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इन जगहों पर होती है रावण की पूजा, लगता है रावण मेला

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इटारसी। शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2021) का पर्व चल रहा है। हर दिन मां जगदम्बा देवी के नौ रूपों की उपासना की जा रही है। आज नवमी का पर्व मनाया गया। इसके ठीक दूसरे दिन असत्य पर सत्य की जीत का पर्व दशहरा (Dussehra festival) मनाया जाएगा। सभी रावण का दहन कर विजयदशमी का पर्व धूम धाम से मनाएगें। जिसे दशहरा कहते हैं। इस दिन परंपरा अनुसार रावण के पुतले का दहन कर, असत्य पर सत्य की विजय का पर्व मनाया जाता है। हमारी संस्कृति में भले ही रावण को बुरा माना गया है लेकिन हमारे देश के कुछ स्थानों पर इसे पूजा जाता है। यहां रावण का दहन न होकर इसकी पूजन की जाती है। तो आइए जानते है ऐसें कौन से शहर है जहां यह अनुठी परंपरा है….

बैतूल- दशहरा यानि रावण दहन, लेकिन बैतूल का आदिवासी समाज रावण दहन का विरोध करता है। यहां के आदिवासी रावण को अपना वंशज मानते हैं। यहां के छतरपुर गांव में तो रावण का एक मंदिर भी है जिसे रावनवाड़ी कहते हैं। रावनवाड़ी में हर साल मेला लगता है जिसमें हज़ारों आदिवासी अपने आराध्य रावण की पूजा अर्चना करते है।

पहाड़ी पर रावनवाड़ी
बैतूल में घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के छतरपुर गांव के पास लगभग 2 हज़ार फ़ीट ऊंची पहाड़ी है। इस पहाड़ी पर रावण का मंदिर है। जिसे स्थानीय आदिवासी रावनवाड़ी कहते है। रावण के प्रति आदिवासियों की अगाध श्रद्धा है। हर साल यहां दशहरे के बाद मेला लगता है जिसमे आदिवासी अपने आराध्य रावण की पूजा अर्चना करते हैं। वो जुलूस की शक्ल में नाचते-गाते आते हैं और अपनी मन्नत मानते हैं। साथ ही यहां धातु से सैनिकों की प्रतिमाएं बनाई गई है। जिसे रावण की सेना माना जाता है।

मंदसौर – मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में भी रावण को पूजा जाता है। मंदसौर का असली नाम दशपुर था, और यह रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का मायका था। इसलिए इस शहर का नाम मंदसौर पड़ा। चूंकि मंदसौर रावण का ससुराल था, और यहां की बेटी रावण से ब्याही गई थी, इसलिए यहां दामाद के सम्मान की परंपरा के कारण रावण के पुतले का दहन करने की बजाय उसे पूजा जाता है। मंदसौर के रूंडी में रावण की मूर्ति बनी हुई है।

उज्जैन – मप्र का उज्जैन जहां रावण की पूजा होती है यहां रावण का दहन नहीं किया जाता है। रावण का यह स्थान चिखली गांव है। यहां के बारे में कहा जाता है, कि रावण की पूजा नहीं करने पर गांव जलकर राख हो जाएगा। इसी डर से ग्रामीण यहां रावण दहन नहीं करते और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं।

बिसरख – यूपी के बिसरख नामक गांव में भी रावण का मंदिर बना हुआ है, जहां उसका पूजन होता है। ऐसा माना जाता है कि बिसरख गांव, रावण का ननिहल था। बिसरख का नाम पहले विश्वेशरा था जो रावण के पिता के नाम पर पड़ा था।

बैजनाथ – कांगड़ा जिले का यह कस्बा भी रावण की पूजा के लिए जाना जाता है। यहां के बारे में कहा जाता है, कि रावण ने यहां पर भगवान शिव की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मोक्ष का वरदान दिया था। इसलिए शिव के इस भक्त का इस स्थान पर पुतला नहीं जलाया जाता।

जोधपुर – जोधपुर में भी रावण का मंदिर और उसकी प्रतिमा स्थापित है। कुछ समाज विशेष के लोग यहां पर रावण का पूजन करते हैं और खुद को रावण का वंशज मानते हैं। इस स्थान को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कुछ लोग इसे रावण का ससुराल बताते हैं।

अमरावती – महाराष्ट्र के अमरावती में भी रावण को भगवान की तरह पूजा जाता है। यहां गढ़चिरौली नामक गांव पर आदिवासी, कोरकू समुदाय के लोग रावण की पूजा करते हैं। आदिवासियों का पर्व फाल्गुन, रावण की खास तौर से पूजा कर मनाया जाता है। कहा जाता है कि यह समुदाय रावण और उसके पुत्र को अपना देवता मानते हैं।

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