लेखक : पंकज पटेरिया, पत्रकार एवं साहित्यकार

राजधानी की सडक़ों पर इन दिनों एक अजीब सी खामोशी और डर का माहौल है। यह डर किसी अपराधी का नहीं, बल्कि उन मशीनों और कुल्हाडिय़ों का है जो विकास के नाम पर हमारे आदि देव यानी पेड़ों की बलि लेने पर आमादा हैं।
हाल ही में हमने देखा कि कैसे सडक़ों को 10-लेन बनाने की होड़ में करीब 7 हजार से ज्यादा पेड़ों को काटने की निर्मम तैयारी की गई। यह वही राजधानी है जहां कुछ समय पूर्व माननीयों के बंगलों के लिए 29 हजार पेड़ों की बलि दी जा रही थी, तब जनता के चिपको आंदोलन और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की संवेदनशीलता ने उन पेड़ों को जीवनदान दिया था। लेकिन अफसोस, इतिहास खुद को फिर दोहरा रहा है।
विरोध नहीं, यह अस्तित्व की लड़ाई है
जब एनएचएआइ ने नगर निगम को 4 करोड़ 80 लाख रुपए दिए, तो मानों पेड़ों के कत्लेआम का लाइसेंस मिल गया। डेढ़ हजार पेड़ धराशायी भी हो गए। लेकिन धिक्कार है उस विकास पर जो हरियाली को उजाडक़र कांक्रीट के जंगल खड़ा करे। स्थानीय रहवासियों ने जो साहस दिखाया, वह काबिले तारीफ है। पेड़ों से लिपटकर उन्हें विदाई देना, अगरबत्ती लगाकर उनसे माफी मांगना—यह कोई ड्रामा नहीं, बल्कि उस दर्द की अभिव्यक्ति है जो एक बेटा अपनी मां (प्रकृति) के कटने पर महसूस करता है। पर्यावरणविद् नितिन सक्सेना की याचिका पर एनजीटी ने 8 जनवरी तक रोक तो लगा दी है, पर सवाल वही है, 8 जनवरी के बाद क्या?
क्या कोई विकल्प नहीं है?
जानकार कहते हैं कि अगर नीयत साफ हो तो समाधान मिल जाते हैं। 10-लेन सडक़ बनाने के बजाय फ्लाई ओवर का निर्माण कर बायपास निकाला जा सकता है। इससे पेड़ भी बचेंगे और यातायात की समस्या भी हल होगी। पेड़ों की हत्या करके चौड़ी सडक़ें बनाना वैसा ही है जैसे घर की छत बेचकर आंगन में रोशनी करना।
मुख्यमंत्री जी से एक आस
प्रदेश के लोकप्रिय और संवेदनशील मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से पूरे प्रदेश को उम्मीद है। उन्होंने पहले भी पेड़ों को बचाया है, और इस बार भी रहवासियों का यह अटल विश्वास है कि वे हस्तक्षेप करेंगे। वे विकास और पर्यावरण के बीच एक ऐसा संतुलन बनाएंगे जिससे हमारी आने वाली पीढिय़ों को शुद्ध हवा मिल सके।
मेरी कलम से कुछ पंक्तियां
पेड़ों को आसपास रहने दो,
धरती को सांस लेने दो,
ये हमारे आदि देव हैं,
यह अटल विश्वास रहने दो।
पर्यावरण को बचाना अब केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, हमारा धर्म बन गया है। हम संगठित हैं, सतर्क हैं और 8 जनवरी का इंतजार कर रहे हैं, इस उम्मीद में कि इंसाफ प्रकृति के पक्ष में होगा।









