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Editorial : सूची जारी होने पर तूफान आएगा, इसलिए हो रही देरी…

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हाल-ए-निकाय चुनाव : रोहित नागे –
इटारसी। इतिहास गवाह है, चुनाव कोई भी हो, प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद एक विरोध की सुनामी अवश्य आती है। जब पार्टी बड़ी हों तो यह अवश्यंभावी है। कमोवेश यही स्थिति इन दिनों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में बनती दिखाई दे रही है। हमेशा की तरह से इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए वर्षों से इस्तेमाल की जा रही सूची जारी करने में देरी रूपी ढाल का प्रयोग अब भी किया जा रहा है, बीते कई वर्षों से इस समस्या का कोई हल नहीं निकाला जा सका है।
भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने से खबर यह है कि नगर पालिका चुनाव में टिकट वितरण की सूची फाइनल हो गयी है, एक बहुचर्चित सीट बहुप्रतीक्षित हो गयी है। सूत्र यहां तक बताते हैं कि देर रात तक चली कवायद के बाद आखिरकार सूची को अंतिम रूप देने में सहमति नहीं बनी है। हो सकता है कि जिस सीट पर सहमति नहीं बनी, उसे छोड़कर शेष नाम जारी कर दिये जाएं, ऐसे हालात रहे तो आज या कल में सूची जारी होने की पूरी-पूरी संभावना है। सूची के नाम भले ही बाहर नहीं आये हों, लेकिन जो फौरी जानकारी आयी है, उससेकुछ बड़ा होने की आशंका जाहिर की जा रही है। हालांकि पार्टी लाइन के आगे नतमस्तक होकर सबकुछ जल्द ही शांत भी हो जाएगा। जिस एक सीट पर सहमति नहीं बन पा रही है, उसका फैसला भोपाल स्तर पर भी जा सकता है।
एक भाजपायी का कहना है कि भाजपा केवल जीतने के लिए चुनाव लड़ती है, चेहरा नया हो, या पुराना, जो जीतने वाला उम्मीदवार होगा, वही चुनाव में जाएगा। यह भी अंदर की खबर है कि टिकट वितरण में इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि पार्टी अधिक से अधिक सीटें जीते, इसके लिए भावनात्मक जुड़ाव को परे रखकर सख्ती से कई पुराने चेहरों को टिकट नहीं देने की बात निकलकर आ रही है। यानी इस बार नये चेहरे सामने आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। समन्वय की राजनीति के चलते, कुछ नाम समझौते के तहत भी शामिल हो सकते हैं।

पदाधिकारियों को न हो सकती है

भाजपायी सूत्रों का कहना है कि पार्टी लाइन के अनुसार पदाधिकारियों को उम्मीदवार नहीं बनाया जाना है, हालांकि पुरानी इटारसी नगर मंडल से अध्यक्ष मयंक महतो और इटारसी नगर मंडल से जोगिन्दर सिंह भी टिकट की दावेदारी में हैं, संभवत: सूची जारी होने पर खुलासा हो जाएगा कि यह सच है, या जीतने वाला प्रत्याशी चाहे वह पदाधिकारी हो, उसे मौका दिया जाएगा। भाजपायी इटारसी में पार्टी की परिषद और उनका अध्यक्ष बनने के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं, दावा किया जा रहा है कि नेतृत्व जिन हाथों में है, वहां हार जैसे शब्दों से परहेज है। कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा के अलावा भी अन्य दल या निर्दलीय कुछ पार्षद ऐसे रहेंगे जो पार्टी की परिषद बनाने में अपनी भूमिका निभाएंगे, क्योंकि चुनाव की पूरी बिसात ही ऐसी बिछाई गयी है।
बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा, कि सूची जारी होने के बाद उनकी भूमिका कितना बगावती होती है, जिनको टिकट नहीं मिलेगी? या फिर वे टिकट की दावेदारी तक प्रयास करने के बाद पार्टी के सिम्बाल के साथ होंगे या फिर न्यूट्रल होकर घर बैठ जाएंगे? यह सब सूची जारी होने के बाद ही पता चल सकेगा। तब तक इंतजार।

कांग्रेस में अभी सबकुछ शांत

कांग्रेस में फिलहाल असंतोष जैसी बातें खुलकर नहीं हैं, लेकिन असंतोष का लावा वहां भी धधक रहा है, सूची जारी होने के बाद यदि यह ज्वालामुखी बनकर बहने लगे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अभी पार्टी से प्रत्याशी नामांकन जमा कर रहे हैं तो कई अपने-अपने वार्डों में काम पर लगकर जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। जो लोग सरकार के कामकाज से नाराज हैं, उनको अपनी तरफ करने का काम तेजी से चल रहा है। कांग्रेस में जो शांति दिखाई दे रही है, वह तूफान से पहले की शांति है, माना जा रहा है कि यहां भी विस्फोट की प्रबल संभावना है। स्थानीय कांग्रेसियों का कहना है कि टिकट का फैसला उच्च स्तर पर होना है, यदि स्थानीय स्तर पर निर्णय छोड़ा जाता तो इतनी देर भी नहीं होती और असंतोष भी कम से कम होता, क्योंकि लोकल के नेताओं को स्थानीय गणित पता रहता है, एक पदाधिकारी का तो यह भी कहना है कि हम स्वयं चाहेंगे कि टिकट जीतने वाले को ही मिले, क्योंकि पांच वर्ष हमारी सरकार रहे, यह हम भी चाहते हैं। सूची जारी होने में देरी होगी यह तय है। माना जा रहा है कि सूची 17 या 18 में ही जारी होगी। फिलहाल इंतजार करना ही लाजमी है, हालांकि आलाकमान ने इच्छुक लोगों को नामांकन फार्म भरने के लिए हरी झंडी दे दी है। सूची जारी होने के बाद कुछ दिनों तक मान मनौव्वल का दौर चलेगा, यह भी तय है। मनाने और दबाने के भी प्रयास होंगे जो हम आगे आने वाले दिनों में देखेंगे।

सोशल मीडिया पर…

भय, निराशा, चुनौती जैसे कोटेशन नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करना शुरु कर दिये हैं। व्हाट्सएप और फेसबुक की राजनीति, पोल खोल रही है कि भीतरखाने सबकुछ ठीक नहीं है। जब संचार के साधन कम होते थे तब प्रत्याशी के पास चुनाव प्रचार के तरीके भी सीमित होते थे। किंतु अब चुनावों में व्हाट्सएप और फेसबुक पर भी प्रचार का नया ट्रेंड चल पड़ा है। बात इतनी ही नहीं है, इन प्लेटफार्म पर एक दूसरे को नीचा भी दिखाया जा रहा है। तर्क वितर्क अभी किए जा रहे हैं। यहां बात किसी एक पार्टी की नहीं, बात भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टी की भी है।
इन प्लेटफार्म पर प्रत्याशी अपनी पिछली चुनावों की फोटो शेयर करके अपनी बात लोगों तक पहुंचा रहा है। अभी जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों में से किसी की भी प्रत्याशियों की फाइनल लिस्ट नहीं आई है, तब भी पार्टी का सदस्य जो कि निकाय चुनाव में अपना भाग आजमाना चाह रहा है अपने आप को सिद्ध करने में तुला हुआ है। फेसबुक पर एक दूसरे को कोटेशन और शायरी में कमेंट करना आम बात हो रही है। यहां पर एक दूसरे को बातों ही बातों में नीचे भी दिखाया जा रहा है। बात दोनों पार्टी की इसमें यह नहीं कह सकते कि सिर्फ एक ही पार्टी में इस तरह की बातें हो रही है। बीजेपी का एक व्यक्ति बीजेपी के ही दूसरे व्यक्ति को और कांग्रेस का एक व्यक्ति कांग्रेस के दूसरे व्यक्ति को इस तरह से नीचा दिखाते हुए लिखना आम बात हो गई है। इस तरह के प्रचार प्रसार से पार्टी के अंदर मची हुई उथल पुथल को आम आदमी आसानी से समझ पा रहा है और वो बाहर से बैठ कर मजे ले रहा है। तो क्या अब मतदाता मान लें कि फेसबुक और व्हाट्सएप पर अपनी 50-60 फोटो डाल कर, एक दूसरे को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देकर ही, ऐसे महानुभव निकाय चुनाव जीतने का माद्दा रखते हैं?

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