झरोखा: पंकज पटेरिया। माँ भगवती राजराजेश्वरी की महिमा अपरंपार है, महाशक्ति से पृथक कुछ भी नहीं है। शक्तिरूपा जगतजननी के नवरूप सर्व विधि सभी की रक्षा करते, मनोरथ पूर्ण करते हैं। ब्रह्म का संकल्प है एको हम बहू स्याम, अर्थात मै एक हूं और बहुत हो जाऊं। यह संकल्प ही आदिशक्ति जगदम्बे का महास्वरूप है। शक्ति के सभी नाम, रूप मातारानी के दिव्य स्वरूप हैं, वे त्रिगुणात्मक शक्ति हैं। जगत का पालन-पोषण करने वाली मातारानी को अन्नपूर्णा भी कहा जाता है । वे संसार भर का भरन पोषण करती हैं। विभिन्न पंचविकारो से रक्षा करने के कारण वे श्री दुर्गा महारानी है। देवी का पुराण कथाओं में उल्लेख है कि जब तामसी प्रवृतियों का दुष्प्रभाव फैलने लगा, देवगण परेशान होने लगे तो सभी ने भगवान विष्णु की शरण में पहुंच कर सहायता की प्रार्थना की। तब विष्णु भगवान ने शक्ति आह्वान किया। फलस्वरूप विष्णु भगवान के श्री मुख से महातेज का उद्भव हुआ। श्री शिव जी एवं अन्य देवगण की दिव्य देह से ऐसे ही तेज प्रकट हुए और सब एकाकार होकर महातेजमयी नारी रूप में देवी प्रकट हुई। आदिदेव शिवशंकर तेज से माता श्री मुख विष्णुजी से भुजाए, यम से केशराशि, चंद्रदेव से वक्ष स्थल, इंद्रदेव से कटी भाग, ब्रम्हा जी के तेज से युगल चारु चरण कमल, सूर्यदेव से अंगुलिया, कुबेर से नासिका, दंतपंक्ति प्रजापति जी से, त्रिनेत्र अग्निदेव से, भोहे संध्या से तथा कान पवन के तेज से प्रकट हुए।
शिव ने शूल, विष्णु ने चक्र, पवनदेव ने धनुष-बाण, देवराज इंद्र ने घंटा, वरुण ने पाश, काल ने तलवार और ढाल सहित सभी देव ने दिव्य वस्त्र, रत्नाभूषण प्रदान किए। साथ ही पर्वतराज हिमालय ने सिंह, सागर ने मनोहारी कमल तथा कुबेर ने मधु से भरा पात्र अर्पित किया। महादेवी की महिमा असीम है। वे माता हैं, शक्ति है, क्षमा है, स्मृति है, बुद्धि है एवं निद्रा रूप में स्थित हैं। श्री दुर्गाशब्दशती में मातारानी की महिमा स्तुति वर्णित है। कितने ही ग्रंथो में माँ दुर्गा का असीम कीर्तिगान हुआ है, लेकिन उनकी अपरिमित महिमा का पार नहीं है। अत निश्छल मन से महाशक्ति की उपासना के इस महापर्व पर उनके चरण-कमल पर श्रद्धानत, मन-कर्म-वचन से समर्पण कर यही प्रार्थना करना चाहिए कि-
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी॥
अर्थात- हे भवानी पिता, माता, भाई, दाता, पुत्री, भ्रत, स्वामी, स्त्री, विद्या, व्रती कोई भी मेरा नहीं है। एक आपका ही सहारा है, आप ही मेरी गति हो।
माँ के चरणों में शरणागत हो जाने से सब दुख-दर्द समाप्त हो जाते हैं, माँ के चरणों में ही हमारी सदगति है।
ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते॥

पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार/साहित्यकार
ज्योतिष सलाहकार एवं संपादक- शब्दध्वज।
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