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माता शीतला के भक्तों के लिए बेहद ही खास दिन शीतला अष्टमी

इटारसी। शीतलाष्टमी का दिन माता शीतला के भक्तों के लिए बेहद ही खास होता है। शीतला अष्टमी के दिन पूजा के समय माता शीतला को मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। खासतौर पर इस दिन माता शीतला को बासी पकवानों का भोग लगाया जाता है और खुद भी बासी और ठंडा भोजन ही ग्रहण किया जाता है। शीतलाष्टमी चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा-आराधना का विधान है।

शीतला अष्टमी को बसौड़ा या बासोड़ा भी कहा जाता है। शीतला अष्टमी के दिन पूजा के समय माता शीतला को पर मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। ये चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। खासतौर पर इस दिन मां शीतला को बासी पकवानों का भोग लगाया जाता है और खुद भी बासी और ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है। मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन पूरे विधि विधान के साथ पूजा करने से बीमारियों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख शांति बनी रहती है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 1 अप्रैल को रात 09 बजकर 09 मिनट पर हो रही है। इस तिथि का समापन 2 अप्रैल को रात 08 बजकर 08 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए बसौड़ा यानी शीतला अष्टमी का व्रत 2 अप्रैल को रखा जाएगा।

2 अप्रैल को शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा के दिन सुबह 06 बजकर 10 मिनट से शाम 06 बजकर 40 मिनट के बीच कभी भी शीतला माता की पूजा कर सकते हैं। शीतला सप्तमी तिथि बसौड़ा यानी शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। यह तिथि भी माता शीतला को समर्पित है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 31 मार्च को रात 9 बजकर 30 मिनट से 1 अप्रैल को रात 9 बजकर 9 मिनट तक है। ऐसे में 1 अप्रैल को शीतला सप्तमी और 2 अप्रैल को बसौड़ा मनाई जाएगी। शीतला अष्टमी पूजा विधि शीतला अष्टमी के दिन सुबह स्नान करक साफ वस्त्र धारण करें।

पूजा के वक्त हाथ में फूल, अक्षत, जल और दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लें। माता को रोली, फूल, वस्त्र, धूप, दीप, दक्षिणा और बासा भोग अर्पित करें। शीतला माता को दही, रबड़ी, चावल आदि चीजों का भी भोग लगाया जाता है। पूजा के समय शीतला स्त्रोत का पाठ करें और पूजा के बाद आरती जरूर करें। पूजा करने के बाद माता का भोग खाकर व्रत खोलें।

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