इटारसी। ग्राम तारारोड़ा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़े ही धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया। जैसे ही भगवान का जन्म हुआ, पूरा पंडाल हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर और नृत्य कर अपनी खुशी का इजहार किया।
दुष्टों के संहार के लिए धरा पर आए नारायण
कथा व्यास देवी रत्नमणि द्विवेदी ने भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि जब धरती दुष्टों के अत्याचारों से त्रस्त हो गई, तब भगवान विष्णु ने धरा का कष्ट हरने के लिए अवतार लिया। उन्होंने कंस के अत्याचार, देवकी-वसुदेव का विवाह और उस आकाशवाणी का जिक्र किया जिसने कंस को विचलित कर दिया था।
अद्भुत थी जन्म की वह घड़ी
कथा में बताया गया कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की घनघोर अंधेरी रात में जब रोहिणी नक्षत्र का संयोग बना, तब मथुरा के कारागार में चतुर्भुज रूप में भगवान प्रकट हुए।
- ईश्वरीय माया : भगवान की आज्ञा से जेल के पहरेदार सो गए और बेडिय़ां अपने आप खुल गईं।
- यमुना ने दिया मार्ग : उफनती यमुना के बीच जब वसुदेव जी बालक कृष्ण को टोकरी में लेकर गोकुल की ओर चले, तब शेषनाग ने बारिश से रक्षा की और यमुना नदी ने स्वयं रास्ता दिया।
कंस को दी चेतावनी
कथा के दौरान उस दृश्य का भी सजीव वर्णन किया गया जब कंस ने यशोदा की कन्या को मारना चाहा, लेकिन वह माया आकाश में उड़ गई। कन्या ने साफ़ चेतावनी दी कि कंस का काल वृंदावन में जन्म ले चुका है। कथा के अंत में भगवान की आरती की गई और माखन-मिश्री का प्रसाद वितरित किया गया।










