रोहित नागे, इटारसी
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गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य गरबा, जो मूल रूप से मां जगदंबे की आराधना का माध्यम है, अब मध्य प्रदेश में तेजी से अपना व्यावसायिक रंग लेता जा रहा है। विशेष रूप से मीडिया घरानों द्वारा आयोजित किए जाने वाले इन बड़े आयोजनों में, गरबा अपनी सांस्कृतिक आत्मा खोकर महज एक मनोरंजन का साधन बनकर रह गया है, जहां आज की अधिकांश युवा पीढ़ी बड़े शहरों के क्लबों की तर्ज पर मस्ती में झूमने जाती है।
सांस्कृतिक मर्म से भटकता युवा रुझान
आयोजकों के व्यावसायिक हित और युवा पीढ़ी का भटकाव इस पूरे उत्सव पर सवाल खड़े कर रहा है। गरबा हमारी संस्कृति का हिस्सा है और इसे बढ़ावा मिलना चाहिए, लेकिन जिस तरह से यह आध्यात्मिकता से दूर हो रहा है, वह चिंतनीय है।
इस वर्ष के आयोजनों में टीन-एज बच्चों को जिस तरह पाश्चात्य संस्कृति को भी पीछे छोडऩे वाले परिधानों में देखा गया, वह सांस्कृतिक मर्यादा के क्षरण का स्पष्ट संकेत है। यह केवल कुछ दर्जन बच्चों की बात नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामाजिक प्रवृत्ति है, जहां देखकर सीखने वाले हमारे समाज में अच्छे बच्चे भी इन बिगड़ैल परंपराओं की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
- गरबा संस्कृति से माता के पंडाल सूने हो रहे हैं, नवदुर्गा उत्सव बेनूर हो रहा है। मां के दर्शनों और आरती से ज्यादा हमारी युवा पीढ़ी गरबा में जाकर मनोरंजन करने में विश्वास करने लगी है। इसे वापस आध्यात्म की तरफ मोडऩा होगा और यह सम्मिलित प्रयासों से ही संभव है।
- आयोजकों, साथ ही बच्चों के माता-पिता, को यह सुनिश्चित करना होगा कि गरबा की सांस्कृतिक आत्मा न मरे। आयोजकों को अगले वर्ष से ही गरबा के वास्तविक स्वरूप और परिधानों की अनिवार्यता को लेकर कठोर नियम तय करने होंगे।
अव्यवस्था और प्रशासनिक बोझ
व्यावसायिकता से प्रेरित इन विशाल आयोजनों का एक बड़ा दुष्परिणाम शहर की व्यवस्थाओं पर पडऩे वाला बोझ है। गरबा स्थलों के आसपास सड़कों पर जाम लगना और प्रशासन का घंटों यातायात व्यवस्था संभालने में अपनी पूरी ताकत झोंक देना अब आम हो गया है। शहर की अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं में कमी करके प्रशासन को एक ही जगह पूरा पुलिस बल और अमला लगाना पड़ता है। पुलिस बल की कमी के बावजूद मनोबल की कमी न होने से वे सब संभाल लेते हैं, लेकिन यह स्थिति उन्हें मजबूर करती है। विशेष रूप से, जब ये आयोजन मीडिया हाउस द्वारा किए जाते हैं, तो प्रशासन बिना कोई अतिरिक्त शुल्क वसूले व्यवस्था बनाने में जुटा रहता है, जबकि सारा व्यावसायिक लाभ मीडिया संस्थानों की जेब में जाता है।
सवाल यह है, क्या इन व्यावसायिक आयोजनों से होने वाली आय में से व्यवस्था के नाम पर प्रशासन को शुल्क देने की परंपरा शुरू नहीं होनी चाहिए?
सुधार की ओर बढऩे की जरूरत
गरबा का आयोजन निश्चित रूप से होना चाहिए, लेकिन इस वर्ष देखी गई कमियों, अव्यवस्थाओं और गलत परंपराओं को ध्यान में रखते हुए अगले वर्ष सुधार किए जाने चाहिए।
निजी सुझाव के तौर पर यह विचारणीय है कि बड़े, केंद्रीयकृत आयोजनों के बजाय, गरबा को मां के पंडालों के आसपास छोटे-छोटे रूपों में आयोजित किया जाए। इससे
- ट्रैफिक व्यवस्था नहीं बिगड़ेगी।
- प्रशासन को अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।
- बच्चे परिवार की नजर में रहेंगे और मनमानी करने से बचेंगे।
गरबा को वापस उसके आध्यात्मिक मूल की ओर ले जाने के लिए आयोजकों, माता-पिता और प्रशासन को सम्मिलित प्रयास करने होंगे, ताकि यह उत्सव महज एक क्लबिंग या मनोरंजन का साधन बनकर न रह जाए।









