- अखिल दुबे, खेल समीक्षक

इटारसी। हीरो एशिया कप में भारतीय हॉकी टीम का प्रदर्शन, विशेषकर साउथ कोरिया के खिलाफ 2-2 का ड्रॉ, न सिर्फ चौंकाने वाला था बल्कि भारतीय हॉकी के भविष्य को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है। यह मुकाबला सिर्फ ड्रॉ पर खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह हमारी टीम की कमजोरियों, रणनीतिक खामियों और अनुशासनहीनता को भी उजागर कर गया।
फॉरवर्ड लाइन की विफलता: सबसे बड़ी चिंता
मैच का सबसे निराशाजनक पहलू हमारी फॉरवर्ड लाइन का प्रदर्शन रहा। अभिषेक, सुखजीत, और मनदीप जैसे खिलाड़ी गोल पोस्ट के सामने कई आसान मौके गंवाते नजर आए। यह सिर्फ एक खराब दिन का नतीजा नहीं था, बल्कि यह बताता है कि खिलाड़ियों के बीच तालमेल और फिनिशिंग की कमी है। अभिषेक का “स्वार्थी” खेल, जहाँ वे मुश्किल कोणों से भी गोल करने की कोशिश करते दिखे, टीम की एकजुटता पर सवाल उठाता है। यह व्यवहार एक टीम गेम में अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा है।
यह शर्मनाक है कि अंतिम क्वार्टर के 7वें मिनट में मनदीप ने बराबरी का गोल किया, लेकिन उसके बाद भी टीम मैच नहीं जीत पाई। अंतिम 8 मिनट में, जब टीम को एक निर्णायक गोल करने की जरूरत थी, तब ये खिलाड़ी पूरी तरह से विफल रहे। यह न केवल उनकी खराब फॉर्म को दिखाता है, बल्कि दबाव में प्रदर्शन करने की अक्षमता को भी उजागर करता है।
रक्षापंक्ति और रणनीति की खामियां
ऐसा नहीं है कि सिर्फ फॉरवर्ड लाइन ही विफल रही। जुगराज सिंह की जानबूझकर की गई गलती ने कोरिया को पेनल्टी कॉर्नर दिया, जिस पर उन्होंने गोल किया। यह एक बड़ी रणनीतिक चूक थी। इसके अलावा, दूसरे कोरियन गोल पर थर्ड अंपायर का निर्णय भी सवालों के घेरे में रहा, जिसने मैच के नतीजों को प्रभावित किया। यह निराशाजनक है कि जब फॉरवर्ड लाइन दबाव बना पाने में नाकाम रही, तो डिफेंडर्स और मिडफील्डर्स को बहुत आगे आकर खेलना पड़ा, जिससे डिफेंस में खाली जगह बन गई।
टीम के भीतर के मुद्दे और चयन पर सवाल
जिस तरह से टीम प्रदर्शन कर रही है, उससे यह साफ लगता है कि मैदान के बाहर भी सब कुछ ठीक नहीं है। क्या टीम मैनेजमेंट, कोच और चयनकर्ताओं के बीच तालमेल की कमी है? यह सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम देखते हैं कि लगातार खराब प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को टीम में बार-बार मौका दिया जा रहा है। यह स्थिति भारतीय हॉकी के लिए 20-25 साल पहले जैसी है, जब टीम फॉरवर्ड और डिफेंस दोनों में कमजोर थी और सिर्फ मिडफील्ड के दम पर टिकी रहती थी।
आगे की राह: क्या मलेशिया को हरा पाएंगे?
इस निराशाजनक प्रदर्शन के बाद, टीम का आत्मविश्वास निश्चित रूप से गिरा होगा। अब अगला मुकाबला मलेशिया से है, और इस “हताश और थकी हुई” टीम से जीतने की उम्मीद करना मुश्किल है। अगर भारत यह मैच ड्रॉ खेलता है या हार जाता है, तो अपने ही देश में फाइनल से बाहर होने का अपमान झेलना पड़ेगा। भारतीय हॉकी टीम को अपनी गलतियों को तुरंत सुधारना होगा और एक टीम के रूप में खेलना सीखना होगा, वरना फाइनल में पहुंचने का सपना सिर्फ एक सपना बनकर रह जाएगा।








