- अखिलेश शुक्ला

कल्पना कीजिए। घर का कोई कोना। एक रेडियो सेट। उसमें से एक मख़मली, गहरी, दोस्ताना आवाज़ गूंजती है – “जी हां बहनो और भाइयो, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी…” और पल भर में पूरा माहौल बदल जाता है। यह सिर्फ एक परिचय नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों भारतीयों के लिए एक विश्वास, एक अपनापन, संगीत के जादू की शुरुआत थी। यह आवाज़ थी अमीन सयानी की, जिन्होंने रेडियो को घर-घर का एक जीवंत सदस्य बना दिया।
उनके संबंध में वैसे तो अनेक लेख लिखे गए हैं। उनका जीवन संघर्ष, लोकप्रियता और उतार चढ़ाव। आपने उन लेखों को पढ़ा भी होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शानदार सफर एक ऐसे मोड़ से शुरू हुआ था, जहां सिर्फ 25 रुपये का सवाल था?
गायक बनने का सपना और एक टूटा हुआ सुर
अमीन सयानी का जन्म 21 दिसंबर, 1932 को मुंबई में एक बहुभाषी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत की ओर था। उनका सपना था कि वह एक पार्श्व गायक बनें और लोगों के दिलों पर अपनी आवाज़ के जादू से राज करें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। युवावस्था में आते-आते उनकी आवाज़ फट गई। वह सपना, जो उन्होंने संजोया था, अधूरा रह गया। एक पल के लिए सोचिए, अगर उनकी आवाज़ नहीं फटती, तो क्या दुनिया अमीन सयानी को ‘बिनाका गीतमाला’ के रूप में जान पाती? मित्रों, जीवन की यही विडंबना और सुंदरता है – एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है।
वो ऐतिहासिक मौका: सिर्फ 25 रुपये और एक अमर विरासत की शुरुआत
साल 1952 की बात है। एक विज्ञापन कंपनी रेडियो सीलोन (अब श्रीलंका) के लिए हिंदी फिल्मी गानों की एक श्रृंखला तैयार करना चाहती थी। यह काम बेहद मामूली बजट में था और इसके लिए मेहनताना था महज 25 रुपये! यह रकम इतनी कम थी कि कोई भी जाना-माना लेखक या संगीतकार इस काम को करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
तभी अमीन सयानी के बड़े भाई, हामिद सयानी, जो खुद एक मशहूर रेडियो कलाकार थे, आगे आए। उन्होंने जोर देकर अपने छोटे भाई अमीन को इस काम के लिए राजी किया। उस वक्त न तो अमीन को पता था और न ही हामिद सयानी को कि यह 25 रुपये का छोटा सा काम, भारत के संगीत इतिहास की सबसे बड़ी और लोकप्रिय विरासत की नींव रखने वाला है। इस तरह ‘बिनाका गीतमाला’ का जन्म हुआ। ‘बिनाका’ नाम एक टूथपेस्ट ब्रांड से लिया गया था, जिसके लिए वह विज्ञापन कंपनी काम करती थी।
“बहनो और भाइयो…” वो जादुई अंदाज़ जो सबका दोस्त बन गया
अमीन सयानी की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी आवाज़ और बोलने का अनोखा, दोस्ताना अंदाज। रेडियो एक ऐसा माध्यम है जहां सिर्फ आवाज़ ही काम करती है। अमीन सयानी ने इस आवाज़ को इतना जीवंत और अपनापन भरा बना दिया कि ऐसा लगता था मानो कोई अपना ही व्यक्ति आपसे बात कर रहा हो।
“जी हां बहनो और भाइयो, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी…” यह वाक्य सिर्फ एक परिचय नहीं था, बल्कि एक भरोसे की शुरुआत थी। श्रोता उन्हें अपना दोस्त मानने लगे थे।
भाषा का जादूगर: मां की दी हुई विरासत
अमीन सयानी की हिंदी इतनी साफ़, सटीक और मधुर थी कि लगता था जैसे शब्दों में संगीत भरा हो। यह क्षमता उन्हें एकदम से नहीं मिल गई थी। इसके पीछे था एक बहुभाषी परिवार और उनकी मां का प्रभाव।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, “मेरी भाषा कई मरहलों, कई तूफ़ानों और पथरीली राहों से होकर यहां तक पहुँची है।” उनकी मां गांधीजी की शिष्या थीं और उन्होंने ही अमीन को हिंदी, उर्दू और गुजराती की बारीकियां सिखाईं। उनकी मां एक पत्रिका निकालती थीं, जिसका काम अमीन को दिया गया। इस काम ने उनकी भाषा को और निखारा, पॉलिश किया। वह मानते थे कि अच्छी हिंदी बोलने के लिए थोड़ी-सी उर्दू का ज्ञान जरूरी है। यही मिश्रण उनकी आवाज़ में एक अलग ही मिठास और परिष्कार भर देता था।
वो मशहूर किस्सा: जब अमिताभ बच्चन को मिली थी निराशा
अमीन सयानी की आवाज़ की दुनिया में एक और किस्सा बहुत मशहूर है, और वह है बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन से जुड़ा हुआ। अमिताभ बच्चन अक्सर यह किस्सा सुनाते हैं कि कैसे उनकी आवाज़ को रेडियो पर रिजेक्ट कर दिया गया था।
बाद में अमीन सयानी ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि उन्हें ठीक से याद नहीं था। उनकी सेक्रेटरी ने उन्हें बताया कि एक ‘अमिताभ बच्चन’ नाम का शख्स मिलने आया था। अमीन सयानी ने उनसे अपॉइंटमेंट लेकर आने के लिए कहा। जब अमिताभ बिना अपॉइंटमेंट के दोबारा आए, तो व्यस्तता के कारण अमीन सयानी उनसे न मिल सके। उस वक्त किसे पता था कि जिस युवक को समय नहीं मिल पाया, वह आगे चलकर भारतीय सिनेमा का ‘सदी का महानायक’ बनेगा। यह किस्सा इतिहास का एक मजेदार और संयोगपूर्ण हिस्सा बन गया।
एक युग का अंत: विरासत ही है जो अमर रहती है
अमीन सयानी का ‘बिनाका गीतमाला’ लगभग 42 सालों तक चला। उन्होंने अपने पूरे करियर में 54,000 से भी ज्यादा रेडियो कार्यक्रम किए। यह एक ऐसा कीर्तिमान है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। समय बदला, टेलीविजन और इंटरनेट का दौर आया और रेडियो की लोकप्रियता घटने लगी। आखिरकार ‘सिबाका गीतमाला’ (1986 के बाद नाम बदला गया) भी बंद हो गया, लेकिन अमीन सयानी की आवाज़ का जादू कभी कम नहीं हुआ।
उनकी नकल करने की कितने ही लोगों ने कोशिश की, लेकिन वह अंदाज, वह अपनापा, वह गर्मजोशी कोई दूसरा नहीं ला सका। अमीन सयानी सिर्फ एक रेडियो उद्घोषक नहीं थे, वह हम सबके दोस्त थे। वह हमारे परिवार के जश्न, हमारे दुख, हमारे प्यार के गानों की कड़ी थे।
निष्कर्ष
अमीन सयानी की आवाज़ हमारे दिलों और इतिहास के पन्नों में हमेशा जिंदा रहेगी। वह एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और एक अनोखे अंदाज से खुद को सभी का चहेता बना लिया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सपने टूट सकते हैं, लेकिन नई राहें हमेशा बनती हैं। जरूरत है बस हिम्मत रखने और अपनी खूबियों को पहचानने की।
आज भी अगर कहीं से वह मखमली आवाज़ गूंज उठे – “जी हां बहनो और भाइयो…” – तो लगेगा कि वह दोस्त अब भी हमारे बीच है, बस थोड़ी देर के लिए चुप हो गया है। अमीन सयानी ने साबित कर दिया कि असली पहचान दिखावे की नहीं, बल्कि दिल से जुड़ने की होती है।
अखिलेश शुक्ला
सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक , ब्लॉगर








