- लेखक : पंकज पटेरिया

जैसे-जैसे मौसम के मिजाज में गर्मी बढ़ रही है, ठीक वैसे ही प्रदेश में सियासत का तवा भी गर्माने लगा है। इन दिनों गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा मंत्रिमंडल में बदलाव की है। इसे लेकर खासी खींचतान जारी है और शक्ति प्रदर्शन का दौर भी चल रहा है, जिसे जनता जनार्दन बखूबी देख रही है।
हाल ही में गुजरी होली के खुमार के बीच, जिन माननीयों के चेहरे (सियासी तौर पर) थोड़े बिगड़ गए थे, वे अब उन्हें धो-पोंछकर और नया ‘मेकअप’ कर फिर से मुख्यधारा में आने की जुगत लगा रहे हैं। किसी शायर की वे पंक्तियां यहां सटीक बैठती हैं कि— ‘आसमां में हुक्म किसका चल रहा है इन दिनों, जानते हैं हम पर बताने के नहीं।
हकीकत यही है कि सत्ता के इस खेल में जिनकी स्लेट बिल्कुल साफ-सुथरी है, वे भी वक्त की नजाकत को देख कर ही कदम उठाने में भरोसा रख रहे हैं। जिनकी चर्चा इन दिनों सबसे ज्यादा गर्म है, वे सियासत के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। उनके अनुभव की झोली में न हमेशा आम खट्टे आए और न ही अंगूर।
बहरहाल, सियासी आसमान में दावों और कयासों के कई गुब्बारे तैरते दिख रहे हैं। दो अलग मिजाज के इन शेरों के जरिए मौजूदा स्थिति को समझा जा सकता है। एक ओर जहां अपनों की अहमियत है— ‘बिन तेरे हर खुशी अधूरी है, सोच कि खुशी कितनी जरूरी है’—वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनकी नजरें दूर तक भविष्य की राह देख रही हैं। उनके लिए यह शेर मौजूं लगता है— ‘सजाते रहे खुशियों की महफिल, बस सबको खुश रखना मुझे आता है।’
फिलहाल गर्मी अपना ताव दिखाने लगी है और आम के पेड़ों पर ‘मौर’ (बौर) भी आने लगे हैं। यदि कोई तेज हवा या अंधड़ नहीं चला और ये मौर सुरक्षित रहे, तो उम्मीद है कि इस बार बहुत बढिय़ा आम आएंगे। सियासत हो या प्रकृति, सब कुछ उम्मीदों पर टिका है।
नर्मदे हर। वंदे मातरम।









