इटारसी। राजा भभूत सिंह कोरकू, जो 19 वीं सदी में सतपुड़ा की गोद में बसे पगारा के शासक थे, स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय योद्धा और 1857 की क्रांति के प्रभावशाली सेनानी के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म पचमढ़ी जागीर के स्वामी ठाकुर अजीत सिंह के वंश की हर्राकोट राईखेड़ी शाखा में हुआ था। उनके दादा ठाकुर मोहन सिंह ने 1819-20 में नागपुर के पराक्रमी पेशवा अप्पा साहेब भोंसले का साथ अंग्रेजों के विरुद्ध दिया था। इसी क्रांतिकारी परंपरा से प्रेरित होकर राजा भभूत सिंह ने भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया।
1857 की सशस्त्र क्रांति में राजा भभूत सिंह ने तात्या टोपे के साथ मिलकर सतपुड़ा की वादियों में आजादी की मशाल जलायी। तात्या टोपे और भभूत सिंह ने पचमढ़ी में आठ दिन तक पड़ाव डालकर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन की योजना बनाई। हर्राकोट के जागीरदार के रूप में भभूत सिंह कोरकू का आदिवासी समाज पर विशेष प्रभाव था, जिसे उन्होंने क्रांति में संगठित किया।
राजा भभूत सिंह का रण कौशल शिवाजी महाराज की तरह बताया जाता है। वे पहाड़ी रास्तों और क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से भलीभांति परिचित थे, जबकि अंग्रेज इस इलाके से अनभिज्ञ थे। देनवा घाटी में अंग्रेजी मिलिट्री और मद्रास इन्फैंट्री को पराजित कर उन्होंने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया।
राजा भभूत सिंह के खिलाफ अंग्रेज अधिकारी एलियट की 1865 की सेटलमेंट रिपोर्ट में विस्तार से उल्लेख मिलता है। अंग्रेजों ने उन्हें पकडऩे के लिए मद्रास इन्फैंट्री को बुलाया था। 1860 तक उन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष जारी रखा, लेकिन अंतत: अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जबलपुर में कैद कर दिया, जहां उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई।
लोकमानस में आज भी उनकी वीरता के किस्से जीवंत हैं। कहा जाता है कि वे मधुमक्खियों का उपयोग भी अंग्रेजों से युद्ध में करते थे। पिपरिया-पचमढ़ी रोड पर स्थित ग्राम सिमारा को उनकी ड्योढ़ी माना जाता है। राजा भभूत सिंह को ‘नर्मदांचल का वीर सपूत’ और ‘सतपुड़ा का शिवाजी’ कहकर आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है। उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में प्रेरणा का स्त्रोत है।









