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राधा अष्टमी पर विशेष : माँ राधा हरती हैं , हर बाधा – *प्रसंग-वश-चंद्रकांत अग्रवाल*

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वास्तव में तो श्री कृष्ण का ही गौर वर्ण व स्त्री स्वरूप हैं राधाजी 

श्री कृष्ण मेरे आराध्य देव, मेरे ईष्ट हैं तो वैसे तो इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि श्री राधा को मैंने सदैव माँ के रूप में महसूस किया है, अपनी आत्मा में, अपने दिलोदिमाग में। गीता मनीषी श्री ज्ञानानंदजी ने बड़े स्नेह के साथ मुझे श्री कृष्ण कृपा काव्य दिया था 7 वर्ष पूर्व। उसी काव्य- ग्रंथ की ये पंक्तियां मेरे जेहन में सदैव जीवंत रहती हैं। जब भी कोई दुविघा, कष्ट या मानसिक संताप या अशांति होती है तो मेरा मन उन्हें गुनगुनाने लगता है, बड़ी दीनता, कातरता पर अधिकार से भी, जो आपके साथ शेयर करने की इच्छा हो रही है आज राधा अष्टमी (Radha Ashtami) के पुण्य प्रसंग पर –
राधा मम बाधा रहो, श्री कृष्ण करो कल्याण ,
युगल छबि वंदन करूं जय-जय राधेश्याम ।
राधे मेरी मात है, पिता मेरे घनश्याम,
तुम दोनों के चरणों में कोटि- कोटि प्रणाम ।

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ये पंक्तियां उस काव्य के चरमोत्कर्ष पर आती हैं। बिना पूरा काव्य पढ़े पाठकों को इन पंक्तियों की गहराई, उस गहराई का दिव्य अहसास महसूस नहीं होगा। मुझे स्वयं एक साल तक लगातार पढऩे के बाद ही धीरे-धीरे यह अहसास होना शुरू हुआ था। इन पंक्तियों को आपके साथ शेयर करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि मेरे लिए व मेरे जैसे श्री कृष्ण भक्त के लिए उसकी हर बाधा का समाधान राधा ही होती हैं क्योंकि वो माँ हैं। श्री कृष्ण तो पिता हैं। बस इसी मोड़ पर हम माँ होने से राधा के चरणों के ज्यादा करीब हो जाते हैं। श्री कृष्ण से भी ज्यादा। श्रीकृष्णचन्द्र शास्त्री ठाकुर जी व उनके सुपुत्र श्री इंद्रेशजी तो अपनी भागवत कथाओं में यह कहते हैं कि वास्तव में श्री राधाजी तो श्रीकृष्ण का ही गौर वर्ण व स्त्री स्वरूप हैं। रहस्य यह है भगवान ने अपने 3 भक्तों नंदजी वासुदेवजी व वृषभानुजी तीनों को उनके बार बार अनुनय करने पर स्वयं को पुत्र रूप में पाने का वरदान दे दिया था।राधा अष्टमी के पावन दिन आज हम सिर्फ अपनी मां राधे के दिव्य व अलौकिक स्वरूप को ही समझने की कौशिश करेंगे। कुछ दिन पूर्व मथुरा में रहने वालीं एक रचनाकार व पत्रकार उपमा ऋचा का थोड़ा सा साहित्य मुझे पढऩे को मिला। मैं नहीं जानता कि उपमा ऋृचा का लेखन उनकी श्री कृष्ण भक्ति की श्याही से लिखा गया है या धर्म-शास्त्रों में वर्णित श्री कृष्ण लीलाओं की साहित्यिक व्याख्या की है उन्होंने। पर मां राधा के संदर्भ में उनकी कुछ व्याख्याओं ने मेरी कलम को भी भक्ति की श्याही से चलने को जरूर मजबूर कर दिया और इसी के चलते आज के इस कॉलम में मां राधा के संदर्भ में की गई उनकी कुछ व्याख्याएं भी मैंने उनके शब्द पुष्पों के रूप में वैसी की वैसी आपके समक्ष रख दी हैं अपने भाव पुष्पों की आज की इस भाव माला में पिरोकर। पूर्व के कालमों में भी श्री कृष्ण संदर्भ में की गई कुछ व्याख्याएं कुछ अलग-अलग चिंतकों की रहीं हैं। अत: मेरे श्री कृष्ण व श्री राधा के संदर्भ की इन कडिय़ों में आप मेरी या अन्य लेखकों की विद्वता आंकने के चक्कर में न पडक़र, उन भावों को आत्मसांत करने का प्रयास करें जो श्री कृष्ण कृपा से आपको घर-बैठे मिल रहे हैं। मैं तो मात्र एक अकिंचन माध्यम मात्र हूँ। वास्तव में तो एक-एक शब्द मेरे श्री कृष्ण की कृपा का ही प्रसाद है वरना मेरी या किसी की भी इतनी औकात नहीं कि वह श्री कृष्ण या श्री राधा को परिभाषित कर सके या उनके स्वरूप की व्याख्या कर सके।

radha rani 1श्री दुर्गा सप्तशती ग्रंथ में माँ की जो आरती अंतिम पृष्ठों पर दी गई है, उसकी दो पंक्तियों पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा-
राम -कृष्ण तू सीता ब्रजरानी राधा।
तू वांच्छाकल्पद्रुम हारिणी सब बाधा।।

नवरात्र में मां की भक्ति साधना करने वाला हर जीव दुर्गा सप्तशती को परम सत्य मानता हैं और वहीं ग्रंथ आपको स्पष्ट कह तो रहा है कि भक्तों की सब बाधा हरती हैं ब्रजरानी राधा। हिरण्य, कपिला और सरस्वती का संगम। प्रभास क्षेत्र में दूर तक फैली अपूर्व शांति अश्वत्थ के सहारे मौन लेटा है कालपुरूष। हवा के साथ विशाल वृक्ष की डालियां जाने किस संवाद में खोई हैं। खोए हुए तो कृष्णा भी हैं। महाप्रयाण से पूर्व जीवन गाथा के पन्ने उलट-पलट रहे हैं। यमुना के जल में धीमे-धीमे घुल रहा है मोर पंख का रंग और इस जल के बीच सुंदर-सजल आंखें झिलमिलाती हैं, सवाल करती हैं- जा रहे हो कान्हा पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे?सवाल करती इन आंखों के साथ जाने कितनी आंखें याद हो आती है उन्हें । वसुदेव के साथ गोकुल भेजती देवकी की आंखें , ऊखल से बांधती यशाोदा की आखों , गोकुल में ग्वाल और गोपियों की आंखें, राजसभा में पुकारती द्रौपदी की आंखें , कुरूक्षेत्र में खड़ें अर्जुन की आंखें, प्रभास उत्सव के लिए बिदा करती रूक्मिणी की आंखें, यमुना की आंखें और यमुना की धार में विलीन होती परम प्रिया की आंखें। उन आंखों का जल कृष्ण की आंखों से बहने लगता है- तुमसे अलग होकर कहां जाऊंगा? छाया से काया कैसे अलग हो सकती है भला। जहां तुम हो, वहां मैं हूं। कृष्ण की एकमात्र शरण तुम ही तो हो। ऐसा परिहास न करो। मेरी शरण की तुम्हें क्या आवश्यकता कान्हा? कहां मैं एक साधारण-सी ग्वालिन और कहां तुम जैसा असाधारण पुरूष । तुम तो सारी सृष्टि को शरण देते हो। तुम मेरे शरणाार्थी कैसे हो सकते हो? परिहास नहीं सखी। जन्म लेते ही जिसे मां के आंचल को छोडक़र भवसागर की लहरों के बीच उतरना पड़ा, उसकी पीड़ा को तुम्हारे अतिरिक्त कौन हर सकता है? सारी सृष्टि को शरण देने की सामथ्र्य भले हो कृष्ण में, लेकिन कृष्ण को शरण देने की सामर्थ्य केवल तुम्हारे हदय में है। कौन है, जिसकी शरण का आकांक्षी है तीनों लोकों को तारने वाला असाधारण पुरूष? कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य रखने वाला ये हदय किसका है? कृष्ण को शरण देने वाला ये हदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी और फिर राधिका से कृष्ण की आराध्या हो गई। कृष्ण आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं या ये कृष्ण की आराधन करती है, इसीलिए राधिका कहलाती है। सच, बहुत कठिन है इसको परिभाषित करना, क्योंकि इसकी परिभाषा स्वयं कृष्ण हैं। खुद को असाधारण होने की सीमा तक साधारण बनाए रखने वाली ये किशोरी कृष्ण को अनायास ही मिली थी भागवत। भागवत, रस का गीत हैं। उस गीत का रस भी और कोई नहीं, यही आराधिका है।

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कृष्ण राधा से पूछते हैं राधे। भागवत में क्या भूमिका होगी तुम्हारी। राधा कहती है, मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए कान्हा, मैं तो बस तेरी छाया बनकर रहूंगी, तेरे पीछे-पीछे । छाया हां, कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि में है। गोवद्र्धन को धारण करने वाली तर्जनी का बल भी यही छाया है और यही छाया है लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की विषम यात्रा करने वाले कृष्ण की आत्मशक्ति । संपूर्ण ब्रज रंगा है कृष्ण रंग में, कदंब से लेकर कालिंदी अर्थात यमुना तक । सब ओर कृष्ण ही कृष्ण। लेकिन इस कृष्ण की आत्मा बसती है राधा में। वृंदावन की कुंज गलियां हों या मथुरा के घाट हर ओर, हर तरफ बस एक नाम, एक रट, राधा राधा राधा । बांके का बांकपन भी राधा है और योगेश्वर का ध्यान भी राधा है। कृष्ण के विराट को समेटने के लिए जिस राधा ने अपने हदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज ही उसका हदय बन गया । उसी राधा के बारे में भागवत में गोपियां पूछती है कि ये आराधिका आखिर है कौन? पहले तो कभी दिखी नहीं । कौन है वो मानिनी, जिसकी वेणी गूंथता है उनका श्याम, जिसके पैर दबाता है सलोना घनश्याम और हां जब वो रूठ जाती है तो मोर बनकर नृत्य भी करता है । गोपियां ही नहीं, कृष्ण भी पूछते हैं, बूझत श्याम, कौन तू गोरी । लेकिन राधा को बूझना इतना सरल नहीं और राधा को बूझ पाने से भी कठिन है- राधा के प्रेम की थाह बूझ पाना। इसी अथाह प्रेम की थाह पाने के लिए एक बार लीलाधर ने एक लीला रची। स्मृतियां कृष्ण को खींच ले गईं उत्सव के क्षणों में। हर ओर खुशी का सैलाब। हास-परिहास के बीच अचानक पीड़ा से छटपटाने लगे कृष्ण। ढोल , ढप, मंजीरे खामोश होकर मधुसूदन के मनोहारी मुख पर आती-जाती पीड़ा की रेखाओं को पढऩे लगे। चंदन का लेप शूलांतक वटी कोमलांगी स्पर्श सब व्यर्थ। वैद्य लज्जित से एक-दूसरे को निहार रहे थे। सत्या ने डबडबाती आंखों से पूछा तो उत्तर मिला, मेरे किसी परम प्रिय की चरण धूलि के लेप से ही मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है। कृष्ण की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है। सोलह हजार रानियां-पटरानियां करोड़ों भक्त, सखा, सहोदर सब प्राण होम करके भी अपने प्रिय की पीड़ा हरने को तैयार हैं, लेकिन प्रभु के मस्तक पर अपनी चरण धूलि लगाकर नर्क का भागी कोई नहीं बनना चाहता। सबने अपने पांव पीछे खींच लिए। राधा ने सुना तो नंगे पांव भागती चली आई। आंसुओं में चरण धूलि का लेप बनाकर लगा दिया कृष्ण के भाल पर। सब हतप्रभ थे। ये कैसी आराधिका है, इसे नर्क का भी भय नहीं। कृष्ण मुस्कुरा दिए, जिसने मुझमें ही तीनों लोक पा लिए हों, वो अन्यत्र किसी स्वर्ग की कामना करें भी तो क्यों ? सारे संसार को मुक्त करने वाला इसीलिए तो बंधा है इस आराधिका से। कृष्ण सबको मुक्त करते हैं, लेकिन राधा कभी मुक्त नहीं करती कृष्ण को। कृष्ण खुद भी कहां मुक्त होना चाहते हैं, ब्रज की इस गोरी के मोहपाश से। कभी-कभी रूक्मिणी छेड़ती हैं, क्या सचमुच बहुत सुंदर थी राधा? कृष्ण कहते हैं हां, बहुत सुंदर इतनी सुंदर कि उसके सामने मौन हो जाती हैं, सौंदर्य की समस्त परिभाषाएं। सूर्योपराग के समय कुरूक्षेत्र में सब उपस्थित हुए हैं । राधा भी आई है, नंद-यशोदा, गोप-ग्वाल, गोपियों के साथ। रूक्मिणी आश्चर्य में हैं । इस राधा के आते ही सारा परिवेश कैसे एकाएक नीला हो गया है। और कृष्ण का नीलवरण राधा के बसंत से मिलकर कैसे सावन-सावन हो उठा है। यों रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही हैं राधा का, लेकिन कै से बावले हुए जाते हैं कृष्ण। एक जलन-सी उठती है मन में और यही जलन रूक्मिणी सौंप देती हैं राधा को गर्म दूध में। कृष्ण का स्मरण कर एक सांस में पी जाती हंै राधा । सारा द्वेष, सारी जलन, सारी पीड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं झेल पाते। कृष्ण के पैर दबाते समय रूक्मिणी ने देखा कि श्री कृष्ण के पैरों में छाले हैं। मानों गर्म खौलते तेल से जल गए हों। ये क्या हुआ द्वारिकानाथ, ये फफोले कैसे? कृष्ण बोले, प्रिय राधा के हदय में बसता हूं मैं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया देखो वही मेरे तन से फूट पड़ी है। राधा को बड़भागिनी कहता है ये संसार लेकिन बड़भागी तो कृष्ण हैं, जिन्हें राधा जैसी गुरू मिली , सखी मिली, आराधिका मिली। जिसने उन्हें प्रेम, समर्पण और त्याग की वर्णाक्षरी सिखाई। तभी तो दानगढ़ में दान मांगते हैं कृष्ण । दानगढ़ जो बसा है सांकरी खोर और विलासगढ़ से विपरीत दिशा में। यहां राधा के चरणों में झुककर याचक हो जाते हैं कृष्ण । हे राधे बड़ी दानी है तू, सुना है तेरे बरसाने में जो भी आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। मुझे भी दान दे। प्रथम दान अपनी रूप माधुरी का। दूसरा दान तेरे अनंत रस और विलास का। दानगढ़ में कृष्ण को दिया गया, ये महादान ही पाथेय बन जाता है कृष्ण का, गैया चराने वाले गोपाल से द्वारिकाधीश बनने तक की लंबी यात्रा में। कुरूक्षेत्र से लेकर प्रभास तक राधा का यही प्रेम तो जीवन रसधार बनकर बहता रहा कृष्ण के भीतर। गीता का आधार भी यही प्रेम है और महारास का रस भी। वेणु हो या पांचजन्य, दोनों में एक ही स्वर फूटता है। एक ही पुकार उठती है, राधे तेरे नैना बिंधो री बान । कृष्ण से जुड़ी हर स्त्री राधा होना चाहती है। स्वयं कृष्ण भी राधा हो जाना चाहते हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि राधा का पर्याय केवल राधा ही हो सकती हैं। इसलिए तो कृष्ण बार बार आना चाहते हैं राधा की शरण में। आंखों में एक चमक सी कोंधती हैं। दूर कांलिंदी की लहरों पर एकांत पथिक सा नि:शब्द बढ़ रहा है। राधा की मन्नतों का एक दीया। कृष्ण मौन सुन रहे हैं, डुबती द्वारिका के अंधेरों से निकलती अर्थहीन आवाजें और उन आवाजों में घुलता एक सवाल,जा रहे हो कान्हा, पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे?यदि कृष्ण भक्त माँ राधा के इस अलौकिक अहसास को जरा सा भी महसूस कर सके तो मैं अपना आज का यह कालम लिखना सार्थक समझूंगा।

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चंद्रकांत अग्रवाल (Chandrakant Agrawal)

Contact : 9425668826

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