बहुरंग : किताबें करती हैं बातें …

बहुरंग : किताबें करती हैं बातें …

– विनोद कुशवाहा

‘ बहुरंग ‘ दिनों – दिन लोकप्रिय हो रहा है। होशंगाबाद अंचल के वरिष्ठ पत्रकार, कवि, लेखक, साहित्यिक पत्रिका ‘ शब्द ध्वज ‘ के सम्पादक पंकज पटेरिया कहते हैं ‘ मुझे हर रविवार को ” बहुरंग ” की प्रतीक्षा रहती है’। खैर, पिछले हफ्ते ” राजपाल एंड संस ” द्वारा दिल्ली में ‘ मेरे लेखक मेरे सवाल ‘ के अंतर्गत सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मृदुला गर्ग से ” लाइव बातचीत ” का प्रसारण किया गया जिसमें देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार, बुद्धिजीवी, जागरूक पाठक सम्मिलित् हुये। इस चर्चा में मृदुला जी ने युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए जो कहा उसका आशय यही था कि ‘ वे जितना ज्यादा पढ़ेंगे उतना अधिक लिख पायेंगे’। नई पीढ़ी के सामने सवाल ये है कि वे पढ़ें क्या और ये किताबें मिलेंगीं कहां से क्योंकि इस दौर में पुस्तकें बहुत महंगी हो गई हैं। वाचनालय बन्द होने की कगार पर हैं। हालांकि मैंने तो उपन्यास से लेकर लगभग हर विषय की पुस्तकें पढ़ी हैं। ये शौक मुझे अपनी आदरणीय माँ से विरासत में मिला था। उनके समय माँ के पसंदीदा लेखकों में गुरुदत्त, विमल मित्र, शिवानी,ओशो आदि प्रमुख थे। माँ ने गांधी वाचनालय, कक्कू जी वाचनालय, महिला वाचनालय, साथ ही एम जी एम कॉलेज की लाइब्रेरी की अधिकांश पुस्तकें पढ़ डाली थीं। इनमें से सिर्फ विमल मित्र, ओशो मुझे बेहद पसंद थे। पहले उनकी मैंने करीब – करीब सभी किताबें पढ़ी हैं। विमल दा की कथा कहने की शैली तो मुझे हमेशा आकर्षित करती रही है। अफसोस कि मैं उनसे मिल नहीं पाया। बाद में मैंने शरत् साहित्य पढ़ा। उन्होंने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। विशेषकर उनके स्त्री पात्रों ने चाहे फिर वो चन्द्रमुखी हो या राजलक्ष्मी जहां तक मेरी राय है युवा लेखकों को इन्हें जरूर पढ़ना चाहिए –

विपिन जोशी –
1. साधना के स्वर
2. छंदों की छांह
3. विपिन जोशी शेष

शरतचंद्र –
1- श्रीकांत
2- आखिरी परिचय
3- चरित्रहीन
4 – अंतिम प्रश्न .

आवारा मसीहा – विष्णु प्रभाकर .
( शरतचंद्र की जीवनी )

विमल मित्र के उपन्यास .
आर के नारायण के उपन्यास .

नागमणि – अमृता प्रीतम .

शेखर एक जीवनी – 1 – अज्ञेय .
2 नदी के द्वीप – अज्ञेय .

नौकर की कमीज – विनोद कुमार शुक्ल .

मृत्युंजय – शिवाजी सामंत ( कर्ण पर आधारित )

जहं जहं चरन परे गौतम के – तिक न्यात हन्ह .( बुद्ध पर आधारित )

कथा संग्रह : जयशंकर
1 – चेम्बर म्यूजिक .
2 – बारिश , ईश्वर और मृत्यु .

इनके अतिरिक्त कुंअरनारायण सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, अरुण कमल से भी काफी कुछ सीखने को मिलेगा। हालांकि नेट पर सब उपलब्ध है पर किताबें पढ़ने का और उसमें पेंसिल से अंडरलाइन करने का मजा ही कुछ और है। किताबों से आने वाली खुश्बू ही मदहोश करने की क्षमता रखती है।

पुराने जमाने की फिल्मों में जब नायक नायिका अनायास ही टकराते थे तो पहले नायिका के हाथ से छूटकर किताबें गिरती थीं । फिर नायक के साथ किताबें उठाते हुये नज़रें दो – चार होती थीं। तब जाकर कहीं प्यार की शुरुआत् होती थी। मतलब किताबें ही माध्यम बनती थीं । इधर मोहल्ले – पड़ोस में प्रेमी – प्रेमिकाओं के बीच भी किताबें ही एक – दूसरे को पत्र पहुंचाने में मददगार साबित होती थीं। … और उसमें रख कर पहुंचाए गए गुलाबों के फूल की खुश्बू तो आज भी किताबों के गुलाबी पन्नों में मौजूद है । अहमद फराज भी तो यही कहते हैं –

अब के हम बिछड़े तो शायद ख्वाबों में मिलें
जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ,
ढूंढिए उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
मुमकिन है ये खजाने खराबों में मिलें ।

तो क्या पढ़ना है ये तो पता चल ही जाता है या मालूम करना पड़ता है। अन्यथा अंधेरे में भटकना लाज़िमी है। मगर पुस्तकों तक पाठक पहुंचें तो पहुंचें कैसे। या किताबें पाठकों तक कैसे पहुंचें। मेरे शहर के प्लेटफार्म नंबर 2 पर सर्वोदय साहित्य भंडार है जहां नए पुराने, देशी – विदेशी सभी साहित्यकारों का स्तरीय साहित्य उपलब्ध है परंतु इसकी कीमतें आम पाठकों की पहुंच से बाहर है। अब तो इटारसी में साहित्यिक पत्रिकायें भी उपलब्ध नहीं हैं। पहले कभी इनकी मात्र पांच – पांच प्रतियां आती थीं अब उनका आना भी बन्द हो गया है। हंस , नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पहल, संवेद, संवेग, कथादेश, कथाक्रम, साहित्य अमृत कुछ भी उपलब्ध नहीं रहता। हां सरस सलिल जरूर आसानी से मिल जाती है। खैर।अपनी – अपनी रुचि है। जबकि इटारसी जैसे शहर में साहित्यिक अभिरुचि के पाठक बड़ी संख्या में हैं। यथा सर्वश्री शिखरचंद जैन , विद्यावती दुबे , दिनेश द्विवेदी , के एस उप्पल , संजीव श्रीवास्तव मामू आदि। इनमें से कुछ के पास तो अपनी स्वयं की लाईब्रेरी ही काफी समृद्ध है।
उपरोक्त लाइव प्रोग्राम में बहुचर्चित कथाकार मृदुला गर्ग ने एक पाठक के सवाल के जवाब में कहा था – ‘ साहित्यिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि किताबें पाठकों तक पहुंचें । अन्यथा लेखक का लिखना निरर्थक है। ‘
लगभग दो वर्ष पूर्व मैंने अपने पास की सैंकड़ों किताबें देकर लाइब्रेरी की शुरुआत करनी चाही थी लेकिन शहर में सहयोग के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। परिणामस्वरूप मैंने रुचि के अनुसार अपनी पुस्तकें सुपात्र पाठकों में बांट दीं।
तो कृपया आप ही किताबों तक पहुंचिये । कुंआ प्यासे के पास कभी नहीं जाता । आप ही किताबों से रुबरु होईये । उनसे दो – चार होईये । उनसे बातें कीजिये। किताबें बातें भी करती हैं क्योंकि किताबें बहुत अच्छी दोस्त होती हैं । वे नर्क को भी स्वर्ग में बदल सकती हैं । किसी विचारक ने कहा ही था – ‘ मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत् करूंगा क्योंकि वे उसे स्वर्ग में बदल देंगीं ‘। तो उठिए। किताबों तक पहुंचने के लिए अपनी शुभ यात्रा आज से ही आरंभ कीजिये।

लेखक मूलतः कहानीकार है परन्तु विभिन्न विधाओं में भी दखल है।
Contact : 96445 43026

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COMMENTS

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    मिलिन्द रोंघे 2 months

    आपकी यह ज्यादा प्रासंगिक है कि किताबें नेट पर उपलब्ध है परन्तु उनको पढकर उस पर अंडर लाईन करने का मजा ज्यादा है ।

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