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श्रद्धांजलि : राहत इंदौरी अल्लाह को प्यारे हो गए…

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– डाॅ0 वरुण कुमार :
कोरोना के संकट ने एक अच्छे शायर को हमारे बीच से उठा लिया है। बीमारी किसी पर रहम नहीं करती और मौत का पंजा तो घोर प्रजातांत्रिक है। ऊंचे-नीचे, बड़े-छोटे, गरीब-अमीर, प्रतिभावान-प्रतिभाहीन, सब पर एक-सा विचार करता है।

राहत इंदौरी (Rahat Indori) नामचीन शायर हैं। उनकी गजलें पठनीय है, उनमें चुटीलापन है, तत्काल अर्थ-बोध कराकर चमत्कृत करने की क्षमता है, शेश्र में कुछ नया कहने की जो चुनौती होती है उसका लगभग हमेशा निर्वाह है। इस कारण मुशायरों में उनकी खासी मांग थी। अंदाजे वयां का अनूठापन अजूबापन भी उनकी शायरी में ही नहीं, मंच पर अदायगी में भी थी, जो श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन करती थी और उनमें अगली पंक्ति सुनने की बेताबी जगाती थी। उनके प्रशंसक लाखों में हैं। हिंदी कवियों के लिए ऐसी लोकप्रियता तो सपना ही है। उन्होंने सुंदर फिल्मी गीत लिखे। उनके गाने और अशआर लोगों की जुबान पर चढ़े हैं। उनकी शायरी का दायरा बड़ा है, उनमें जिंदगी और जहान की बहुरंगी तस्वीरें है। खासकर अपने देश में मुसलमानों के दर्द, आक्रोश, असुरक्षा बोध और दावों की प्रबल अभिव्यक्ति है। मुनव्वर राणा में अगर विभाजन से रिश्ते नाते, पास-पड़ोस, बचपन आदि के खोने का दर्द और अफसोस है तो राहत इंदौरी में इसी जमीन के होने का दावा, भारत में शानदार मुस्लिम अतीत का गर्व, वर्तमान स्थितियों पर क्रोध, व्यंग्य, ललकार, हास्य आदि का स्वर प्रमुख है। इन विषयों पर लिखी उनकी गजलों ने सबसे अधिक लोकप्रियता पाईं, उनकी पहचान बनीं। उनकी एक प्रसिद्ध गजल नीचे प्रस्तुत है। आप उसमें उनके आक्रोश और लगभग धमकी के स्तर को छूते आत्मविश्वास को देखें….

अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है
बस्तियां छोड़ के जाने को कहा जाता है
पत्तियां रोज गिरा जाती हैं जहरीली हवा
और हमें पेड़ लगाने को कहा जाता है।
घरों के धंसते हुए मंजरों में रखे हैं
बहुत से लोग यहां मकबरों में रखे हैं
हमारे सर की फटी टोपियों पे तंज न कर
हमारे ताज अजायबघरों में रखे हैं।
उठा शमशीर, दिखा अपना हुनर, क्या लेगा
यह रही जान, यह गर्दन है, यह सिर, क्या लेगा
सिर्फ एक शेर उड़ा देगा परखचे तेरे
तू समझता है कि शायर है, क्या कर लेगा….

‘उनकी ललकार भरी पंक्तियां किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है’ ने सोशल मीडिया पर काफी धूम मचाईं। इसका शेर अभी हाल में देश में हुए CAA-NRC विरोध के आंदोलन का प्रतीक बन गया था।

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।।

इसका जवाब भी किसी ने उतनी ही तुर्शी-तेजी से दिया था।

मेरे पुरखों न सींचा है लहू के कतरे से
बहुत बाँटाए मगर अब बसए खैरात थोड़ी है।।
अरे ओ देश की संपत्ति जलानेवालो
नहीं शामिल तुम्हारा खून इस मिट्टी में
ये तुम्हारे बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।।

मैं खोज रहा था कहीं इन चीजों को लेकर उनमें अपने अंदर भी झाँकने की कोशिश है नहीं, ज्यादातर मुसलमान लेखकों में नहीं है। अगर दर्द है, असुरक्षा है, दूसरों के द्वारा उपेक्षा या घृणा मिल रही है तो इसके कुछ कारण अपने अंदर भी होंगे। लेकिन आत्मविश्लेषण की फितरत उनके बंद समाज में बहुत कम है। उनके लिए दोषी हमेशा बाहरी हैं, राहत साहब का आक्रोश भी बाहरी के प्रति ही है। वैसे यह जरूरी नहीं कि कवि कारणों के पड़ताल की भी ओर जाए, वह पीड़ा या दर्द को सच्ची अभिव्यक्ति दे दे, यह भी कविता के लिए बहुत है। लेकिन कविता में यह कमी भले न हो, इसकी एक वाजिब उम्मीद कवि से होती ही है। निदा फाजली इस कमी से ऊपर उठते हैं, वे बड़े शायर हैं। कई बड़े शायर ऐसा करते हैं। राहत इंदौरी को हिंदी जगत ने बहुत प्यार दिया है। काश, ऐसा प्यार उर्दू जगत भी हिंदी कवियों को देता। लेकिन हमारे समाज में बहुत सारी चीजें इकतरफा हैं। राहत साहब की बुलंद शायरी हमेशा याद की जाएगी। कोई कवि पूरी मानवता न सही, उसकी भाषा जिन तक पहुँचती है उस पूरे वर्ग के लिए सहेजने और प्यार देने लायक तो होता ही है। मरहूम डॉक्टर राहत साहब को विनम्र श्रद्धांजलि। मेरे कवि मित्र सुशील साहिल के शब्दों में अल्लाह उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला जगह बक्शे। आमीन।

VARUN KUMAR

लेखक डाॅ0 वरुण कुमार (Dr. Varun Kumar)
लेखक रेल मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली में निदेशक  (Director in Ministry of Railways, Government of India, New Delhi)के पद पर कार्यरत। निर्मल वर्मा के कथा शिल्प पर शोध। आलोचना के भाषाई पक्षों पर विशेष अध्ययन। आलोचनात्मक एवं रचनात्मक कृतियां देश के विभिन्न पत्र.पत्रिकाओं में प्रकाशित। आकाशवाणी व दूरदर्शन से विभिन्न कार्यक्रमों का प्रसारण।
मोबाइल नंबर 78279 35451

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