- अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

बॉलीवुड की चमक-दमक भरी दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो पर्दे पर आते ही दिलों में बस जाते हैं। कभी अपनी कॉमिक टाइमिंग से पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर करते हैं, तो कभी अपनी सादगी से मन को छू जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है — गोवर्धन असरानी, जिन्हें दुनिया प्यार से असरानी साहब कहती है।
आज हम बात करेंगे उस शख्स की, जिसने हंसी को भी अभिनय का एक गंभीर रूप बना दिया और दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान की स्थायी छाप छोड़ दी।
बचपन से अभिनय की ललक
1 जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर में जन्मे असरानी का परिवार सिंध से ताल्लुक रखता था। उनके बचपन से ही अभिनय के प्रति खास झुकाव था। स्कूल में ड्रामा, मिमिक्री और नाटक — असरानी हर मंच पर छा जाते थे।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर से की और आगे की पढ़ाई राजस्थान कॉलेज से पूरी की।
घर के संस्कार, सादगी और सीखने की लगन ने असरानी को आगे चलकर फिल्म इंडस्ट्री में मजबूत नींव दी।
संघर्ष से चमक तक का सफर
असरानी का दिल तो रंगमंच पर बसता था, लेकिन किस्मत उन्हें मुंबई तक खींच लाई।
वहां उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय की विधिवत ट्रेनिंग ली — वही संस्थान जिसने शत्रुघ्न सिन्हा, जया भादुड़ी और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकारों को भी गढ़ा।
1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियां’ फिल्म से असरानी ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। धीरे-धीरे वह इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने लगे। 70 के दशक में जब कॉमेडी कलाकारों को अक्सर हल्के में लिया जाता था, असरानी ने उसे एक नया सम्मान दिलाया।
हंसी का वह अंदाज जो कोई भूल नहीं सकता
असरानी के अभिनय में एक खास बात थी — सहजता। वे न तो जबरन मज़ाक करते थे, न ही सीन को ओवरएक्ट करते थे। उनका चेहरा, उनकी आंखें और आवाज़, सब कुछ दर्शक को अपने साथ जोड़ लेता था।
उनकी कॉमिक टाइमिंग इतनी सटीक थी कि फिल्म के छोटे से सीन में भी असरानी दर्शकों की याद में छा जाते थे।
फिल्में जिन्होंने असरानी को अमर बना दिया:
- नमक हराम – जहां उनकी सादगी भरी एक्टिंग ने दिल जीता।
- बावर्ची और गुड्डी – जहां राजेश खन्ना और जया भादुड़ी जैसे कलाकारों के साथ वे अपनी अलग छाप छोड़ते हैं।
- चुप चुप के, हलचल, दीवाने हुए पागल, हेरा फेरी और वेलकम – नई पीढ़ी के दर्शकों को भी उनकी कॉमेडी से हंसने का मौका मिला।
और ‘शोले’ — हिंदी सिनेमा की वह ब्लॉकबस्टर फिल्म जिसने असरानी को अमर कर दिया।
उनका किरदार जेलर शायद हिंदी फिल्मों का सबसे चर्चित कॉमेडी रोल बन गया।
उनका डायलॉग —
“हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं…”
आज भी लोग सुनते ही मुस्कुरा उठते हैं।
दरअसल, यह किरदार चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ से प्रेरित था, लेकिन असरानी ने इसे अपने अंदाज़ से ऐसा रूप दिया कि वह पूरी तरह “भारतीय असरानी” बन गया।
निर्देशक असरानी – जब हंसी के साथ आई सोच
बहुत कम लोग जानते हैं कि असरानी सिर्फ शानदार अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक अच्छे निर्देशक भी थे।
उन्होंने ‘आज की ताजा खबर’ और ‘चला मुरारी हीरो बनने’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया।
इन फिल्मों में उन्होंने हास्य के साथ समाज का आईना भी दिखाया — यही उनकी विशेषता थी।
वह कहते थे —
“हंसाना आसान नहीं, लेकिन अगर दर्शक मुस्कुराकर थिएटर से जाएं, तो वही सबसे बड़ी सफलता है।”
असरानी की मेहनत और कमाई
300 से अधिक फिल्मों में काम करने वाले असरानी की Net Worth लगभग ₹48 करोड़ बताई जाती है।
उनकी संपत्ति में मुंबई के जुहू स्थित घर और फिल्मों से हुई कमाई शामिल है। हालांकि, असरानी के जीवन में सादगी हमेशा बनी रही। उन्होंने अभिनेत्री मंजू बंसल से विवाह किया था। दोनों ने साथ मिलकर जीवन के हर उतार-चढ़ाव को मुस्कुराते हुए जिया।
असरानी – अभिनय से आगे की पहचान
असरानी सिर्फ फिल्मों में किरदार निभाने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि वे हंसी के वैज्ञानिक थे।
उन्होंने हर किरदार में कुछ नया किया —
कभी कॉमेडियन बनकर दर्शकों को हंसाया,
तो कभी गंभीर किरदारों में गहरी सोच छोड़ दी।
उनकी हंसी में सादगी थी, और सादगी में गहराई।
शायद यही कारण है कि असरानी की मौजूदगी फिल्मों में “खुशी की गारंटी” मानी जाती थी।
दर्शकों के दिलों में असरानी
असरानी का नाम आते ही लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती है।
आज भी जब कोई पुरानी फिल्म टीवी पर आती है, और असरानी पर्दे पर दिखते हैं — तो माहौल हल्का हो जाता है।
वह एक ऐसे कलाकार थे जिनकी मौजूदगी ही खुशी की वजह बन जाती थी।
लोग कहते हैं कि “कॉमेडी एक कला है”,
और असरानी ने यह कला इतनी ईमानदारी से निभाई कि वह “हंसी के उस्ताद” कहलाए।
असरानी की यादें और विरासत
हालांकि अब असरानी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका योगदान अमर है।
उनकी दिल को छू जाने वाली कॉमिक टाइमिंग आने वाली पीढ़ियों के लिए अभिनय की पाठशाला बन चुकी है।
फिल्म इंडस्ट्री में असरानी ने जो मुकाम हासिल किया, वह सिर्फ उनकी मेहनत नहीं, बल्कि उनकी सच्ची लगन और कला के प्रति समर्पण का परिणाम है।
निष्कर्ष:
गोवर्धन असरानी का जीवन यह सिखाता है कि
“अगर आप अपने काम से सच्चा प्यार करते हैं, तो आपकी पहचान हमेशा जीवित रहती है।”
उन्होंने यह साबित किया कि कॉमेडी केवल हंसी का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसा भाव है जो लोगों के दिलों तक पहुंचता है।
उनकी कला ने बॉलीवुड को न केवल मनोरंजन दिया, बल्कि हंसने का एक नया तरीका सिखाया।
असरानी अब सुनहरे पर्दे पर नहीं दिखेंगे
लेकिन जब भी कोई कहे — “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं…”
तो समझ लीजिए, असरानी फिर से हमारे बीच आ गए हैं —
एक मुस्कान के साथ।








