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हारमोनियम और एक सपने की शुरुआत: कैसे एक ‘सज़ा’ बनी नौशाद की ताकत

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  • अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर
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कल्पना कीजिए एक लड़के की, जिसके घर में संगीत को नफरत की नजर से देखा जाता है। जहां संगीतकारों का नाम लेना भी मना है। और अब उसी लड़के की कल्पना कीजिए, जो भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर का वह महान संगीतकार बनता है, जिसकी धुनें आज भी दिलों में गूंजती हैं। यह कहानी है नौशाद साहब की। लेकिन यह सिर्फ एक महान संगीतकार बनने की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे जुनून की कहानी है जो हर रुकावट को पार करके खिलता है। यह कहानी है उस पहले हारमोनियम की, जो एक ‘सज़ा’ के तौर पर मिला और जिसने एक अनजान सफर का पहला कदम बना दिया।

वो माहौल जहां संगीत था ‘मना’

नौशाद का जन्म 25 दिसंबर, 1919 को लखनऊ में एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके घर-खानदान और दूर-दराज के रिश्तेदारों में भी किसी का संगीत से कोई नाता नहीं था। बल्कि, उस वक्त के कई परिवारों की तरह, उनके यहाँ भी संगीत और संगीतकारों को नापसंद किया जाता था। संगीत और साज़-बाज़ का माहौल ‘अच्छे घरानों’ के लिए वर्जित माना जाता था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नौशाद पर यह ‘संगीत का भूत’ सवार कैसे हुआ? इस जवाब की तलाश हमें ले जाती है लखनऊ से थोड़ी दूर, बाराबंकी जिले के एक छोटे से कस्बे देवा शरीफ में।

देवा शरीफ की दरगाह: जहां जन्मा एक जुनून

नौशाद के मामा हर साल देवा शरीफ में हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर लगने वाले उर्स (धार्मिक सभा) में शामिल होने जाते थे। दस साल की उम्र में, पहली बार नौशाद को भी इस उर्स में जाने का मौका मिला। लखनऊ से बाराबंकी तक की ट्रेन की सफर और फिर वहाँ से देवा शरीफ तक की पैदल यात्रा… यह सब एक बच्चे के लिए एक बड़े साहसिक कार्य जैसा था।

लेकिन जो अनुभव उन्होंने वहाँ किया, वह साहसिक से कहीं ज्यादा जादुई था। दस दिनों तक चलने वाले इस उर्स में एक मेले जैसा माहौल होता। तरह-तरह की दुकानें, चहल-पहल और दूर-दूर से आए कलाकार। इन्हीं में एक था एक बांसुरी वाला। वह दिन भर बांसुरियाँ बेचता और रात को कुछ देर खुद भी बजाता। नौशाद ने जब पहली बार उसकी बांसुरी सुनी, तो कुछ ऐसा हुआ कि वह जैसे समय और स्थान को भूलकर वहीं बैठ गए। राग-रागिनियों का कोई ज्ञान न होने के बावजूद, उन धुनों ने उनके मन के तार झंकृत कर दिए। वह रोज़ उस बांसुरी वाले के पास बैठने लगे, इतने मग्न होकर सुनते कि खाने-पीने और सोने तक का ख्याल न रहता।

उर्स में आने वाले कव्वाल और ग़ज़ल गायक बाबा रशीद खाँ के गायन ने भी उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। तालियों की गड़गड़ाहट नौशाद के अंदर एक अजीब सी खुशी और रोमांच भर देती। देवा शरीफ का यह संगीतमय माहौल नौशाद के दिल-दिमाग पर इस कदर छा गया कि लखनऊ लौटकर भी वह उससे मुक्त नहीं हो पाए। पढ़ाई से मन उचट गया। बस एक इंतज़ार रह गया – अगले साल फिर से देवा शरीफ जाने का।

लखनऊ का रॉयल थिएटर: जहां सपने ने आकार लेना शुरू किया

लखनऊ लौटने के बाद नौशाद ने सिनेमा देखना शुरू कर दिया। उस ज़माने में चवन्नी की एक टिकट हुआ करती थी। अमीनाबाद स्थित रॉयल थिएटर (आज का मेहरा सिनेमा) उनकी पसंदीदा जगह बन गई। तब साइलेंट फिल्मों का दौर था। मजा कुछ और ही था – सामने पर्दे पर फिल्म चल रही और पास ही बैठी आर्केस्ट्रा पार्टी सीन के हिसाब से संगीत बजा रही। जब हीरो खलनायक से लड़ता, तो आर्केस्ट्रा का एक सदस्य खड़ा होकर भोंपू (मेगाफोन) पर चिल्लाता – “मार! मार ना, क्या देख रहा है!”

नौशाद किसी तरह चवन्नी जोड़कर थिएटर पहुँचते, लेकिन फिल्म से ज्यादा उनका ध्यान आर्केस्ट्रा पार्टी पर होता। वह उनके पास ही बैठकर अलग-अलग साज़ों को बजाते देखते रहते। उनका मन करता कि वह भी किसी साज़ पर अपनी उंगलियाँ चलाएं। पर यह इच्छा एक सपने जैसी थी। उन दिनों लखनऊ के लाटूश रोड पर उस्ताद गुरबत अली की एक दुकान थी, जहाँ तरह-तरह के संगीत वाद्य बेचे जाते थे। नौशाद का रोज़ का रास्ता वहाँ से होकर गुजरता और वह दुकान में सजे साज़ों को तरस भरी निगाहों से देखते रह जाते।

उस्ताद गुरबत अली: वह मोड़ जहां मिली दिशा

एक दिन, उस्ताद गुरबत अली ने इस नन्हे प्रशंसक से पूछ ही लिया – “बेटे, तुम रोज़ यहाँ क्यों खड़े रहते हो?” नौशाद की आँखों में संगीत के प्रति दीवानगी देखकर उस्ताद का दिल पसीज गया। उन्होंने न सिर्फ नौशाद की हौसलाअफजाई की, बल्कि उन्हें अपने घर पर हारमोनियम बजाना सिखाने की पेशकश भी कर दी। इस तरह उस्ताद गुरबत अली नौशाद के पहले गुरु बन गए।

नौशाद का जुनून देखकर एक दिन उन्होंने एक और बड़ी जिम्मेदारी दी – दुकान की चाबी। नौशाद सुबह-सुबह दुकान खोलते, सफाई करते और फिर उस्ताद के आने से पहले ही एक हारमोनियम उठाकर बैठ जाते। रॉयल थिएटर की आर्केस्ट्रा पार्टी के प्रमुख उस्ताद लुड्डन को हारमोनियम बजाते देखकर जो धुनें उनके दिल में बस गई थीं, उन्हें निकालने की कोशिश करते। यह गुप्त अभ्यास कई दिनों तक चलता रहा, जब तक कि एक दिन राज़ खुल नहीं गया।

वह ऐतिहासिक ‘सज़ा’: जो बनी सबसे बड़ी नेमत

एक सुबह, नौशाद उस्ताद लुड्डन की एक धुन पर इतने मग्न थे कि उन्हें पीछे खड़े उस्ताद गुरबत अली की खाँसी की आवाज़ तक नहीं सुनाई दी। जब उन्होंने मुड़कर देखा, तो सिहरन हो आई। उस्ताद गुरबत अली ने कहा, “तो इसलिए दुकान खोलते हो सुबह-सुबह? ताकि नए साज़ खराब कर दो?”

नौशाद घबरा गए, माफ़ी मांगने लगे। उस्ताद गंभीर मुद्रा में बोले, “सज़ा तो मिलेगी ही।” नौशाद के दिल की धड़कने और तेज हो गईं। तब उस्ताद ने पूछा, “ये बताओ, मेरे अलावा कहीं और से सीखते हो?” नौशाद ने रॉयल थिएटर और उस्ताद लुड्डन का किस्सा सुनाया। उस्ताद ने पूछा, “तुम्हारे पास घर पर हारमोनियम है?” “नहीं,” नौशाद ने सिर झुकाकर जवाब दिया।

तब उस्ताद गुरबत अली ने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा जो नौशाद के जीवन का मोड़ बन गया:

“नौशाद, तुम्हारी सज़ा ये है कि तुम इस हारमोनियम को मेरी तरफ से तोहफा समझकर अपने पास रखो। और इस पर खूब मेहनत से रियाज़ करो।”

यह कोई साधारण उपहार नहीं था। यह एक गुरु का उस शिष्य पर विश्वास था, जिसने अपनी लगन से सबका दिल जीत लिया था। यह एक ऐसी ‘सज़ा’ थी, जिसने एक सपने को पंख दे दिए।

नए रास्ते और नए गुरु: सफर आगे बढ़ता है

उस्ताद गुरबत अली ने उस्ताद लुड्डन को बुलवाया। नौशाद ने वह धुन बजाकर सुनाई, जो उन्होंने सिर्फ देख-सुनकर सीखी थी। उस्ताद लुड्डन हैरान रह गए। उस्ताद गुरबत अली ने कहा, “इस बच्चे को आपके हवाले करता हूँ। इसे दिल से सिखाना, ये बहुत नाम करेगा।” इसके बाद नौशाद को रॉयल थिएटर में आर्केस्ट्रा के साथ बराबर बैठने का मौका मिला। अब उन्हें टिकट की ज़रूरत नहीं थी। रात के शो में उन्हें भी हारमोनियम बजाने का मौका मिलने लगा।

उस्ताद गुरबत अली ने नौशाद को लखनऊ के मशहूर शास्त्रीय गायक उस्ताद बब्बन खाँ से भी मिलवाया, जिनसे उन्होंने गायकी सीखी। बाद में उस्ताद यूसुफ अली खाँ से उन्होंने सितार बजाना सीखा। हर नई सीख उनके संगीत के भंडार को समृद्ध कर रही थी। जब एक ड्रामा कंपनी में पुराने गीतों की नई धुनें बनाने का मौका मिला, तो नौशाद ने पाया कि उनकी असली प्रतिभा संगीत रचना (कंपोजिशन) में है। यहीं से वह सफर शुरू हुआ, जो आगे चलकर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में ‘नौशाद’ बन गया।

निष्कर्ष

नौशाद साहब की यह कहानी सिर्फ एक संगीतकार के उदय की कहानी नहीं है। यह हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों के आगे बाधाओं की दीवारें देखता है। एक ऐसा बच्चा, जिसके घर में संगीत वर्जित था, वह कैसे अपने जुनून की आवाज़ को दबा न सका। देवा शरीफ की बांसुरी ने उसके मन में स्वर भरे, रॉयल थिएटर के आर्केस्ट्रा ने उसे दिशा दिखाई, और उस्ताद गुरबत अली जैसे गुरु ने उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे पंख दिए।

उस हारमोनियम की ‘सज़ा’ असल में जीवन का सबसे बड़ा उपहार थी। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा जुनून कभी बोलता नहीं, बस अपना रास्ता खुद बना लेता है। गुरु-शिष्य की उस पवित्र परंपरा की यह एक मिसाल है, जहां एक गुरु ने सिर्फ हुनर ही नहीं, बल्कि विश्वास और अपना साज़ भी देकर एक अनमोल विरासत को जन्म दिया।

आज जब भी हम ‘मुगल-ए-आज़म’ का “प्यार किया तो डरना क्या” सुनते हैं, या ‘मदर इंडिया’ का “दुख भरे दिन बीते रे भैया”, तो उस लड़के की कहानी याद आनी चाहिए, जिसने लखनऊ की गलियों से निकलकर अपने संगीत से करोड़ों दिलों पर राज किया। यह सफर शुरू हुआ था एक हारमोनियम से, जो एक सज़ा थी, एक तोहफा था, और आखिरकार, एक महान विरासत की नींव बन गया। क्योंकि कभी-कभी, जीवन की सबसे बड़ी सजाएं ही, सबसे खूबसूरत शुरुआत बन जाती हैं।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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