इटारसी। घर के देव ललाये, बाहर के पूजन जाए, यह कहावत इन दिनों संत शिरोमणि रामजी बाबा मेला 2026 में पूरी तरह सटीक बैठ रही है। मेले का भव्य शुभारंभ तो हो चुका है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे स्थानीय कलाकारों का दर्द और उपेक्षा साफ झलक रही है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए अपनाई ठेका प्रणाली अब स्थानीय प्रतिभाओं के लिए गले की फांस बन गई है।
ठेकेदारी प्रथा और मनमानी का बोलबाला
इस वर्ष मेले की बिछात, मंच, साउंड से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक की पूरी जिम्मेदारी ठेका प्रणाली के हवाले है। स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक ग्रुपों का आरोप है कि ठेकेदार अपनी मनमानी कर रहे हैं, जिसके कारण शहर की अपनी प्रतिभाओं को मंच मिलना दूभर हो गया है। कलाकारों का कहना है कि पूरी व्यवस्था बाहरी ठेकेदारों के हाथ में होने से वे स्थानीय स्तर पर संपर्क और समन्वय को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं।
पुराने कार्यकाल की याद और वर्तमान की बेरुखी
नगर के कलाकारों ने पूर्व नगर पालिका अध्यक्षों श्रीमती माया नारोलिया एवं अखिलेश खंडेलवाल के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उस समय स्थानीय ग्रुपों को उचित सम्मान और मंच दिया जाता था। उनके बाद जब से टेंडर प्रणाली लागू हुई है, तब से स्थानीय सहभागिता लगातार गिरती जा रही है।
जब भी कोई कार्यक्रम निशुल्क करवाना होता है, तब प्रशासन को स्थानीय कलाकार याद आते हैं। लेकिन जब सम्मानजनक मंच और पारिश्रमिक की बात आती है, तो बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता देकर हमारा अपमान किया जाता है।
माँ के बेटे ग्रुप और अन्य दलों की मांग
इटारसी के प्रसिद्ध मां के बेटे ग्रुप सहित कई स्थानीय दलों ने बताया कि वे हर साल विधिवत आवेदन करते हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें केवल खानापूर्ति मानकर ठंडे बस्ते में डाल देता है। इस वर्ष भी आवेदन दिए गए हैं, लेकिन कलाकारों में संशय है कि उन्हें अवसर मिलेगा या नहीं। ठेका प्रणाली के नियमों में यह अनिवार्य शर्त जोड़ी जाए कि मेले के शुरुआती कुछ दिन केवल स्थानीय कलाकारों के लिए आरक्षित हों।
- स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की तय की जाए।
- आवेदन करने वाले स्थानीय ग्रुपों को प्राथमिकता के आधार पर समय दिया जाए।
प्रशासन के सामने बड़ा सवाल
अब जनता और कलाकार समुदाय के बीच यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या रामजी बाबा मेला सिर्फ व्यापारिक ठेकों का केंद्र बनकर रह जाएगा? क्या स्थानीय प्रशासन अपनी माटी के कलाकारों को वह सम्मान दिला पाएगा जिसके वे हकदार हैं, या फिर यह डिजिटल और बाहरी चकाचौंध में स्थानीय प्रतिभाएं यूं ही दबती रहेंगी?










