- अभिषेक तिवारी

आज हम भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, नदी संरक्षण के प्रणेता और मां नर्मदा के सच्चे साधक श्रद्धेय अनिल माधव दवे जी को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करते हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति और नदियों की सेवा में समर्पित रहा। वे केवल एक पर्यावरण कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि एक विचारक, संगठक और सच्चे राष्ट्रभक्त थे। वे मां नर्मदा के सच्चे साधक थे। उन्होंने भारत की पारंपरिक पर्यावरण संरक्षण पद्धतियों को आधुनिक चुनौतियों से जोड़कर एक सशक्त मॉडल प्रस्तुत किया।
अनिल दवे का जीवन संगठन और सेवा का अनूठा उदाहरण था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, जहां उन्होंने समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के संस्कारों को आत्मसात किया। संघ के माध्यम से उन्होंने वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को बढ़ावा दिया। बाद में 2016 में उन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री बनाया गया। अनिल दवे ऐसे एकमात्र प्रचारक हैं जिन्होंने सीधे संघ से केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान पाया।
उनका सबसे बड़ा योगदान मां नर्मदा के संरक्षण के प्रति था। उन्होंने नर्मदा सेवा यात्रा जैसे अभियानों के माध्यम से नदी की स्वच्छता और संरक्षण के लिए जनजागृति फैलाई। वे मानते थे कि नदियां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवनधारा हैं। मंत्री के रूप में उन्होंने नमामि गंगे, नर्मदा संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण जैसे कार्यक्रमों को गति दी। नर्मदापुरम से उनका गहरा नाता रहा, उनकी इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार नर्मदापुरम के बांद्राभान तट पर किया गया। मुझ अनिल दवे का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ, जिसकी अविस्मरणीय स्मृतियां मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं।
आज जब प्रकृति का दोहन और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां बढ़ रही हैं, अनिल माधव दवे के विचार और कार्य अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उनके पुण्य स्मरण के अवसर पर हम यह संकल्प लेते हैं कि हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे, नदियों और पर्यावरण की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे। अनिल दवे की इन पंक्तियों के साथ नवयुग के भागीरथ के चरणों में अपनी शब्दांजलि अर्पित करता हूं।
‘नदियां हमारी सभ्यता की धमनियां हैं, इन्हें बचाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।’









