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चुनावी चौपाल : कुर्सी की महाभारत, नपा अध्यक्ष के लिए अपनों से ही होगा युद्ध

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  • -Rohit Nage : 

कैसा है, इटारसी की भाजपायी राजनीति का मिजाज? यह सवाल करेंगे तो यह पिछले दिनों की अपेक्षा कुछ बदली-बदली सी लगेगी। बाहर भले ही सब कुछ शांत, स्थिर, थमे हुए पानी सा लगे, जहां हवा नहीं चलने से लहरें भी न हिल रही हों, लेकिन भीतर काफी कुछ ऐसा चल रहा है, जो आलाकमान के लिए चिंता का सबब हो सकता है। अब जो जीता वही सिकंदर, की कहावत चरितार्थ हो तो और बात है।
नगर पालिका चुनाव में पिछली मर्तबा से तीन सीटें कम आने के बावजूद बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के सामने अभी नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद पर होने वाले चुनावों की चुनौती है। विपक्षी दल कांग्रेस से लडने से पूर्व यहां अपनों से लडने की चुनौती दिखाई दे रही है। पार्षद के चुनावों के वक्त सभी अपनी जीत के लिए जी-जान से जुटे थे, इसलिए भितरघात उतना नहीं हो पाया जितने की आशंका जतायी जा रही थी, लेकिन अब तो लड़ाकों की संख्या भी घट गयी है। यानी अध्यक्ष पद के लिए सामने केवल तीन नाम हैं, उनमें भी सर्वसम्मति की कोशिशों पर पेंच फंसता दिखाई दे रहा है। झगड़ा नया नहीं है, वही नेता और नेतृत्व के बीच जो खायी है, वह दिन-ब-दिन बड़ी होती जा रही है। सार्वजनिक समारोहों के लिए खिंचे शामियानों में भले ही चेहरे पर बनावटी हंसी हो, लेकिन इनके बीच खिंची लकीर भी दिखाई दे ही जाती है। अंदरखाने क्या चल रहा है, इस पर विश्वस्त सूचना यह है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा है, लेकिन नेतृत्व की मजबूती सबकुछ ठीक कर लेगी, ऐसा भरोसा भी है और तनाव होने की महीन सी आशंका भी।
दरअसल, महाभारत में जो अपने भी दुश्मनों के पाले में खड़े थे, वे दृश्यता की सीमा में थे, इस महाभारत में दुश्मन अपरिचित तो नहीं है, परंतु मिस्टर इंडिया का यंत्र पहनकर खड़ा है। तीन नाम भाजपा से स्पष्ट तौर पर सामने हैं। वरिष्ठताक्रम में देखें तो पुरानी इटारसी के वरिष्ठ नेता शिवकिशोर रावत, जो कभी विधायक डॉ.सीतासरन शर्मा के सबसे करीबी और गुड लिस्ट में थे, उनका नाम है। दूसरे क्रम में करीब सात माह अध्यक्ष रहे पंकज चौरे और तीसरा नाम यदि महिला को आगे बढ़ाने का मामला आया तो गीता देवेन्द्र पटेल।
इन तीन नाम में एक ऐसा नाम है, जिस पर दो तरफ से समर्थन हो सकता है। लेकिन, यह सशर्त होगा। इसलिए नेतृत्व वाला पक्ष काफी फूंककर कदम बढ़ाने की मंशा रखता है। नेता वाले पक्ष का मानना है कि इस एक नाम को यदि सफलता मिलती है तो सत्ता की चाबी अपने पास रखकर आगे बढ़ेंगे। बस इसी सोच ने इस नाम को कमजोर कड़ी बना दिया है। एक नाम ऐसा है, जिस पर नेतृत्व का पक्ष सहमत नहीं होगा, ऊपर से यदि कोई दबाव बना तो भी संभवत: सहमति न दें। और यदि जबरदस्ती हुई तो पांच वर्ष मुश्किल से गुजरेंगे और हो सकता है कि बगावती तेवरों का ज्यादातर वक्त सामना करना पड़े और अपनों से ही लडने और मनाने में पांच वर्ष बीत जाएं। अब सिर्फ एक नाम रह जाता है, और 99 फीसद उसी नाम के सहारे पार्टी आगे बढ़ सकती है। बावजूद इसके अभी तो भाजपा के आला नेता भी खामोशी ओढ़कर कुछ न कहो, के अंदाज में हैं।

उपाध्यक्ष पद के लिए कूटनीतिक कदम

उपाध्यक्ष पद पर कौन होगा? भाजपा से होगा या कांग्रेस से होगा? यह भी कयास लगाये जा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस से ऐसा प्रयास होता तो नहीं दिख रहा, अलबत्ता प्रत्याशी के परिजन स्वयं के प्रयासों और भाजपा नेताओं से अपने संबंधों के बलवूते प्रयास कर रहे हैं। भाजपा में इस तरह का समझौता होता हो, हमने कभी देखा और सुना नहीं है। हां, कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष को लेकर जो जोड़तोड़ चल रहा है, उसे भाजपा के अध्यक्ष पद को लेकर हो रही कोशिशों के जैसा ही माना जा सकता है। कांग्रेस के पास भी नेता प्रतिपक्ष को लेकर कुछ मजबूत नाम हैं। यदि वरिष्ठता के आधार पर चयन होता है तो नारायण सिंह ठाकुर के नाम को प्राथमिकता मिल सकती है और यदि युवा और जोश से भरे हुए पार्षद का चयन करना होगा तो अमित कापरे इसमें बाजी मार सकते हैं। वैसे तो अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से तो उपाध्यक्ष सामान्य और महिला हो इस बात की भी वजनदारी साबित करने की भरसक कोशिश की जा रही है।

क्या दोहराया जाएगा जनपद का इतिहास

जनपद पंचायत होशंगाबाद में विधायक डॉ.सीतासरन शर्मा ने जिस तरह से अपने खास समर्थक भूपेन्द्र चौकसे को निर्विरोध जीत दिलायी है, माना जा रहा है कि इटारसी नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद पर भी इसे दोहराया जाएगा। इसके लिए बिसात बिछायी जा चुकी है। माना जा रहा है कि 10 अगस्त से पहले इटारसी को नगर पालिका अध्यक्ष मिल जाएगा। हालांकि डेट प्रशासन को तय करना है, 10 अगस्त से कितना पहले नपाध्यक्ष के लिए चुनाव होंगे, तारीख घोषणा होते ही पर्दा हट जाएगा।

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