- पंकज पटेरिया, संपादक- शब्द ध्वज, कवि एवं लेखक, भोपाल

नर्मदापुरम/भोपाल। पुण्य सलिला मां नर्मदा के अनन्य भक्त, प्रख्यात शिक्षाविद् और सौम्यता की प्रतिमूर्ति डॉ. आरपी सीठा अब हमारे बीच नहीं रहे। कुछ दिनों की अस्वस्थता के पश्चात 14 जनवरी की शाम उन्होंने अपने निज निवास नर्मदापुरम में अंतिम सांस ली। उनके निधन से शिक्षा और साहित्य जगत में एक अपूरणीय क्षति हुई है।
व्यक्तित्व : सरलता और शुचिता का संगम
डॉ. आरपी सीठा केवल एक सेवानिवृत्त प्राचार्य ही नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे देवपुरुष थे जिन्होंने अपने सेवाकाल में अनेक महत्वपूर्ण शासकीय पदों को सुशोभित किया। गौर वर्ण, उन्नत ललाट और तेजोदीप्त आभा मंडल वाले डॉ. सीठा की पहचान विभाग में एक अत्यंत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की रही। घोर विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होना और अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहना उनकी विशिष्ट कार्यशैली थी।
साहित्य के संरक्षक और मार्गदर्शक
वे एक प्रखर समालोचक और अध्ययनशील चिंतक थे। प्रदेश के सैकड़ों लेखकों और कवियों के लिए वे एक गुरु और अभिभावक के समान थे। उन्होंने अनगिनत साहित्यकारों की कृतियों की भूमिका लिखी। शब्द ध्वज के संपादक और प्रख्यात कवि पंकज पटेरिया ने उन्हें याद करते हुए कहा, वे भौतिक रूप से भले ही विदा हो गए हों, लेकिन लेखकों की कृतियों की अक्षर देह में वे सदा जीवित रहेंगे। उनका असीम स्नेह मुझे प्राप्त होता रहा, वे मुझे सदैव लेखन के प्रति प्रोत्साहित करते थे।
अंतिम समय तक रहा सृजन का मोह
डॉ. सीठा साहित्य के प्रति इतने समर्पित थे कि अपने अंतिम दिनों से पूर्व भी वे नए लेखकों को शोध और मौलिक लेखन के लिए प्रेरित करते रहते थे। उनके जाने से नर्मदापुरम का एक सांस्कृतिक स्तंभ ढह गया है। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार और शोक-विह्वल प्रशंसकों की एक लंबी कतार छोड़ गए हैं। समाज के प्रति उनके योगदान और उनके आदर्शों को याद करते हुए समूचा नगर और साहित्य जगत उन्हें अश्रुपूरित विदाई दे रहा है।








