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*श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष : राम-कृष्ण का अद्भुत दर्शन संयोग,राम जहां लेते हैं विराम, कृष्ण शुरू करते हैं वहीं से*

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*प्रसंग वश – चंद्रकांत अग्रवाल * : 
विगत कॉलम में हमने श्री राम मंदिर के शिलान्यास प्रसंग पर रामराज्य के तत्वों का मर्म व दर्शन आत्मसात किया। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मुझे श्री कृष्ण के जीवन दर्शन पर बहुत कुछ लिखने के बाद भी न जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि मेरे श्री कृष्ण की दिव्यता व अलोकिकता के कई आयाम तो अभी भी नेपथ्य में ही है। मुझे आठवें दशक के एक वरिष्ठ नवगीतकार स्व.उमाकांत मालवीय के चिंतन का एक आयाम सहज ही देखने को मिला। तो लगा कि मेरे श्रीकृष्ण की अदभुद संपृक्तता का एक आयाम शायद यही है। लिहाजा आज उनकी कुछ अनुभूतियों को मैंने इस कॉलम में अपने अहसासों के साथ पिरोया है, शब्दों में । श्री कृष्णमय वंदनवार में वैसे भी किसी भी शब्द का एक सामान्य अर्थ होता है। यह सामान्य अर्थ परंपरागत उसके पूर्वापर संबंधों से बनता है। किन्हीं पुनीत क्षणों में यह अर्थ बोध के धरातल पर उतरता है और जब कभी शब्द का ही अनुग्रह होता है तो वह हम पर अपना मर्म उजागर करता है, क्योंकि शब्द जब आचरण से मंडित होता है तो वह मंत्र की शक्ति प्राप्त करता है। आचरण विहीन उपदेश, शब्द अकारथ होता है, केवल छूंछा अर्थ, थोथा चना बाजे घना। गोस्वामी तुलसीदास घोषित करते हैं-
भाव कुभाव अनख आलसहूं,
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।

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कृष्ण का सामान्य शाब्दिक अर्थ है- कालांरग अथवा श्यामल वर्ण। कृष्ण का पूर्वापर संबंधों पर आधारित परंपरागत अर्थ है- देवकी-वसुदेव का आठवां पुत्र, नंद और यशोदा का पोषित पुत्र, बलराम का अनुज, उग्रसेन का दौहित्र, रूक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियों का पति, राधा का प्रियतम, गोप-गोपियों, ग्वाल-बालों, अर्जुन एवं द्रौपदी के सखा। परंतु कृष्ण को बोध के धरातल पर ग्रहण करना तभी संभव है, जब स्वयं कृष्ण ही कृपा करें और पार्थवत् दिव्यदृष्टि प्रदान कर अपने विराट रूप को उजागर करें। कौन जानता है, यात्रा कहां से आरंभ होती है? आमतौर पर कोई कृष्ण को परंपरागत पूर्वापर संबंधों के अर्थ में निहित मूर्त संदर्भ में ग्रहण करेगा, परिमेय से अपरिमेय की ओर बढ़ेगा अथवा संत एकनाथ की भांति असीम निराकार को उपलब्ध कर साकार सगुण कृष्ण की उपासना करेगा, उनका साक्षात्कार करेगा और फिर भावार्थ रामायण रचेगा। यह एक समग्रता है, जो किसी क्रम की कायल नहीं होती। स्व. उमाकांत मानते थे कि कृष्ण अपने अपरिमेय अर्थ में एक प्रतीति हैं, एक आनंदानुभूति हैं। कृष्ण अपने परिमेय अर्थ में एक अव्ययभाव हैं, एक रस विशेष हैं, एक आस्वाद छंद हैं, एक अनुगूंज की यात्रा हैं, जो वेणु से पांचजन्य शंख के मध्य संपन्न होती है। वह एक पुकार हैं, टेर हैं, प्रार्थना हैं, जो वेणु के रंध्रारंध्र से उठते हैं और उपलब्ध होने पर पांचजन्य के माध्यम से संभावामि युगे-युगे का उद्घोष करते हैं। मैं महसूस करता हूं। मेरे इर्द-गिर्द, चतुर्दिक अनेक कृष्ण हैं, जो एक टेर के लिए, एक प्रार्थना के लिए, एक पुकार के लिए, एक वेणु की तलाश में प्रतीक्षा में हैं-
तराना ब-लब हैं हजारों कन्हैया,
न जाने इन्हें बांसुरी कब मिलेगी।

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कृष्ण महाकाल के अधरों पर थिरकता हुआ महाराग का शाश्वत महारास हैं। वह तांडव और लास्य का कास्य शिव समन्वय हैं। कनुप्रिया की राधा की एक प्यारी मान भरी चुनौती है अपने कनु के लिए, ये उत्तर की ओर जो गिद्ध मांस के लोथड़े लिए उड़े जा रहे हैं, इन्हें तुम उसकी तरह टेरों, जैसे वेणु से ग्वाल-बालों, गायों को टेर लिया करते थे। इस यमुना की लहरों पर शस्त्र लदी उतराती नौकाओं से कनु तुम वैसे ही कर वसूली करो, जैसे ग्वालिनियों से दधि, गोरस, नवनीत कर वसूल लेते थे। कृष्ण की लघिमा और कृष्ण की महिमा-
घट के मैं एक मुख्तसर – सा लमहा हूं,
बढ़ के मैं एक नातमाम अरसा हूं।
अपेक्षा है, भीतर एक आंच की, एक लौ की, जो अंतत: पुकार बन कर उठे, जो एक विकल, किंतु आश्वस्त प्रतीक्षा से संपन्न हो। बांसुरी के ही शब्दों में कहूं तो-
मैं फिजा की मुठ्ठियों में कैद तनहा लफ्ज हूं,
अपने होंठों पर सजा ले दास्तां बन जाऊंगा।
राम और कृष्ण-यह दो शब्द हैं। मन हैं, प्राण हैं, जिनकी अनुपस्थिति में, जिनके अभाव में भारत की परिकल्पना भी संभव नहीं है। वह प्राकृत का एक अनाम कवि है, जिसने माता यशोदा की एक अनूठी छवि को उकेरा है। माता यशोदा गौरवर्णा हैं, तनिक स्थूल। शिशु कृष्ण पयपान कर रहे हैं, वे अपनी नन्ही-नन्ही अरूण-श्याम हथेलियों में उनका पृथुल पयोधर सम्हाल कर मुंह से लगाए हुए हैं। कवि कहता है, री बड़- भागिन यशोदा , किसे मालूम था कि तेरा यह पयोधर कृष्ण की इतनी बड़ी विवशता बन जाएगा कि यहां से लेकर महाभारत के युद्ध तक पांचजन्य बनकर उसके मुंह से लगा रहेगा। कृष्ण कालिय नाग के फन पर नृत्य कर रहे हैं, तान-तान फणि व्याल कि तुझ पर मैं बांसुरी बजांऊगा। कालिय के फन पर नीलवर्ण, पीतांबरधारी , अरूणाभ अधर, रतनार नेत्रों की छवि को रूपायित करते हैं। जब जामवंत, कृष्ण को देखते हैं तो उन्हें रामावतार में राम द्वारा दिया गया आश्वासन और धरती की छवि याद आते हैं । जामवंत ने सात बार धरती की परिक्रमा की थी । अंतरिक्ष से नील धूमावेष्ठित नारंगी रंग की इसी धरती की छवि को देखकर जामवंत पुलकित हुए थे। पृथ्वी कल्प अथवा कल्पांतर में गिरिजा कुमार माथुर ने अंतरिक्ष में खड़े हुए मानव से, भूवंदना कराई है और धरती की इसी छवि को उत्कीर्ण किया है। आश्चर्य यह है कि प्रथम अंतरिक्ष यात्री गैगरिन ने भी जब अंतरिक्ष से धरती को देखा तो इसी प्रकार उसकी रूप राशि पर मुग्ध होकर उसका कीर्तन किया था। वह ईश्वर हैं, परंतु भक्त को परमेश्वर का रूतबा बख्शते हैं। वह कभी हनुमान के लिए धनुर्धर राम बनते हैं तो कभी तुलसी की जिद रखने के लिए कृष्ण भए रघुनाथ की लीला करते हैं। वह भीष्म का प्रण रखने के लिए अपना प्रण तृणवत् तोड़ देते हैं। वृंदावन से यात्रा पर निकले हुए एक परिब्राजक संत गोपाल दास जी ने दक्षिणात्य महान संत कवि संगीतकार त्यागराज जी को जब यह तुलसी-प्रसंग सुनाया तो वे आनंदतिरेक में मूच्र्छित हो गए- क्या भगवान इस सीमा तक भक्तों की जिद की रक्षा करते हैं।

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वह ब्रज में चीर हरण करते हैं, लेकिन पांचाली का चीर बढ़ाते हैं। विनाशाय-च-दुष्कृताम् संकल्प को संपन्न करेन के क्रम में असुरों का विनाश करते तो है, लेकिन इस महायात्रा में, कुब्जा को भी नहीं भूलते। वह रमते हैं तो खूब रमते हैं, वह भूलते हैं तो खूब भूलते हैं। ब्रज छोड़ा तो फिर पलट कर झांका तक नहीं। पानी परात को हाथ नहीं लगाते हैं और नैनन के जल सों सुदामा के पग पखारते हैं। वह दुर्र्याेधन के मेवे छोड़ते हैं। ओर आग्रहपुर्वक विदुर के घर साग खाते हैं। वह श्रीमंतों के समक्ष धीमंतों को वरीयता देते हैं। महाभारत के महासमर का सूत्र संचालन, उनके हाथों में है। किरीट में मयूर पंख नाहक थोड़े ही खोंस रखा हैं। उनके व्यक्तित्व में रंगारंग मयूरपंखी अनेक रंग हैं। साम, दाम, दंड भेद क्या नही हैं वहां? तथापि गांधारी का शाप। गांधारी जानती है कि मनुष्य के रूप में कृष्ण ईश्वर हैं। इसी विश्वास के तहत उन्होंने कृष्ण से कहा था कि वे चाहते तो युद्ध रोक सकते थे। इसी लिए शाप दिया था कि 36 वर्ष बाद उनके वंश की तरह ही यादव वंश भी आपस में लड़कर खत्म होगा। श्री कृष्ण कहते है कि वे विधि के विधान में हस्तक्षेप नही कर सकते । अर्थात ईश्वर होने के बावजूद वे विधि के विधान को सर्वोंपरि बताते हैं। कृष्ण इतिहास को भूत , वर्तमान व भविष्य के खंडों में बांटकर नही देखते , एक अविरल काल- प्रवाह के रूप में देखते हैं । अत: वे गांधारी के शाप को भी गौरव व शालीनता से आर्शीवाद स्वरूप स्वीकार ही नहीं , अंगीकार करते हैं। शाप देने वाली गांधारी स्वयंं रो पड़ती हैंं। आततायी आत्मज भौम का वध,उसकी माँ और अपनी प्रिय पटरानी सत्यभामा के समक्ष करने में संकोच नही करते
निश्चेष्ट होकर बैठ रहना,यह महा दुष्कर्म है ।
न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है। ।
कृष्ण अपने ही द्वार अपने ही संभावित आततायी कु ल के विनाश की निर्मम भूमिका भी प्रस्तुत करते हैं। पर्वत पर स्थित बर्बरीक का मुंड जिन्हें कलयुग में श्री कृष्ण स्वरूप मानकर पूरी दुनिया खांटूश्याम जी के नाम से पूजती है भी प्रमाणित करता हैं, मैने महाभारत के महासागर में देखा है- केवल कृ ष्ण ही लड़े, केवल कृष्ण ही जीते केवल कृष्ण ही हारे, केवल कृ ष्ण ही हत हुए। कृष्ण, अपने लिए, परम एकांत विचार, सन्नाटे, निविड़ अरण्य में , अनसंग, मृग की मृत्यु का वर्णन करते हैं।
बधिव व्याध को अभय देेते हैंं । अखंड, अव्यय, शाश्वत प्रेम की स्थापना करते हैं, वह समस्त आरोपित ईश्वरत्व तक को दर किनारे कर राधाचरण की चक्रवर्ती भूमिका सगौरव स्वीकार करते हैं। कौन जाने मीरा ही प्रेम दीवानी थी या उनका गिरधर नागर भी प्रेम दीवाना था। रसखान तो निहाल है, न्यौछावर हैं, ताज उनके लिए है तो मुगलानी हिंदुआनी ह्वैं रहूंगी मैं घोषणा करती है। नजीर अकबाराबादी कृष्ण कन्हैया के बालपन में रीझे हैं, ठगे हैं, बिके हैं। राजस्थान की नसीबा कहती है, तुम रूठोगे? तो रूठो।
रूठकर जाओगे कहां? नसीबा कहती है, तुम और तुम्हारे नसीब में नसीबा के सिवाय और है क्या? कृष्ण को इतनी आत्मीयता से महसूस किया जा सकता है। भगवान राम का शैशव आदि अपेक्षाकृत उतना संसक्तिपूर्ण नही रहा , वे लगभग बराबर अनासक्त बने रहे, तथापि इतने संसक्त की लीला संवरण की तो अयोध्या के कीट पतंग तक को नहीं छोड़ा,अपने साथ लेते गए। राम और कृष्ण का यह अदभुद योग – एक जहां अपनी यत्रा संपृक्तता से शुरू करते हैं और नितांत असंपृक्ता संदर्भों में संपन्न करते हैं।
यूं इनकी यात्रा,चाहे रामत्व की अथवा कृष्णत्व की – अहर्निश गतिमान है, इनके स्थगित होने का प्रश्न ही नही उठता । कृ ष्ण हमारे लिए लकुटी, कमरिया, काछनी , पीतांबर,कदम की छांव, करील के कुंज, कालिंदी तट,गोचारण ,वेणु,गोरोचन, मयूरपंख, वनमाल,गुंज्जामाल अवश्य छोड़ गए हैं। वृंदावन की चांदनी रज ,महारास के नूपुर मधुवन की आहलादिनी स्मृति। अपना-अपना भाग्य कहूँ याअनुग्रह कहूँ जो जिसके हाथ लगे, कौन जाने । मेरे हाथ तो जो दिव्य अहसास लगे,उन्हें आज श्री कृष्ण जन्म के पावन प्रसंग पर आपके समक्ष अभिव्यक्त कर दिया।

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चंद्रकांत अग्रवाल

Contact : 9425668826

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