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अमजद खान के गब्बर सिंह बनने की अनसुनी कहानी

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  • अखिलेश शुक्ला
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“तुम्हें लगता है मैं ये रोल सही से निभा पाऊंगा?” – ये सवाल बार-बार अपनी पत्नी से पूछ रहे थे एक उभरते हुए अभिनेता, जिनका नाम था अमजद खान। पत्नी शैला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – “बिल्कुल। तुम बेहतरीन एक्टर हो, मैंने तुम्हारे सभी नाटक देखे हैं।” लेकिन अमजद की चिंता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वो बोले –”ये नाटक नहीं है, फिल्म है। एकदम अलग चीज़ है। और ये कोई छोटी फिल्म नहीं, बल्कि शोले जैसी विशालकाय फिल्म है।” उस समय उन्हें पता था कि इस रोल में असफल होने का मतलब सिर्फ एक किरदार खोना नहीं, बल्कि पूरे करियर को खतरे में डालना है।

कुरान से दुआ और बैंगलोर की उड़ान

शूटिंग के लिए उसी शाम उन्हें बैंगलोर रवाना होना था। बेचैनी इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने कुरान को अपने माथे से लगाकर आंख बंद कर प्रार्थना की। उनकी पत्नी के लिए यह नजारा असामान्य था, क्योंकि अमजद खान धार्मिक जरूर थे, लेकिन इस तरह दुआ करते उन्होंने उन्हें बहुत कम देखा था।

प्रार्थना के बाद उन्होंने धीरे से कहा –

“मुझे लगता है, मैं कर लूंगा।”

लेकिन किस्मत ने उसी दिन एक और परीक्षा रखी थी। मुंबई एयरपोर्ट से उनका प्लेन उड़ा, लेकिन बैंगलोर पहुंचा ही नहीं। हाइड्रोलिक फेल्योर के कारण विमान मुंबई के आसमान में ही चक्कर काटता रहा और फिर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।कुछ घंटे बाद पायलट ने घोषणा की कि तकनीकी खराबी ठीक हो गई है और विमान फिर से उड़ान भरने को तैयार है। लेकिन ज्यादातर यात्री डर के मारे वापस बैठने को तैयार नहीं हुए। केवल 4-5 लोगों ने साहस दिखाया – उनमें एक थे अमजद खान

रास्ते में उनके मन में सिर्फ एक ही बात थी –
“अगर फ्लाइट क्रैश हो गई, तो गब्बर का रोल फिर डैनी को मिल जाएगा।”

गब्बर सिंह – जो जिंदगी बदल दे

शोले को रिलीज हुए 50 साल हो चुके हैं, लेकिन जब भी अमजद खान का नाम आता है, तो सबसे पहले दिमाग में गूंजता है –
“अरे ओ सांभा…!”

गब्बर सिंह का किरदार उनके लिए वरदान भी था और कभी-कभी एक बोझ भी। उन्होंने दर्जनों यादगार रोल निभाए, लेकिन लोग उन्हें हमेशा गब्बर के रूप में ही पहचानते रहे।

एक खास इत्तेफ़ाक

अमजद खान का जन्मदिन 12 नवंबर को है। ठीक इसी दिन मशहूर शायर और स्क्रीनराइटर अख़्तर-उल-ईमान का भी जन्मदिन पड़ता है। खास बात ये कि अख़्तर-उल-ईमान, अमजद खान के ससुर थे। यानी ससुर-दामाद दोनों का जन्मदिन एक ही दिन!

गब्बर बनने की तैयारी

गब्बर के किरदार को गहराई से समझने के लिए अमजद खान ने “अभिशप्त चंबल” नाम की किताब खरीदी, जिसे जया बच्चन के पिता तरुण कुमार भादुड़ी ने लिखा था।
वो किताब में पसंद आने वाली लाइनों को अंडरलाइन करते और पत्नी से कहते –
“तुम भी ये लाइनें पढ़ो।”

आईने के सामने खड़े होकर पूरे दिन डायलॉग्स की प्रैक्टिस करते रहते।
जब वे छोटे थे, तब उनके घर पर कपड़े धोने वाले बाथरी की पत्नी का नाम शांति था। वह बाथरी पत्नी को हमेशा “अरे ओ शांति” कहकर बुलाता था। “अरे ओ शांति” – अमजद खान के दिमाग में ऐसा बैठा कि शोले में ये बदलकर “अरे ओ सांभा” बन गया।

गब्बर की तलाश

शोले की कास्टिंग के दौरान एक बड़ा झटका लगा – डैनी ने फिल्म छोड़ दी। शूटिंग में सिर्फ एक महीना बचा था और गब्बर जैसा दमदार किरदार खाली था। रमेश सिप्पी और जी.पी. सिप्पी ने कई नाम सोचे – रंजीत, प्रेम चोपड़ा, यहां तक कि प्रेमनाथ भी। लेकिन किसी में वो बात नहीं लगी। तभी सलीम खान ने अमजद खान का नाम सुझाया। अमजद के पिता जयंत एक मशहूर अभिनेता थे, लेकिन अमजद उस समय सिर्फ थिएटर में नाम कमा रहे थे।

किस्मत का मोड़

बांद्रा में एक दिन सलीम खान की अमजद से मुलाकात हुई। बातचीत के बाद सलीम ने कहा –
“मैं वादा नहीं कर सकता, लेकिन एक बड़ी फिल्म में शानदार रोल है। डायरेक्टर से मिलवा देता हूं।” उनकी रमेश सिप्पी से मुलाकात हुई, दाढ़ी बढ़ाने को कहा गया, और कुछ दिनों बाद स्क्रीनटेस्ट हुआ। अमजद ने दाढ़ी बढ़ा ली, दांत काले कर लिए, और डायलॉग्स के साथ अपना दम दिखा दिया।

सत्येन कप्पू, जो फिल्म में रामलाल का रोल कर रहे थे, से सलीम खान ने पूछा –
“क्या अमजद आपसे अच्छा एक्टर है?”
कप्पू जी ने कहा –
“हां, और उसकी सोच भी ताज़ा है।”

डबल खुशियां

20 सितंबर 1973 – अमजद खान को गब्बर सिंह के रोल के लिए फाइनल कर दिया गया। उसी दिन उनकी पत्नी शैला ने बेटे को जन्म दिया – शादाब खान

शोले का जादू

1975 में जब शोले रिलीज हुई, तो गब्बर सिंह का डर, आवाज़, और अंदाज़ लोगों के दिलों में उतर गया।
“कितने आदमी थे?”“ये हाथ हमको दे दे ठाकुर”, और “गब्बर के यहां से सिर्फ दो ही चीज़ मिलती हैं – मौत या डर” – ये डायलॉग आज भी सिनेमा इतिहास में अमर हैं।

गब्बर के बाद

अमजद खान ने बाद में कई बड़े रोल किए – मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस, याराना, और चमत्कार जैसी फिल्मों में। लेकिन गब्बर की छवि इतनी मजबूत थी कि लोग उन्हें उससे अलग देख ही नहीं पाए।

वो खुद कहते थे –
“गब्बर मेरे लिए वरदान भी है और श्राप भी।”

निष्कर्ष

अमजद खान की कहानी हमें सिखाती है कि

  • बड़ा मौका आने पर डर स्वाभाविक है
  • तैयारी और आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी हैं
  • और कभी-कभी किस्मत भी अपना जादू दिखाती है

गब्बर सिंह का किरदार सिर्फ एक फिल्मी डाकू नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा मील का पत्थर है जिसे अमजद खान की अदाकारी ने अमर बना दिया।

आखिलेश शुक्ला

सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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