- चंद्रकांत अग्रवाल, वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार
इटारसी। नर्मदापुरम संभाग और इटारसी के चिकित्सा जगत का वह दैदीप्यमान नक्षत्र अब ब्रह्मलीन हो गया है, जिसने पिछले 60 वर्षों से अपनी हर सांस को केवल जनसेवा के लिए समर्पित कर रखा था। डॉ. पुरुषोत्तम दास (पी.डी.) अग्रवाल महज एक चिकित्सक नहीं, बल्कि कर्मयोग और संवेदनशीलता के प्रतिमान थे। शासकीय सेवा में देवदूत की भूमिका स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री मदनलाल जी अग्रवाल के संस्कारों को जीवंत रखते हुए डॉ. साहब ने साढ़े तीन दशक तक शासकीय जनसेवा रुग्णालय (अब डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल)में सेवाएं दीं।
वह दौर ऐसा था जब वे प्रतिदिन ओपीडी में 200 से 300 मरीजों को न केवल पूरी आत्मीयता से देखते थे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करते थे कि उन्हें नि:शुल्क दवाइयां मिलें। उनका भाव मरीजों के प्रति सदैव पितृवत रहा। सेवानिवृत्ति के बाद भी अनवरत सेवायज्ञ वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त होने के बाद, अग्रवाल समाज की संस्था तरुण अग्रवाल मंडल के माध्यम से उन्होंने एक फ्री डिस्पेंसरी का नेतृत्व स्वीकार किया। उनकी केवल एक शर्त थी— दवाइयां उच्च गुणवत्ता की होनी चाहिए।
- अद्भुत कीर्तिमान : पिछले 23 वर्षों में उन्होंने लगभग 4 लाख सफल ओपीडी की, जिसका रिकॉर्ड आज भी सुरक्षित है।
- त्याग की प्रतिमूर्ति : उन्होंने मंडल से कभी शुल्क नहीं लिया, बल्कि दवा कंपनियों से मिलने वाले सैंपल भी नि:शुल्क बांट देते थे।
विलक्षण प्रतिभा और दर्शन
एमबीबीएस होने के बावजूद उनका डायग्नोसिस किसी बड़े विशेषज्ञ से कम नहीं था। वे केवल शरीर नहीं, बल्कि मन की पीड़ा भी पढ़ लेते थे। अक्सर वे दवा के पर्चे से पहले घरेलू नुस्खे, खान-पान और जीवन जीने की कला सिखाते थे। वे इतने सहज थे कि कई बार गरीब मरीज फीस के बदले उनकी पसंद की सब्जी या फल ले आते और वे सहर्ष उनका इलाज करते।
दुखों के विष को पीकर बांटी मुस्कान
डॉ. साहब का निजी जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण और पीड़ादायक रहा। इकलौते जवान बेटे और फिर दामाद को खोने के बाद भी उन्होंने अपनी बहू और बेटी को बेटों जैसा सम्मान और प्यार दिया। अपनी बीमारियों और पारिवारिक आघातों के बावजूद उन्होंने कभी सेवा का मार्ग नहीं छोड़ा। वे अक्सर पूछते थे कि इतनी पीड़ा के बाद भी मैं जीवित क्यों हूं? और इसका उत्तर उनकी निस्वार्थ सेवा में छिपा था—वे हजारों मरीजों की ऑक्सीजन और उम्मीद थे।
निष्कर्ष –
डॉ. पुरुषोत्तम दास (पी.डी.) अग्रवाल एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने पिछले छह दशकों तक अपनी हर सांस को पीडि़त मानवता के चरणों में समर्पित कर दिया। डॉ. साहब महज एक चिकित्सक नहीं, बल्कि एक चिकित्सक पुजारी और कर्मयोगी थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री मदनलाल जी अग्रवाल के पुत्र डॉ. पी.डी. अग्रवाल ने अपने पिता के सेवा-संस्कारों को चिकित्सा फील्ड में नए आयाम दिए। उन्होंने कभी मुस्कुराहट और सेवा का दामन नहीं छोड़ा। वे भीतर ही भीतर दुखों का जहर पीते रहे और बाहर मरीजों को जीवनदायिनी ऑक्सीजन बांटते रहे। डॉ. पी.डी. अग्रवाल का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनकी सेवा की सुवास इटारसी की फिजाओं में हमेशा महकती रहेगी। उनके द्वारा बोए गए सेवा के बीज आज भी हजारों दिलों में जीवित हैं।









