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करण अर्जुन का जादू: जब सलमान-शाहरुख ‘बच्चे’ बन गए

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  • अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर।
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कल्पना कीजिए एक ऐसी फिल्म की, जिसकी शूटिंग एक ऐसे गाँव में हो रही है जहाँ कोई होटल नहीं। जहाँ बॉलीवुड के दो सबसे बड़े सुपरस्टार, सलमान खान और शाहरुख खान, 15×15 फीट के छोटे-छोटे कमरों में रह रहे हैं। और जहाँ फिल्म के डायरेक्टर सुबह-सुबह उनके कमरे में घुसकर, बच्चों की तरह उन्हें जगाने और नहलाने के लिए मिन्नतें कर रहे हैं। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि 1995 की सदाबहार ब्लॉकबस्टर ‘करण अर्जुन’ की असली, अनकही और हैरान कर देने वाली बैकस्टोरी है।

राकेश रोशन ने सिर्फ 80-90 दिनों में इस ऐतिहासिक फिल्म को पूरा कर दिखाया, लेकिन इसकी शूटिंग की कहानी फिल्म के स्क्रीन पर दिखने वाले ‘पुनर्जन्म’ के जादू से कम रोमांचक नहीं है।

“सर, कमरा छोटा हो जाएगा!” – जब डायरेक्टर ने खुद बनवाए AC कमरे

फिल्म की शूटिंग जयपुर के पास एक दूरदराज के गाँव में होनी थी, जहाँ बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं थीं। पूरी यूनिट को एक आश्रम में ठहराया गया। लेकिन राकेश रोशन अपने सितारों और टीम के कंफर्ट के लिए कुछ खास करना चाहते थे। उन्होंने आश्रम प्रबंधन से कहा कि हर कमरे में एक अटैच्ड बाथरूम और एयर कंडीशनर लगवाया जाए।

आश्रम वालों ने चेताया – “सर, ऐसा करने से ये 15×15 फीट के कमरे और भी छोटे हो जाएंगे!” राकेश रोशन का जवाब था, “कोई बात नहीं। बस ये सुविधाएँ चाहिए।” और हैरानी की बात यह कि उन्होंने इन सभी निर्माण कार्यों का खर्च अपनी जेब से दिया। एक डायरेक्टर का अपनी टीम के प्रति ऐसा ख्याल आज के दौर में शायद ही सुनने को मिले। उनका मानना था कि आरामदायक टीम बेहतर काम करती है, और ‘करण अर्जुन’ इसका जीता-जागता सबूत बनी।

“अभी उठो और नहा लो!” – सुबह 6 बजे का ‘बचपन’ वापस लौट आया

शूटिंग के दौरान की गई एक और मजेदार कहानी सलमान और शाहरुख की ‘अजब गजब’ आदतों के बारे में है। राकेश रोशन ने खुलासा किया कि सुबह की शूट के लिए उन्हें खुद दोनों सितारों को जगाना पड़ता था। वह सुबह 6 बजे उनके कमरे में पहुँच जाते और फिर शुरू होती थी ‘माथापच्ची’।

सलमान खान उनकी आवाज सुनकर आँख तो खोल लेते, लेकिन फिर तकिए से अपना चेहरा ढक लेते। उनका कहना होता, “मैं रेडी हो रहा हूँ।” लेकिन राकेश रोशन अड़े रहते, “नहीं नहीं, अभी उठो और बाथरूम जाकर नहा-धो लो!” डायरेक्टर तब तक कमरे से बाहर नहीं निकलते थे, जब तक कि दोनों पूरी तरह तैयार नहीं हो जाते थे। यह दृश्य किसी पिता के अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने जैसा था, जहाँ डायरेक्टर ‘हॉस्टल वार्डन’ बन गए थे!

“लगता ही नहीं था कि एक्टिंग कर रहे हैं” – कैसे सितारे ‘किरदार’ बन गए

राकेश रोशन कहते हैं कि शूटिंग के दौरान ऐसा लगता ही नहीं था कि शाहरुख और सलमान एक्टिंग कर रहे हैं। शाहरुख खान पूरी तरह से ‘अर्जुन’ बन चुके थे – उनका व्यवहार, बोलचाल, हावभाव सब कुछ। वहीं, सलमान खान ‘करण’ की तरह ही बात करते थे। दोनों ने अपने-अपने किरदारों में इतनी गहराई से घुसपैठ कर ली थी कि वह उनकी आदत बन गए थे। यही वह जादू था जिसने ‘करण अर्जुन’ को एक यादगार फिल्म बना दिया। दर्शक स्क्रीन पर किरदार देखते थे, एक्टर नहीं।

और कुछ रोचक, प्रामाणिक तथ्य जो इस कहानी को और भी दिलचस्प बनाते हैं:

बजट का कमाल: आज के जमाने में यह सुनकर हैरानी होगी कि इस विशाल कैनवस वाली फिल्म का बजट महज 6 करोड़ रुपये था। और इसने बॉक्स ऑफिस पर 25.75 करोड़ रुपये का जबरदस्त कलेक्शन किया, जो उस समय के हिसाब से एक बड़ी सफलता थी।

संगीत की दीवानगी: फिल्म का संगीत (राजेश रोशन द्वारा) और गाने आज भी लोगों के जेहन में हैं। “ये बंधन तो..”, “जाती हूं मैं, जल्दी है क्या…”, “जय माँ काली…” जैसे गानों ने फिल्म की सफलता में बहुत बड़ा योगदान दिया। फ़िल्म के गीतों को इंदीवर ने लिखा था।

टाइमलैस थीम: ‘पुनर्जन्म’ और ‘भाग्य’ पर आधारित यह फिल्म आज भी प्रासंगिक है। भाईचारे, प्रेम, बदला और नियति के टकराव की यह कहानी हर दौर के दर्शकों को छूती है।

वैकल्पिक कास्ट का सवाल: एक इंटरव्यू में राकेश रोशन ने कहा था कि वे इस फिल्म का रीमेक या सीक्वल नहीं बनाएँगे। लेकिन अगर कल्पना करें कि आज की पीढ़ी के लिए इसे बनाना हो, तो वे ऋतिक रोशन और रणबीर कपूर को ‘करण’ और ‘अर्जुन’ के रोल में देखना चाहेंगे। यह सोचना ही दिलचस्प है कि आज के दौर में यह जोड़ी कैसी दिखती!

निष्कर्ष: सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक ‘परिवार’ की यात्रा थी ‘करण अर्जुन’

‘करण अर्जुन’ सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं थी। यह एक ऐसा अनुभव था जहाँ एक डायरेक्टर ने अपनी पूरी टीम को ‘परिवार’ की तरह संभाला। जहाँ सुविधाओं की कमी को टीम भावना और इनोवेशन से पूरा किया गया। जहाँ दो महानायकों ने अपने अहं को दरकिनार कर, बच्चों की तरह डायरेक्टर की बात मानी और किरदारों में पूरी तरह समा गए।

आज, जब फिल्में अक्सर पाँच-सितारा सुविधाओं और विशाल बजट में डूबी होती हैं, ‘करण अर्जुन’ की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि असली जादू बजट, सुविधाओं या एडवांस तकनीक से नहीं, बल्कि समर्पण, टीम वर्क और एक दूसरे के प्रति स्नेह से पैदा होता है। राकेश रोशन सुबह सलमान-शाहरुख को जगा रहे हैं, यह छवि इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक डायरेक्टर की देखभाल और सितारों का समर्पण मिलकर सिनेमा का इतिहास रच सकते हैं। 

फ़िल्म के खलनायक अमरीश पुरी जी और अपने समय की ख्यात अदाकारा राखी जी के बारे में अगले किसी लेख में चर्चा करूँगा। अन्यथा यह लेख बहुत लंबा हो जायेगा। 31 साल बाद भी यह फिल्म और इसकी पीछे की ये कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि महान कलाकृति के पीछे अक्सर मानवीय रिश्तों और छोटी-छोटी सच्चाईँ का बहुत बड़ा हाथ होता है। और शायद यही वजह है कि ‘करण अर्जुन’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि बॉलीवुड की एक प्यारी-सी, यादगार दास्तान बन गई है।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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