इटारसी। जब महफि़ल में कहकहे गूंजते हैं, तो अक्सर लोग कलाकार के पीछे छिपे उस दार्शनिक को नहीं देख पाते जो समाज की विसंगतियों को हास्य में पिरोता है। मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन उदय दाहिया जब इटारसी की सरजमीं पर कदम रखते हैं, तो यादें ताजा हो जाती हैं और बातें निकलती हैं— दिल से।
हाल ही में उन्होंने अपनी कला, एआई और बदलते हास्य पर बेबाकी से चर्चा की। पेश हैं इस बातचीत के कुछ मुख्य अंश।
मिट्टी से उपजा कंटेंट : आम आदमी ही मेरा किरदार है
उदय दाहिया का मानना है कि सबसे बड़ा कंटेंट राइटर हमारा समाज है। उन्होंने कहा न कोई स्क्रिप्ट है महंगी, न कोई खास साजि़श है, ये सब्जी, दूध और आटा-चक्की वालों की नुमाइश है। वे अपने किरदारों के लिए किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जाते, बल्कि दैनिक जीवन के असली पात्रों से रूबरू होते हैं। वे कहते हैं कि हास्य में ‘लोकल तड़का’ ज़रूरी है। जो जादू उनके ‘बुंदेली टेम्पो वाले’ आइटम में इटारसी में है, उसे कोलकाता में नहीं दोहराया जा सकता।
शालीनता का धर्म : बिना गालियों के भी महफि़ल जमती है
आज के दौर में स्टैंडअप कॉमेडी में बढ़ते अपशब्दों पर उन्होंने तंज कसा। उनका मानना है कि मनोरंजन ‘शॉक वैल्यू’ का मोहताज नहीं होना चाहिए। साफ-सुथरी और शालीन कॉमेडी ही वह पुल है जो हर उम्र के दर्शकों को जोड़ता है।
एआई और मशीनी जज़्बात : सब फैसले होते नहीं सिक्का उछाल के…।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बढ़ते मशीनी प्रभाव पर उन्होंने गहरी चिंता जताते हुए एक शेर पढ़ा
सब फैसले होते नहीं सिक्का उछाल के,
ये दिल का मामला है जऱा देखभाल के।
उदय कहते हैं कि आज ‘जज़्बात’ पीछे छूट गए हैं और ‘भागना’ आगे निकल गया है। सोशल मीडिया के इस दौर में वह तड़प और रूहानी जज़्बात मशीनों के पीछे कहीं खो गए हैं।
इटारसी : जहां ‘हुनर’ को ‘पहचान’ मिली
उनके करियर का टर्निंग पॉइंट इटारसी ही रहा। साल 2003 में ‘निनाद ग्रुप’ ने जब उन्हें किशोर कुमार के नाम पर सम्मानित किया, तब उन्हें यकीन हुआ कि उनकी मंजिल हंसाना ही है। वे महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को अपना आदर्श मानते हैं और कहते हैं कि हास्य तलाशने के लिए खुद का गंभीर होना बहुत जरूरी है।
उदय दाहिया का ‘जीवन मंत्र’
स्वस्थ तन, सुखी मन : ‘जि़ंदगी को दिन का सिर्फ एक घंटा (योग या कसरत) दीजिए, वह आपके बाकी 23 घंटे स्वस्थ रखेगी।
चलते-चलते एक बात : उदय दाहिया ने साबित किया है कि हंसाना महज एक फन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। वे आज के दौर के वह फनकार हैं जो लतीफों के बीच कड़वी सच्चाई को चाशनी में डुबोकर परोसने का हुनर जानते हैं।










