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वह आवाज़ जिसने देश की धड़कन सुनी: देवकी नंदन पांडे

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अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

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अखिलेश शुक्ला

“यह आकाशवाणी है… अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए”

बस ये पंक्ति कहते ही करोड़ों हिंदुस्तानियों के घरों में सन्नाटा पसर जाता था। चाय की प्यालियाँ थम जाती थीं, बातचीत रुक जाती थी, और सबकी निगाहें उस प्लास्टिक के बक्से पर टिक जाती थीं, जिसमें से निकलने वाली आवाज़ सिर्फ आवाज़ नहीं थी – वह राष्ट्र की अंतरात्मा की गूंज थी।

जब आवाज़ में होती है दहाड़

भारतीय रेडियो के इतिहास में कई सुरीली, मधुर और कर्णप्रिय आवाज़ें आईं। लेकिन एक आवाज़ ऐसी थी जिसे ‘दहाड़’ कहा गया। गरज की तरह जो बिना डराए प्रभावित करती हो। देवकी नंदन पांडे की आवाज़ में वह अद्भुत ताकत थी जो सीधे दिल में उतरती थी, मगर दिमाग पर राज करती थी।

उनकी आवाज़ को सुनने का मतलब था – खबर को महसूस करना। जब वह बोलते थे, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे कोई हिमालय से उतरकर सीधे आपके कानों में बात कर रहा हो। गंभीर, वजनदार और अधिकारपूर्ण – ये तीन शब्द शायद उनके स्वर का पूरा वर्णन नहीं कर सकते।

जब घड़ियाँ ठहर जाती थीं

कहते हैं कि सुबह के आठ बजते ही पूरा देश थम जाता था। लोग अपनी घड़ियाँ उनकी आवाज़ से मिलाते थे। कल्पना कीजिए, उस दौर में जब न इंटरनेट था, न मोबाइल, न चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल – तब एक आवाज़ इतनी विश्वसनीय हो जाती है कि लोग अपने समय को उससे जोड़ लें।

उनका उच्चारण इतना सटीक और पाबंद था कि एक मात्रा की भी गलती की गुंजाइश नहीं थी। हिंदी और उर्दू के शब्द उनके मुख से ऐसे निकलते थे जैसे मोती किसी डोरे में पिरोए जा रहे हों। यही वह कला थी जिसने उन्होंने लखनऊ आकाशवाणी में काम करते हुए सीखी थी – उर्दू के उच्चारण की बारीकियाँ, शब्दों की नर्मी और सख्ती का फर्क, हर हर्फ़ को उसके हक के साथ बोलने की तमीज।

पहाड़ से निकली वो आवाज़

देवकी नंदन पांडे की जड़ें उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में थीं। अल्मोड़ा की पहाड़ियों में बचपन बीता। उनके पिता शिवदत्त पांडे एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह आधी रात को उठकर भी मरीजों का मुफ्त इलाज करने को तैयार रहते थे। यही संस्कार बचपन से ही देवकी नंदन में रचे-बसे थे – सेवा का भाव, संवेदनशीलता और मानवता के प्रति गहरी आस्था।

मजे की बात यह है कि देवकी नंदन अपने स्कूली दिनों में कोई प्रतिभाशाली छात्र नहीं थे। उन्हें पढ़ाई से विशेष लगाव नहीं था। लेकिन कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और इतिहास की किताबें – इनसे उनका गहरा रिश्ता था। घर में पिता की वजह से किताबों का अच्छा संग्रह था, जिसने उनके भीतर पढ़ने की आदत डाली।

वो अध्यापक जिसने पहचानी प्रतिभा

अक्सर जीवन में कोई एक व्यक्ति हमारी दिशा तय कर देता है। देवकी नंदन के जीवन में वह भूमिका निभाई अंग्रेजी के अध्यापक विशंभरदत्त भट्ट ने। कॉलेज के दिनों में उन्होंने देवकी नंदन की आवाज़ की विशिष्टता को पहचाना। उनके स्वर में वह पहाड़ी खनक थी जो अलग ही प्रभाव पैदा करती थी।

भट्ट जी ने न केवल उनकी प्रतिभा की सराहना की, बल्कि उन्हें रंगमंच की ओर प्रोत्साहित किया। अल्मोड़ा में दर्जनों नाटकों में हिस्सा लेकर देवकी नंदन ने अपने आत्मविश्वास को मजबूत किया। उन दिनों अल्मोड़ा में मुश्किल से दो रेडियो थे – एक स्कूल के अध्यापक जोशी के घर, दूसरा व्यापारी शाहजी के घर। और युवा देवकी नंदन दूसरे विश्वयुद्ध के समाचार सुनने के लिए सारा काम छोड़कर वहाँ दौड़े चले जाते थे।

जर्मनी रेडियो के उद्घोषक लॉर्ड हो और डॉ. फ़ारूक़ी की आवाज़ें उनके मन में बस गई थीं। वह रोमांच जो उनके भीतर समाचार सुनकर उठता था, शायद उसी ने उनके भविष्य की नींव रखी।

इलाहाबाद से लखनऊ तक का सफर

बी.ए. करने के लिए देवकी नंदन इलाहाबाद आए, जो उस समय शिक्षा का बड़ा केंद्र था। लेकिन जीवन ने करवट बदली जब पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आई। पहले लखनऊ में परिवहन विभाग में नौकरी की, फिर 1943 में आकाशवाणी लखनऊ में बतौर कैजुअल एनाउंसर और ड्रामा आर्टिस्ट काम शुरू किया।

यहीं उन्होंने उर्दू भाषा की बारीकियाँ सीखीं। यही वह अनुभव था जो आगे चलकर उनके समाचार वाचन को अद्वितीय बनाने वाला था। उनका मानना था कि हिंदी राष्ट्रभाषा है, लेकिन वाचिक परंपरा में उर्दू के शब्दों से परहेज नहीं करना चाहिए। इसी संतुलन ने उनकी आवाज़ को वह विशिष्टता दी जो आज तक किसी और में नहीं दिखी।

1948: वह ऐतिहासिक चयन

देश आज़ाद हुआ। आकाशवाणी पर समाचार बुलेटिनों का सिलसिला शुरू हुआ। दिल्ली स्टेशन के लिए अच्छी आवाज़ों की तलाश शुरू हुई। देवकी नंदन पांडे ने भी अपनी आवाज़ डिस्क पर रिकॉर्ड करके भेजी।

फरवरी 1948 में समाचार वाचकों का चयन हुआ। तीन हज़ार उम्मीदवार। और उस सूची में सबसे ऊपर था नाम – देवकी नंदन पांडे।

21 मार्च 1948 को उन्होंने अपना पहला समाचार बुलेटिन पढ़ा। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश की हर बड़ी खबर – गांधी जी की हत्या हो या नेहरू जी का निधन, सरदार पटेल का निधन हो या लियाकत अली खान की मृत्यु – हर संवेदनशील खबर देश ने सबसे पहले उन्हीं की आवाज़ में सुनी।

एक किस्सा जो बयां करता है उनकी विश्वसनीयता

1980 में संजय गांधी का आकस्मिक निधन हुआ। देवकी नंदन पांडे उस समय रिटायर हो चुके थे। लेकिन प्रशासन ने विशेष रूप से उन्हें घर से बुलवाया। क्यों? क्योंकि उनका मानना था कि इतनी बड़ी और दुखद खबर अगर पांडे जी की गंभीर आवाज़ में नहीं जाएगी, तो शायद लोगों को यकीन ही नहीं होगा।

सोचिए, एक उद्घोषक की विश्वसनीयता का यह स्तर – कि लोगों को किसी खबर पर यकीन करने के लिए आपकी आवाज़ की जरूरत हो। यह सिर्फ लोकप्रियता नहीं थी, यह संस्था बन जाना था।

वो आवाज़ जो थर्रा देती थी रेडियो सेट

जब देवकी नंदन पांडे समाचार पढ़ते थे, तो कभी-कभी ऐसा लगता था कि रेडियो सेट उनके स्वर से थर्राने लगा है। उनमें खबर के साथ एकाकार हो जाने की अद्भुत क्षमता थी। अगर खबर दुखद होती, तो उनकी आवाज़ में वह गीलापन आ जाता जो सुनने वाले की आंखें नम कर देता। अगर खबर गर्व की होती, तो उनके स्वर में वह ऊर्जा आ जाती जो रोमांचित कर देती।

उनके समाचार सुनने का मतलब सिर्फ जानकारी हासिल करना नहीं था – वह एक अनुभव था, एक एहसास था।

देशप्रेम जो अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों से बड़ा था

अमेरिका की प्रसिद्ध संस्था ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ ने उन्हें भारी-भरकम प्रस्ताव दिया। आकर्षक वेतन, अंतरराष्ट्रीय पहचान, बेहतर जीवन – सब कुछ। लेकिन देवकी नंदन पांडे ने विनम्रता से मना कर दिया।

उनके लिए देश की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं था। वह भारत सरकार की आधिकारिक आवाज़ थे और इससे उन्हें जो संतोष मिलता था, वह किसी भी प्रस्ताव से नहीं मिल सकता था।

जब इंदिरा गांधी ने कहा – “हमारी न्यूज़ वॉइस”

एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के कलाकारों को अपने निवास पर आमंत्रित किया। जब देवकी नंदन पांडे से उनका परिचय करवाया गया, तो वह मुस्कुराईं और बोलीं – “अच्छा, तो आप हैं हमारे देश की न्यूज़ वॉइस।”

इससे बड़ी पहचान और क्या हो सकती है कि देश की प्रधानमंत्री आपको राष्ट्र की आवाज़ कहे। सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल तो उनका नाम सुनते ही गले लग गए थे।

अगली पीढ़ी के लिए संदेश

नए उद्घोषकों को देवकी नंदन पांडे का संदेश आज भी प्रासंगिक है। वह कहते थे – “जो कुछ करो, श्रद्धा, ईमानदारी और मेहनत से करो। हमेशा चाक-चौबंद रहो, समसामयिक घटनाक्रम की जानकारी रखो। जितना सुनोगे और पढ़ोगे, उतना अच्छा बोल सकोगे। किसी की नकल मत करो। कोई गलती बताए तो सिर झुकाकर स्वीकार करो।”

यह सिर्फ उद्घोषणा की कला नहीं थी, यह जीवन जीने की कला थी।

विविध प्रतिभाओं के धनी

देवकी नंदन पांडे सिर्फ उद्घोषक नहीं थे। उन्होंने फिल्मों में भी काम किया, लेकिन बिना मेहनताने की अपेक्षा के। जब पैसे नहीं मिले, तो कोई दुख नहीं हुआ। उनका लेखन पक्ष भी मजबूत था – उन्होंने कुमाऊं पर “कुमाऊं: अ परस्पेक्टिव” नामक पुस्तक लिखी।

वह सच्चे अर्थों में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे – अभिनेता, लेखक, उद्घोषक, और सबसे बढ़कर एक संवेदनशील इंसान।

अंतिम दिन और अमर विरासत

सेवानिवृत्ति के बाद भी वह विशेष अवसरों पर बुलाए जाते रहे। 2001 में वह इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जिंदा है – उन लाखों लोगों के दिलों में जिन्होंने उन्हें सुना, उन करोड़ों लोगों की यादों में जिनके बचपन की सुबह उनकी आवाज़ से होती थी।

निष्कर्ष

आज के दौर में जब हर तरफ शोर है – टीवी चैनलों पर चीख-पुकार, सोशल मीडिया पर बेलगाम बहस, एफएम रेडियो पर बतियाने की होड़ – तब देवकी नंदन पांडे की याद हमें सिखाती है कि सच्चा प्रभाव शोर से नहीं, ठहराव से आता है। सच्ची ताकत चीखने में नहीं, वजनदार चुप्पी में होती है।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि अपने काम के प्रति समर्पण ही पहचान दिलाता है। उनका देशप्रेम बताता है कि मिट्टी की खुशबू और अपनी जड़ों से जुड़ाव ही सच्ची सफलता है।

आज हमारे पास हज़ारों चैनल हैं, अनगिनत आवाज़ें हैं, लेकिन क्या कोई ऐसी आवाज़ है जिसे सुनने के लिए हम अपनी घड़ियाँ मिलाएँ? क्या कोई ऐसा उद्घोषक है जिसकी विश्वसनीयता पर हम बिना शर्त भरोसा करें? शायद नहीं।

देवकी नंदन पांडे सिर्फ एक नाम नहीं, एक युग थे – जब आवाज़ें सिर्फ आवाज़ें नहीं होती थीं, वे भरोसा होती थीं। वे देश की धड़कन होती थीं। वे इतिहास की गवाह होती थीं। और शायद इसीलिए आज भी, जब कभी रेडियो पर कोई गंभीर आवाज़ सुनाई देती है, हम अनायास ही ठिठक जाते हैं। एक पल के लिए लगता है – कहीं यह वही आवाज़ तो नहीं?

वह आवाज़ जिसने कहा था – “यह आकाशवाणी है… अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए।”

वह आवाज़ जो अब आकाश में ही बसती है। हमेशा के लिए।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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