– चंद्रकांत अग्रवाल :
जीना कैसे जीना सिखलाती गीता।
मरना कैसा मरना बतलाती गीता।।दूजों से मिलने से पहले खुद से मिलो,
मुरझाने के पहले तुम इस तरह खिलो।
मुस्काओ मत रहने दो मन को रीता,
एक- एक दिन करके तो जीवन बीता।
जीना कैसे जीना……………….//1//
रहना सीखो पर्वत के जैसा अविचल,
सहना सीखो नदियों से उन सा निर्मल।
देना सीखो पेड़ों से फल मीठा – मीठा,
लेना सीखो बच्चों से वो जैसा जीता।
जीना कैसे जीना…………….//2//
जीवन क्या कठपुतली के नचने जैसा,
मरना क्या हम वस्त्र बदलते हैं वैसा।
पंच तत्व का तन तो माटी में मिलता,
नभ में आत्मा रूप कमल सा खिलता।
जीना कैसे जीना………………//3//
गीता कहती कभी किसी से मत डरना,
सांस-सांस में सत्य, प्रेम करुणा भरना
मरना क्या अंश उसी का उसमें मिलता
बीज तुम्हारे भीतर जैसा वैसा फलता।
जीना कैसे जीना…………….. //4//
चंद्रकांत अग्रवाल, इटारसी,
मो. न. 9425668826








