला चलाने में रोक थोड़ी ही है। दुष्यंत कुमार जी का शेर ‘कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। बरअक्स चुनाव नपा, विधान सभा के पंचायती अथवा अमेरिका प्रेसिडेंट के हों, भैया जी की फुरसती बिग्रेड फोरकास्ट करने में अव्वल रहती है। चाट चौपाटी लगाने में माहिर।
जैसे इन्हें ऊपर वाले ने मोबाइल पर पहले सब मैसेज कर दिया हो। जबकि अभी कोई मंजर साफ नहीं, न कोई सूरते हाल? खैर चलिए हमें क्या उधो से लेना क्या माधो से।। हां बकोल इस शेर के यह जरूर है, एक चेहरे पर पर्दा कई चेहरे हैं, आज इंसान की तस्वीर बनाना मुश्किल है। यह जरूर है माननीयोंं के दरबारंो में हाजरी बढ़ गई है। मंदिरों-मठों के महंतों की चिरौरी चाकरी भी शुरू हो गई है।
इस बार राह आसान नहीं है, मुश्किल बहुत हैं राह में। बड़े दिलचस्प और हैरानी भरे मंजर हम गुजरते देखेंगे। लेकिन कवायद जरूरी है नहीं तो तवज्जो कौन देगा? बिना उछलकूद कोशिश के तो कोई आम किसी पेड़ से किसी के दामन में नहीं टपकता। लिहाजा बतौर एडवाइस, फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई की पंक्ति यहां जोडऩा मुझे मौजंू लगता है। अपने नर्मदापुरम के मौन साधक बालकृष्ण तिवारी जी ने क्या खास शेर कहा है। आप भी मुलाहिजा फरमाइए। रब ने अपनी शख्सियत के कितने टुकड़े कर दिए। अब देखना रब के ये बंदे क्या-क्या करिश्मा दिखाते हैं, कैसे कैसे गुल खिलाते? पलक पावंड़े बिछाए हम भी शामिल हैं, नर्मदे हर।

पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
ज्योतिष सलाहकार
9340244352 ,9407505651








